
देश में जारी तमाम समस्याओं के बीच कचरे के पहाड़ नया संकट बनकर सामने आ रहे हैं। एक स्टडी के मुताबिक, देश में हर साल 277 अरब किलो कचरा निकलता है यानी प्रति व्यक्ति करीब 205 किलो कचरा। इसमें से 70 प्रतिशत ही इकट्ठा किया जाता है, बाकी जमीन और पानी में फैला रहता है। वहीं कुल कचरे के सिर्फ पांचवें हिस्से की रिसाइक्लिंग हो पाती है। देश से निकलने वाला कचरा दो तरह का है, इंडस्ट्रियल और म्युनिसिपल। इंडस्ट्रियल कचरे के निपटान की जिम्मेदारी उद्योगों पर ही है। वहीं म्युनिसिपल कचरे की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारों की है। उन्हें शहरी इलाकों को साफ रखना होता है। हालांकि ज्यादातर म्युनिसिपल अथॉरिटी कचरे को इकट्ठा तो करती हैं, लेकिन फिर उसे आबादी के आस-पास ही किसी डंपिंग ग्राउंड में फेंक देती हैं या कहीं भी नया कचरे का ढेर बना देती हैं|
देश के दो सबसे बड़े महानगर दिल्ली और मुंबई कचरे के पहाड़ बनाने के मामले में सबसे आगे हैं। दिल्ली का गाजीपुर और मुंबई का मुलुंड डंपिंग ग्राउंड ऐसे इलाके हैं, जहां कचरे के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ बन चुके हैं। इसके चलते आस-पास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। खुले में फेंके गए कचरे में भारी मात्रा में निकल, जिंक, आर्सेनिक, कांच, क्रोमियम और अन्य जहरीली धातुएं होती हैं, जो पर्यावरण और लोगों के लिए गंभीर खतरों की वजह बनती हैं। देश सालभर में जितनी जहरीली मीथेन गैस का उत्सर्जन करता है, उसमें से 20 प्रतिशत सिर्फ इन कचरे के ढेरों से निकलती है।
दिल्ली जैसे शहरों से कितना कचरा निकलता है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यूपी के कई जिलों में ऐसी यूनिट हैं, जिनमें दिल्ली से लाकर कचरा रिसाइकिल होता है। इस काम से जुड़े लोगों का कहना है कि रिसाइक्लिंग से बहुत कम मुनाफा होता है, इसीलिए सभी कामगारों के लिए सेफ्टी किट का इंतजाम करना महंगा पड़ता है। उन्होंने बताया कि वे ज्यादातर प्लास्टिक कचरा दिल्ली से मंगाते हैं, जिसे कानपुर में रिसाइकिल किया जाता है। इधर, सरकारें भी अब कचरे के निपटान के लिए प्राइवेट सेक्टर से मदद ले रही हैं, जो अच्छी बात है। इससे कचरे के पहाड़ और ऊंचे नहीं होंगे।
विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, साल 2030 तक भारत में हर साल निकलने वाला कचरा बढ़कर 388 अरब किलो हो जाने का अनुमान है। कुछ जानकार कहते हैं कि भारत में कचरे को ऊर्जा के स्रोत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए, ताकि इससे डरने की बजाय इसका प्रयोग वैज्ञानिक प्रक्रिया से बिजली आदि बनाने में किया जा सके। भारी मात्रा में कचरे के रिसाइकिल न हो पाने और इसे खुले में फेंके जाने की वजह मिला-जुला कचरा भी होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि असल समस्या कचरा नहीं, बल्कि मिक्स कचरा है। मसलन, ऐसा कचरा जिसमें सब्जियों-फलों के छिलके, कागज, प्लास्टिक, धातुएं, शीशा और इलेक्ट्रिक कूड़ा मिला हुआ हो। ऐसे कूड़े का निपटान बहुत मुश्किल होता है। अगर यह कूड़ा अलग-अलग हो तो इसका निपटान सरकारी और निजी दोनों ही चैनल से किया जा सकता है।
कहा जा रहा है कि अब इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए सरकार उद्योगों की भी जिम्मेदारी तय कर रही है। आने वाले समय में सोलर पैनल, बैटरी चलित गाड़ियों, मोबाइल और लैपटॉप का जो भारी ई-कचरा बढ़ने वाला है, उसके निपटान की जिम्मेदारी इन वस्तुओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों की ही होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कचरे का प्रबंधन हमारे घरों से ही शुरू हो जाता है। सबसे पहले लोगों को अलग-अलग कचरा अलग-अलग डस्टबिन में रखने के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए, जिससे इसकी रिसाइक्लिंग आसान हो सके। हालांकि देश में लोगों को आॅर्गेनिक, प्लास्टिक और धातु के कचरे को तीन-चार अलग-अलग डस्टबिन में रखने के लिए तैयार करना अभी मुश्किल है। उन्हें अभी गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग रखने के बारे में जागरुक किया जा रहा है।
लैंड फिल माइनिंग और बायोसेल डवलपमेंट दो कारगर वैज्ञानिक तरीके हैं, जिनसे कचरे के पहाड़ों को कम किया जा सकता है। लैंड फिल माइनिंग में कचरे की खुदाई कर उसे अलग-अलग कर लिया जाता है यानी प्लास्टिक अलग, धातुएं अलग, कागज अलग और शीशा अलग। इसके बाद उन्हें वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में भेज दिया जाता है, जहां अलग-अलग चीजों को उनके लिए निर्धारित अलग-अलग रिसाइकिल प्रक्रिया से गुजारा जाता है। वहीं बायोसेल डवलपमेंट में अलग-अलग एंजाइम का प्रयोग कर कचरे को गलाकर खत्म किया जाता है। असल में कचरे के ढेरों को खत्म करने के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। इसके लिए आम आदमी को भी आगे आना होगा और उसे कचरे के प्रबंधन के गुर सीखने होंगे। अगर ऐसा नहीं किया गया तो ये कचरे के पहाड़ और ऊंचे होते जाएंगे और मानव जीवन मुश्किल में पड़ता जाएगा।


