
प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से तेल की खपत कम करने तथा सोने की अनावश्यक खरीद से बचने की अपील केवल एक सामान्य आर्थिक सलाह नहीं, बल्कि इसमें भारत की अर्थव्यवस्था, वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और सामाजिक व्यवहार परिवर्तन की एक व्यापक रणनीति छिपी हुई है। यह अपील ऐसे समय में आई है जब विश्व अर्थव्यवस्था अस्थिरता, युद्धों, वैश्विक आपूर्ति संकट और बढ़ती महंगाई से जूझ रही है। भारत जैसे विशाल आयात-निर्भर देश के लिए पेट्रोलियम और सोना दोनों ही ऐसे क्षेत्र हैं जो सीधे देश के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे को प्रभावित करते हैं।
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दूसरी ओर भारतीय समाज में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और निवेश का पारंपरिक माध्यम भी माना जाता है। यही कारण है कि जब भी वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, भारत में सोने की खरीद बढ़ जाती है। लेकिन तेल और सोना दोनों के आयात पर अत्यधिक निर्भरता भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालती है। प्रधानमंत्री की अपील इसी दबाव को कम करने का प्रयास प्रतीत होती है।
यदि राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह अपील सरकार की उस रणनीति का हिस्सा भी है जिसमें आर्थिक चुनौतियों को ‘जनभागीदारी’ के माध्यम से नियंत्रित करने की कोशिश की जाती रही है।
चाहे ‘स्वच्छ भारत’ अभियान हो, ‘जल संरक्षण’ का मुद्दा हो या ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा,सरकार ने बार-बार जनता को सहभागी बनाकर राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने की कोशिश की है। तेल की खपत कम करने की अपील भी उसी कड़ी का विस्तार है। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि यह अपील कहीं न कहीं सरकार की आर्थिक नीतियों की सीमाओं को भी उजागर करती है। विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में तेल खपत कम करना चाहती है तो उसे पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले भारी करों में कमी करनी चाहिए, सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुलभ और आधुनिक बनाना चाहिए तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार करना चाहिए। केवल जनता से अपील करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार सोने की खरीद कम करने की सलाह तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक सरकार आम नागरिकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद वैकल्पिक निवेश व्यवस्था को मजबूत नहीं करती।सामाजिक स्तर पर यह अपील भारतीय मानसिकता से भी जुड़ती है। भारत में विवाह, त्योहार और पारिवारिक परंपराओं में सोने का विशेष महत्व है। कई परिवारों में सोना आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। विशेषकर ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए यह ‘आपातकालीन बचत’ की तरह काम करता है। ऐसे में सोना न खरीदने की अपील केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार में बदलाव का आग्रह भी है। सरकार को भी समझना होगा कि सामाजिक विश्वास केवल अपीलों से नहीं बदलता; इसके लिए दीर्घकालिक वित्तीय साक्षरता और निवेश सुरक्षा आवश्यक है।
आर्थिक दृष्टि से प्रधानमंत्री की अपील का सबसे बड़ा संबंध विदेशी मुद्रा बचत से है। तेल और सोना दोनों के आयात पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इसी प्रकार अत्यधिक सोना आयात चालू खाते के घाटे को बढ़ाता है। सरकार की चिंता है कि यदि वैश्विक संकट गहराया तो भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इसलिए यह अपील ‘भविष्य की तैयारी’ के रूप में भी देखी जा सकती है।
अब सरकार को अपील से आगे बढ़कर ठोस संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को इतना सशक्त बनाना होगा कि लोग निजी वाहनों का उपयोग कम करें। छोटे शहरों तक इलेक्ट्रिक चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जैव ईंधन और सौर ऊर्जा आधारित मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। इसके अलावा शहरी नियोजन ऐसा हो जिसमें लोगों को लंबी दूरी तय करने की आवश्यकता कम पड़े। सोने के संदर्भ में सरकार को वित्तीय निवेश के सुरक्षित और सरल विकल्पों को लोकप्रिय बनाना होगा। यदि शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और सरकारी बचत योजनाओं में लोगों का भरोसा मजबूत होगा, तभी वे सोने को ‘एकमात्र सुरक्षित निवेश’ मानने से बाहर आएंगे।
विपक्ष की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष का दायित्व है, लेकिन केवल आलोचना तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं। विपक्ष को वैकल्पिक आर्थिक दृष्टि प्रस्तुत करनी चाहिए।

