जनवाणी संवाददाता |
लखनऊ ब्यूरो: लखनऊ स्थित केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने ऊसर भूमि में अधिक फसल उत्पादन करने के लिए एक लवण सहेष्णु जीवाणु युक्त तरल जैव-फार्मूलेशन हैलो पी॰एस॰बी॰ को 6 वर्ष के शोध के उपरांत तैयार किया है। इस फार्मूलेशन द्वारा ऊसर मृदा का सुधार कर फसलों की अधिक उपज ली जा सकती है। इस जैव-फार्मूलेशन तकनीक को एग्रीइनोवेट इंडिया, नई दिल्ली के माध्यम से पाराशर अग्रोटेक प्रा लिमिटेड, वाराणसी को वाणिज्यिक पैमाने पर उत्पादन और विपणन के लिए लाइसेंस भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा अनुमोदित किया गया है।

इसे बनाने की पूरी विधि पर प्रशिक्षण के साथ इसमें प्रयोग किए गए लवण सहष्णु जीवाणुओं के साथ पूरी प्रौद्योगिकी को लखनऊ स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के अन्तर्गत क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान हस्तांतरित की गई।
इस मौके पर केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल के निदेशक की मौजूदगी में जैव-फार्मूलेशन हॅलो-पी॰एस॰बी॰ तकनीक का हस्तांतरण तकनीक विकसित करने वाले संस्थान के वैज्ञानिक डा0 संजय अरोड़ा एवं डा0 यशपाल सिंह द्वारा किया गया। इस मौके पर संस्थान के आई.टी.एम.यू. प्रभारी डा0 हनुमान सहाय जाट भी मौजूद रहे।

इस फार्मूलेशन के शोधकरता प्रधान मृदा वैज्ञानिक एवं प्रभारी अधिकारी डॉ संजय अरोड़ा एवं डॉ यश पाल सिंह के अनुसार हॅलो-पी॰एस॰बी॰ लवण प्रभावित मिट्टी में खेती की लागत कम कर अधिक फसल उत्पादन हेतु एक असरदार फार्मूलेशन है जिस से किसान ऊसर मृदा में जैविक तरीके से सुधार कर उससे अधिक फसल उत्पादन लेकर अपनी आय में वृद्धि के साथ ही वातावरण को शुद्ध रखने में अपना योगदान दे सकते है। डॉ संजय अरोड़ा ने बताया की उत्तर-प्रदेश में लगभग 13.7 लाख हेक्टेयर भूमि ऊसर और देश में लगभग 65 लाख हेक्टेयर मिट्टी लवणता से ग्रसित है|
जिस में फास्फोरस की उपलब्धता निम्न होती है और ऐसी मिट्टी में अन्य प्रजाति के जीवाणु की खाद कम असरदार रहती है वहीं लवण सहिष्णु जीवाणु बहुत लाभदायक होते है। उन्होने बताया की फास्फोरस के रासायनिक उर्वरकों की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही जिस से खेती की लागत बढ़ रही है।
लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से फसल की उत्पादकता और अधिक उर्वरक के प्रयोग से भूमि की गुणवत्ता भी नष्ट हो रही है। फास्फोरस युक्त रासायनिक उर्वरक जैसे डी॰ए॰पी॰ आदि की जो भी मात्रा हम फसल उत्पादन के लिए खेतों में डालते हैं उसका सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत भाग ही पौधों को उपलब्ध हो पाता है, शेष मिट्टी के कणों द्वारा स्थिर कर लिया जाता है अथवा रासायनिक क्रियाओं द्वारा अघुलनशील मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है।
फलस्वरूप यह महत्वपूर्ण तत्व पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता। लवण सहिष्णु सूक्ष्म जीवो द्वारा विकसित फार्मूलेशन ऊसर मृदा को सुधार कर इस अघुलनशील तत्व को फसलों के लिए उपलब्ध करता है और फसल की अधिक उपज प्राप्त करने मे कारगर है।
इस जैव-फार्मूलेशन के प्रयोग से सामान्य एवं ऊसर भूमि में फसलों की पैदावार में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। ऊसर भूमि में धान, गेहूँ, चारा, सब्जी की फसलों एवं तिलहन फसलों आदि के लिए इस जैव-फार्मूलेशन के प्रयोग करने से 10 से 15 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की बचत हो जाती हैं। इससे ऊसर मृदा में फसलों पर वातावरण का अनुकूल प्रभाव भी पड़ता हैं।
इस अवसर पर केंद्र के अध्यक्ष डॉ दामोदरन, ने इसे किसानो के लिए एक वरदान बताया जिस से वे कम खर्चा कर मृदा स्वास्थ्य एवं उत्तम उपज प्राप्त कर सकेंगे जिस के लिए उन्होने शोधकरता टीम विशेषकर डॉ संजय अरोड़ा एवं डॉ यश पाल सिंह के इस योगदान की सरहना की।

