Friday, April 24, 2026
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बारिश का पानी बचाओ, खेती बचाओ

 

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कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत बीज, खाद, मिट्टी, कीटनाशकों के साथ पानी की सबसे बड़ी भूमिका होती है और हम पानी को बचाने को ले कर ही सबसे ज्यादा लापरवाह बने हुए हैं। बारिश के पानी के भरोसे बैठे रहने वाले किसानों की मानसिकता ने ही खेती और किसानों का बेड़ा गर्क किया है। बारिश के मौसम में कब, कहां और कितनी बारिश होगी? इसका सटीक अंदाजा लगाना आज भी मुश्किल है। फसलों को पानी के अभाव में बरबाद होने से बचाने के लिए बारिश के पानी को बचाने और उसके सही इस्तेमाल के तरीके किसानों को सीखने होंगे।

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देश भर में आमतौर पर 15 जून के बाद से बारिश शुरू होती है और धान की नर्सरी डालने का सही समय 25 मई से 6 जून तक का होता है। बारिश के भरोसे खेती करने के दिन अब लद गए हैं। बारिश के पानी के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे किसानों को अपनी फसलों की सिंचाई के लिए खुद ही इंतजाम करने की जरूरत है। इसके लिए कुछ खास मेहनत और खर्च करने की जरूरत नहीं है बल्कि बारिश के पानी को बचा कर रखने से ही सिंचाई की सारी मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है। बरसात के पानी के भरोसे खेती करने के बजाय सिंचाई के पुराने तरीके अपना कर उम्दा खेती की जा सकती है।

बारिश के पानी को बेकार बहने से बचाने को ले कर किसानों को जागरूक होना पड़ेगा और तालाबों व पोखरों वगैरह को बचाना होगा। इससे किसान किसी महीने में कम बारिश होने पर भी अपनी फसलों को सूखने से बचा सकेंगे। इसके साथ ही सिंचाई पर होने वाली लागत में भी कमी आएगी।

कृषि सलाहकारों के अनुसार खेतों की मेंड़ों की ऊंचाई को बढ़ा कर मानसून के दौरान बारिश के पानी को खेतों में रोक कर रखा जा सकता है। मेंड़ की ऊंचाई जितनी ज्यादा होगी, उतने ही बारिश के पानी को बचा कर रखा जा सकेगा। अमूमन मेंड़ों की ऊंचाई 7 सेंटीमीटर से 15 सेंटीमीटर तक होती है। बारिश के पानी को खेतों में महफूज रखने के लिए मेंड़ों की ऊंचाई 20 से 25 सेंटीमीटर और मोटाई 10 से 15 सेंटीमीटर कर लेना जरूरी है।

यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि खेतों में इतना पानी न जमा हो जाए कि फसलों को नुकसान होने लगे। जरूरत से ज्यादा पानी खेतों में न जमा हो, इसके लिए पानी की निकासी का भी इंतजाम करना चाहिए। ज्यादा समय तक खेतों में पानी भरे रहने से धान के पौधों के गलने का खतरा भी बढ़ सकता है।
बारिश के पानी को खेतों में बचा कर रखने से केवल सिंचाई का ही फायदा नहीं होता बल्कि सिंचाई पर होने वाले खर्च में कमी आती है।

गौरतलब है कि डीजल पंप से सिंचाई करने पर किसानों को हर घंटे 80-90 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे खेती की लागत, पैदावार और किसानों की आमदनी पर बुरा असर पड़ता है। खेत में ज्यादा समय तक बारिश का पानी जमा रहने से जमीन के नीचे के पानी के स्तर को बढ़ावा मिलता है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक गांवों के बारिश के पानी को यदि मात्र 14-15 फीसदी तक पोखरों व तालाबों में जमा कर दिया जाए तो गांवों की सिंचाई से ले कर पीने के पानी तक की दिक्कत दूर हो जाएगी मगर देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश के पानी को जमा नहीं किया जाता।

नई प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में नदी जोड़ो परियोजना शामिल है। सोलर लाइट से चलने वाले नलकूपों को लगा कर पानी लेने के साथ-साथ हम बिजली की भी बचत कर सकते हैं। सूक्ष्म सिंचाई प्रक्रि या के तहत ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई के जरिए भी सूखे से मुकाबला किया जा सकता है। इनके लिए सूबों की सरकारें तमाम योजनाओं के जरिए अनुदान भी मुहैया कराती हैं। इससे तेजी से गिर रहे भूमि जल स्तर पर भी काबू किया जा सकता है।

फसलों में रसायनों का कम से कम इस्तेमाल करके जैविक तकनीकों को अपनाना होगा। जैविक तकनीक पानी बचाने के लिए बहुत ही कारगर है। सूखा प्रभावित इलाकों में फसल की सही तकनीक अपनाना बहुत ही जरूरी है। ऐसे में किन फसलों को कैसे और कब उगाएं, इसका प्रशिक्षण किसानों को देना होगा।

आमतौर पर दलहन की खेती बलुअर या बलुई मिट्टी में की जाती है। ऐसे इलाकों में उड़द की खेती आसानी से की जा सकती है। सूखे के हालात में रबी से पहले अरहर की खेती फायदेमंद होती है। अनाज वाली फसलों के बजाय चारे वाली फसलों को उगाना चाहिए।

सूखे की समस्या को आपस में मिल-जुल कर ही दूर किया जा सकता है। सरकारी, गैर सरकारी और सामाजिक संस्थाओं को ऐसे हालात से निबटने के लिए मिल कर सामने आना चाहिए। ऐसे इलाकों में पानी का निजीकरण नहीं बल्कि समुदायीकरण होना चाहिए।

यानी पानी का इंतजाम किसी आदमी या कंपनी का अपना न हो कर समाज द्वारा मिल-जुल कर होना चाहिए। छोटे-बड़े बांध बना कर पानी को इकठा  करके उसका सही इस्तेमाल करना होगा। पानी बचाने के हमारे पुराने तौर- तरीके सूखे से निबटने के लिए बहुत ही कारगर हैं। इसलिए पुरानी तकनीकों को बढ़ावा देना होगा।

नरेंद्र देवांगन


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