Friday, April 17, 2026
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सलाह और दुर्जन

Amritvani 21


भादो मास की झड़ी लगी हुई थी। नदी के किनारे दो पेड़ थे। एक पेड़ पर बया पक्षी के नीड़ लटक रहे थे। बयां अपने घोंसले में बैठा बरसात का आनंद ले रहा था। उधर, दूसरे पेड़ पर एक बंदर सिकुड़ा-सिमटा हुआ बारिश में भीगते हुए कांप रहा था। बंदर को बया से ईर्ष्या हो रही थी कि वह तो बारिश की वजह से परेशान और बया आराम से बारिश का आनंद ले रही है। बयां को पता नहीं क्या सूझी, उसने उदारवादिता अपनाते हुए बंदर को एक सलाह दे डाली, ‘बंदर भाई! तुम्हें तो मनुष्य जैसे हाथ-पैर मिले हैं। हर तरह से समर्थ हो, क्यों नहीं रहने लायक एक घर बना लेते। देखो मुझे, मैं छोटी-सी चिड़िया हूं, साधनहीन, फिर भी एक छोटा-सा आशियाना बना ही लिया। तुम भी एक घर क्यों नहीं बना लेते, जिससे आंधी बरसात से सुरक्षित रह सको?’ बंदर को यह बात बहुत नागवार महसूस हुई। वह क्षुब्ध हो आक्रोश से भर गया।

सोचने लगा, यह छोटी-सी चिड़िया मुझे उपदेश दे रही है। वह बया के घोंसले की ओर यह कहकर झपटा कि, ‘घर तो मैं नहीं बना सकता, लेकिन घर उजाड़ने में मैं माहिर हूं।’ इससे पहले की बयां कुछ समझ पाती बंदर ने बंदर ने बयां के घोंसले को तहस-नहस कर उसे नदी की धारा में फेंक दिया। बयां को एक ही झटके में बेघर कर दिया। कहने का अर्थ यह है कि सब की दृष्टि सकारात्मक नहीं होती है। कुछ लोग भले के लिए कही गई बात का बुरा मान लेते हैं।

वे लोग बिरले हैं, जिनका चिंतन होता है- ‘निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय।’ ऐसे लोगों का चिंतन होता है, सज्जन की लात भी भली होती है, किंतु दुर्जन की मीठी बात भी हानिकारक होती है। सज्जन की बात जीवन में आगे का मार्ग प्रशस्त कर देती है, जबकि दुर्जन की मीठी बात समस्याओं के चक्रव्यूह में फंसा देती है। व्यक्ति को चाहिए कि वह इन बातों में फर्क करे और सलाह भी सोच-समझकर ही दे। ऐसा न करने वालों को हानि उठानी पड़ती है।


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