Thursday, April 2, 2026
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पटाखों से आठ गुना प्रदूषित हुई क्रांतिधरा की आबोहवा

  • कोरोना, सांस के मरीजों के लिए आफत, क्लाइमेट एजेंडा
  • एन ब्लॉक संस्थान की रिपोर्ट में मेरठ बना गैस चैंबर
  • चिंता का सबब: ग्रीन पटाखे जलाते तो ना होता इन मरीजों की सेहत से खिलवाड़
  • पटाखों के साथ शहरी कचरा प्रबंधन भी जिम्मेदार

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: दीपावली पर हुए प्रदूषण ने कोरोना के साथ-साथ सांस के मरीजों की सेहत पर संकट खड़ा कर दिया है। क्लाइमेट एजेंडा और एन ब्लॉक की बुधवार को जारी की गई रिपोर्ट में मेरठ फिलहाल किसी गैस चैंबर से कम नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ ग्रीन पटाखे जलाने संबंधी अपील बेअसर साबित हुई।

कोविड-19 के साथ-साथ सांस के मरीजों के लिए मेरठ फिलहाल सुरक्षित जगह नहीं है। दिवाली पर खूब आतिशबाजी हुई। रात 10 बजे के बाद भी खूब पटाखे फोड़े गए। जिस कारण शहर में पी एम 2.5 और पीएम 10 के साथ वायु गुणवत्ता सूचकांक का स्तर भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) दोनों के ही मानकों की तुलना में काफी खराब हो गया।

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प्राप्त आंकड़ों से यह साफ जाहिर है कि न केवल बच्चे और बूढ़े बल्कि कोविड समेत अन्य संक्रामक बीमारियों से कमजोर हो चुके फेफड़ों की चिंता से परे मेरठवासियों ने अपने शहर को एक गैस चेंबर में तब्दील कर दिया। शहर के 12 विभिन्न इलाकों में वायु गुणवत्ता जांच की मशीने लगा कर यह आंकड़े एकत्र किये गए। प्राप्त आंकड़ों के बारे में एन ब्लाक के निदेशक मुकेश चौधरी ने बताया कि शहर में पी एम 10 मुख्य प्रदूषक तत्व रहा।

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जानी खुर्द सबसे अधिक प्रदूषित रहा जहां। यहां वायु गुणवत्ता सूचकांक 343 माईक्रोग्राम प्रति घनमीटर पाया गया। जो डब्ल्यूएचओ और सरकारी आंकड़ों के ग्राफ से कहीं ज्यादा है। ट्रांसपोर्ट नगर (337) घंटाघर (335) और परतापुर (333) में भी प्रदूषण का बुरा हाल रहा। कई अन्य इलाकों में भी कमोबेश यही स्थिति रही। इन सब इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक डब्लूएचओ के मानकों की तुलना में न्यूनतम 7 से 8 गुणा अधिक पाया गया।

ज्ञात हो कि डब्ल्यूएचओ के मानको के अनुसार जब वायु गुणवत्ता सूचकांक 45 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ऊपर जाए तो हवा को प्रदूषित माना जाता है, जबकि भारत सरकार के द्वारा तय मानकों के अनुसार जब यह आंकड़ा 100 के पार पहुंच जाता है तब शहर को प्रदूषित माना जाता है।

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कोविड संक्रमण के कारण पहले से ही लाखों लोगों के कमजोर हो चुके फेफड़ों समेत बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों व पहले से ही अन्य किसी बीमारियों से ग्रषित व्यक्तियों के समक्ष आसन्न खतरों के बारे में क्लाइमेट एजेंडा की मुख्य अभियानकर्ता सानिया अनवर ने बताया कि विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा जारी अध्ययनों के अनुसार हवा में बढ़ते हुए प्रदूषण से उपरोक्त सभी किस्म के व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।

इन्ही अध्ययनों का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने अत्यधिक प्रदूषित हवा वाले शहरों में पटाखे के क्रय विक्रय पर कुछ शर्तों के आधार पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया था। इसके अनुपालन की जिम्मेदारी राज्य शासन ने सम्बंधित जिला प्रशासनों को दी थी, लेकिन आदेश पर अमल पूरी तरह नहीं हो पाया। इससे न केवल शहर की आबोहवा खराब हुई बल्कि सांस के मरीजों, बच्चे, बूढ़े व कोविड-19 के शिकार रह चुके व्यक्तियों के सामने विकट परिस्थिति पैदा हो गई है।

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यूनाइटेड नेशन की क्लाइमेट यूथ लीडर हिना सैफी का कहना है कि दिवाली के अतिरिक्त आम दिनों में भी मेरठ में वायु गुणवत्ता के आंकड़े हमेशा मानक से कई गुना अधिक आ रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में जरूरी है कि शहर में इस समस्या के समाधान के लिए इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाई जाए। सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए व शहर में हरित क्षेत्रों को संरक्षित और विस्तार किया जाए।

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