Saturday, May 16, 2026
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सम्राट पेंगुइन के अस्तित्व पर मंडराता संकट

Ravivani 34


4 22आॅस्ट्रेलियाई अंटार्कटिक डिवीजन के एक वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक बारबरा वीनेके ने भी कहा कि अनुमानित अध्ययनों से पता चला है कि एम्परर पिंगुइन वर्ष 2050 तक लगभग विलुप्त हो सकता है। विनेके ने कहा कि वर्तमान में अनुमानित स्थिति के मुताबिक, आगामी साल 2050 तक अधिकांश प्रजातिया अर्ध-विलुप्त हो जाएंगी। उनकी संख्या में लगातार कमी पायी जा रही है। उल्लेखनीय तथ्य है कि एम्परर पेंगुइन को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर यानी आईयूसीएन द्वारा लुप्तप्राय की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि पेंगुइन की प्रजातियों में सबसे बड़े आकार की एम्परर यानी सम्राट पेंगुइन के अस्तित्व पर अब गंभीर खतरा मंडरा रहा है। शोधकर्ताओं द्वारा इसे तेजी से विलुप्त हो रही प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। दरअसल, यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस ने मंगलवार को घोषणा की है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यह प्रजाति अगले 30 वर्षों के भीतर विलुप्त हो सकती है। उल्लेखनीय है कि पेंगुइन की 18 प्रजातियां हैं, जिनमें से पांच अंटार्कटिका में रहती हैं और चार उप-अंटार्कटिक द्वीपों पर पर रहती हैं।

पेंगुइन की सबसे बड़ी प्रजाति एम्परर पेंगुइन है, जिसे एप्टेनोडाइट्स फोरेस्टरी भी कहा जाता है। इसकी लंबाई 1.3 मीटर होती है। पेंगुइन के लिए आश्रय खोजने और शिकारियों से भागने के लिए समुद्री बर्फ महत्त्वपूर्ण है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री बर्फ गायब हो रही है, जिससे पेंगुइन के आवास खत्म हो रहे हैं। वहीं, समुद्र के अम्लीकरण से क्रिल की पैदावार कम हो रहा है, जिससे इनके सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है। बता दें कि क्रिल छोटे आकार के क्रस्टेशिया प्राणी हैं जो विश्व-भर के सागरों-महासागरों में पाये जाते हैं। समुद्रों में क्रिल खाद्य श्रृंखला की सबसे निचली श्रेणियों में होते हैं। क्रिल सूक्ष्मजीवी प्लवक यानी प्लैन्कटन खाते हैं और फिर कई बड़े आकार के प्राणी क्रिलों को खाते हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते क्रिल की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

दरअसल, पेंगुइन अपनी अनेक खूबियों के कारण अलग पहचान रखते हैं। पेंगुइन दिखने में बहुत ही प्यारे होते हैं लेकिन चिंता का विषय है की अब इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है जिसकी सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है। संकेत हैं कि हमारी भविष्य की पीढ़ियां पेंगुइन को देखने से वंचित रह जाएगी। वे पेंगुइन के बारे में पढ़ और सुन सकेंगे, परंतु अपनी आंखों से देख नहीं सकेंगे।

आॅस्ट्रेलियाई अंटार्कटिक डिवीजन के एक वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक बारबरा वीनेके ने भी कहा कि अनुमानित अध्ययनों से पता चला है कि एम्परर पिंगुइन वर्ष 2050 तक लगभग विलुप्त हो सकता है। विनेके ने कहा कि वर्तमान में अनुमानित स्थिति के मुताबिक, आगामी साल 2050 तक अधिकांश प्रजातिया अर्ध-विलुप्त हो जाएंगी। उनकी संख्या में लगातार कमी पायी जा रही है। उल्लेखनीय तथ्य है कि एम्परर पेंगुइन को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आॅफ नेचर यानी आईयूसीएन द्वारा लुप्तप्राय की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।

यदि हम पेंगुइन की उन खूबियों का जिक्र करें, जो उन्हें अन्य जीवों से अलग बनाते हैं। दरअसल, पेंगुइन बहुत ही ज्यादा सामाजिक पक्षी हैं। समुद्र में आमतौर पर ये समूह में तैरते हैं और समूहों में भोजन भी करते हैं। पेंगुइन का सबसे पुराना जीवाश्म आज से लगभग 6 करोड़ 16 लाख साल पहले का है, यह वो समय था जब धरती से सारे डायनासोर खत्म हो चुके थे।

कुछ जीवाश्म पेंगुइन आज के किसी भी पेंगुइन की तुलना में बहुत बड़े थे, जो 4.5 फीट लंबे थे। पेंगुइन के दांत नही होते, ये अपने शिकार को खाने के लिए अपनी चोंच का उपयोग करते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये अपने भोजन के साथ कंकड़ और पत्थर भी खाते हैं। ये पत्थर भोजन को पचाने में मदद करता है। इसके अलावा, ये पत्थर पानी की गहराई में गोता लगाने के लिए पेंगुइन के शरीर को आवश्यक भार प्रदान करता है।

पेंगुइन एक दुसरे को बुलाने के लिए अलग-अलग आवाजें निकालते हैं। अब आप सोच सकते हैं कि हजारों की झुण्ड में सभी को अलग-अलग आवाज से बुलाना कितना कठिन काम होगा। पेंगुइन मांसाहारी होते हैं और ये अपना सारा खाना समुद्र से प्राप्त करते हैं। ये मछलियां, केकड़े, झींगे आदि को अपना भोजन बनाते हैं।

पेंगुइन समुद्र का खारा पानी पी सकते हैं क्योंकि उनके पास एक विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है, जो रक्तप्रवाह से नमक को छानने का काम करती है। इस प्रकार, पेंगुइन अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। हमारी आगामी पीढ़ी अपनी आंखों से प्रकृति के सबसे खूबसूरत जीव पेंगुइन को देख सकें। इसके लिए हमें मिलकर प्रयास करने होंगे। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करके हम न केवल पेंगुइन बल्कि अन्य जीवों को भी बचा सकते हैं। यह सही है कि एक अधिक आक्रामक वैश्विक जलवायु नीति पेंगुइन के विलुप्त होने के संकट को कम कर सकती है।

उड़ नहीं सकते पेंगुइन

एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि लाखों साल पहले पेंगुइन भी काफी ऊंचाई तक उड़ पाते थे। और भी कई पक्षी हैं, जिनके पंख तो हैं, लेकिन इसके बावजूद वे उड़ नहीं पाते। प्रश्न उठता है, क्या सिर्फ पंखों के जरिए ही उड़ा जा सकता है? पंख उड़ने में सहायक अवश्य होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि पक्षियों की हड्डियां अंदर से खोखली और बहुत हल्की होती हैं। इसी कारण वे आसानी से उड़ पाते हैं। पहले पेंगुइन की हड्डियां भी बहुत हल्की होती थीं जिससे वे आसानी से उड़ पाते थे। बाद में उनकी हड्डियां भारी और ठोस होती चली गई और एक समय ऐसा आया जब उनकी हड्डियां इतनी भारी और ठोस हो गई कि उनके लिए उड़ना असंभव हो गया।


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