Saturday, May 16, 2026
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ईडब्ल्यूएस आरक्षण और गरीबी का दोहरा मापदंड

Samvad 52


04 7सुप्रीम कोर्ट को न्याय का मंदिर कहा जाता है। लेकिन अब इस न्याय के मंदिर पर लोगों की उंगलियां उठने लगी हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई फैसले हैं, जिनसे कोई एक तबका अगर खुश हुआ होगा, तो दूसरे कई तबके नाराज भी हुए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करता और न ही मैं कोई टिप्पणी कर रहा हूं। लेकिन यह जरूर कहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) यानि गरीब सवर्ण तबका के आरक्षण को बरकरार रखने का फैसला देते हुए आरक्षण के मामले में 50 फीसदी की सीमा रेखा को पार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से 1993 के अपने ही उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने 27 फीसदी पिछड़े वर्ग, 15 फीसदी दलित वर्ग और 7.5 फीसदी अति दलित वर्ग के कुल योग 49.5 फीसदी आरक्षण से आगे बढ़ाने को मना कर दिया था। अब सवर्ण गरीबों के 10 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट से भी हरी झंडी मिलने के बाद आरक्षण 50 फीसदी की सीमा रेखा को लांघकर 59.5 फीसदी पर पहुंच गया है। राजनीतिक जानकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने वाले निष्पक्ष लोगों का कहना है कि इस आरक्षण के दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे, जो कि केंद्र सरकार के लिए भी मुसीबत खड़ी करेंगे।

इसकी तीन प्रमुख वजहें हैं, पहली यह कि अगर 10 लाख से कम सालाना आय वाला और 1 हजार वर्ग गज से कम जगह के मकान में रहने वाला सवर्ण गरीब है, तो फिर बाकी तबकों के 10 लाख तक की आय वाले और 1 हजार वर्ग गज से कम जगह के मकान वाले लोग अमीर कैसे हुए? दूसरी बात यह है कि अगर 10 लाख तक की सालाना आय वाले गरीब हुए, तो फिर 5 लाख से ऊपर की आय वालों से टैक्स क्यों लिया जाता है? यहां सवाल यह भी है कि क्या कल को सरकार इन सालाना 10 लाख रुपए से कम आय वाले सवर्णों को टैक्स से भी मुक्ति दे देगी? तीसरा सबसे अहम सवाल यह है कि अगर सरकार 10 लाख रुपए सालाना से कम कमाने वाले सवर्णों को आरक्षण दे सकती है, तो अब तक आरक्षण की मांग करने वाली जातियों को क्या आरक्षण नहीं देगी? अगर नहीं, तो यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में आरक्षण के लिए आंदोलन कर चुकी जातियों के लोग आंदोलन करने लगें। इन जातियों में जाट, मराठा, गुर्जर, राजपूत और अन्य दूसरी कई जातियां शामिल हैं। क्या भविष्य में सरकार इन्हें भी आरक्षण देगी?

जाहिर है कि केंद्र सरकार के ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद अब दूसरी जातियों के लोग भी अपने-अपने लिए आरक्षण की मांग सरकार से करेंगे। कुछ जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ईडब्ल्यूएस के पक्ष में फैसले और खासकर जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की टिप्पणी के बाद आने वाले दिनों में कुछ अन्य जातियां भी खुद को आरक्षण के दायरे में लाने की मांग करने लगें और संभव है कि इनमें से कुछ नए वर्गों को आरक्षण के दायरे में लाने का रास्ता साफ हो।

पश्चिमी यूपी, हरियाणा और राजस्थान में जाट इस निर्णायक भूमिका में रहते हैं। जाहिर है कि साल 2023 में राजस्थान के और साल 2024 में हरियाणा के विधान सभा चुनाव होंगे, ऐसे में अगर जाट समाज ने फिर से जाट आरक्षण के लिए सरकार से मांग की, तो उसे टालने की हिम्मत सरकार में नहीं होगी। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जाट समाज से उसे आरक्षण देने का वादा कई बार कर चुके हैं। कहा जा रहा है कि जाटों की सर्व खाप पंचायतें और जाट नेता चौधरी यशपाल मलिक सरकार पर जाट समाज को आरक्षण देने का दबाव बना सकते हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले और राजस्थान और हरियाणा के चुनाव को देखते हुए यह प्रबल संभावना है कि जाट समाज आरक्षण के लिए सरकार पर दबाव बनाने में काफी हद तक सफल हो सकता है। क्योंकि जिस जाट समाज को लंबे समय तक आरक्षण की मांग करने पर भी आरक्षण नहीं मिल पाया था, वहीं सर्वोच्च न्यायालय के इस 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस के आरक्षण के फैसले ने फिर एक उम्मीद जगा दी है और जाट समाज के लिए एक रास्ता खुल गया है।

बहरहाल, अब आरक्षण के बंटवारे को लेकर देश में एक बड़ा विवाद छिड़ सकता है, जिसे शांत करने में सरकार के पसीने छूट सकते हैं। क्योंकि आजकल हर तबके के लोग अपने हिस्से की नौकरियों में किसी दूसरे तबके का किसी भी हालत में दखल नहीं चाहते हैं। इसलिए हर जाति और तबके के लोग अपने-अपने लिए आरक्षण की मांग सरकार से करते रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि आज पूरे देश में धर्म और जाति की राजनीति हो रही है, ऊपर से हर जाति के लोग अपने-अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

ऐसे में सवर्णों के इस 10 फीसदी आरक्षण ने आग में घी का काम किया है, जिसके परिणाम कहीं न कहीं बहुत अच्छे तो नहीं होने वाले क्योंकि अगर आपको याद हो, तो ओबीसी आरक्षण लागू होने के समय को याद कीजिए, जब सुप्रीम कोर्ट ने साल 1992 में ओबीसी आरक्षण की 52 फीसदी की मांग को घटाकर खुद 27 फीसदी किया था और कहा था कि आरक्षण को 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता। आज यही आरक्षण 50 फीसदी के पार जाकर 59.5 फीसदी पर पहुंच चुका है। ऐसे में जाहिर है कि इससे अब आरक्षण को लेकर नए-नए विवाद पैदा होंगे। जिन्होंने अब तक अलग आरक्षण की मांग नहीं की है, सबके सब अब अलग-अलग आरक्षण की मांग कर सकते हैं। जिसका प्रभाव आगामी आम चुनाव में साफ-साफ दिखाई दे सकता है।


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