Wednesday, April 1, 2026
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हरि के आगे तुच्छ

Amritvani


एक बार भगवान राम और लक्ष्मण एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे। उतरते समय उन्होंने अपने धनुष बाण बाहर तट पर गाड़ दिए। जब वे स्नान करके बाहर निकले तो लक्ष्मण ने देखा कि उनकी बाण की नोक पर रक्त लगा हुआ था। उन्होंने भगवान राम से कहा, भईया, लगता है कि अनजाने में कोई हिंसा हो गई है, कोई जीव हमारे धनुष की नोक के नीचे आ गया है।

दोनों ने मिट्टी हटाकर देखा तो पाया कि वहां एक मेंढक मरणासन्न पड़ा है। भगवान राम ने करुणावश मेंढक से कहा, तुमने आवाज क्यों नही दी? कुछ हलचल तो करनी थी। हम लोग तुम्हें बचा लेते। जब तुम्हें सांप पकड़ता है, तब तो तुम खूब आवाज लगाते हो। धनुष लगा तो क्यों नहीं बोले? मेंढक बोला, प्रभु! जब सांप पकड़ता है तब मुझे मेरा इष्ट याद आता है और मैं राम-राम चिल्लाता हूं, एक आशा और विश्वास रहता है कि प्रभु अवश्य पुकार सुनेंगे और मुझे बचा लेंगे, पर आज क्या करता, जब देखा कि साक्षात भगवान श्री राम स्वयं धनुष लगा रहे हैं तो किसे पुकारता? आपके सिवा और किसी का नाम याद नहीं आया, बस इसे अपना सौभाग्य मानकर चुपचाप सहता रहा।

क्योंकि मुझे पता है कि मैंने जब जब आपको पुकारा है, आपने मुझे सांप से मुक्त करवाया है और आज अगर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूं तब भी तो आपकी शरण में ही आना है। मुसीबत में हर बार आपको पुकारने से उत्तम है की निर्भय होकर आपकी शरण में ही रहूं। सच्चे भक्त जीवन के हर एक क्षण को भगवान का आशीर्वाद मानकर उसे स्वीकार करते हैं। उनके लिए प्रभु का दिया गया दु:ख और सुख किसी वरदान से कम नहीं होते।
                                                                                                        प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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