
पढ़े-लिखे आधुनिक समाज में जंगल को बर्बरता, असभ्यता और पिछड़ेपन का ऐसा प्रतीक माना जाता है जिसमें ‘सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट’ यानि ‘सक्षम की सत्ता’ ही एकमात्र जीवन-मंत्र है, लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है? ‘जंगल का कानून नहीं चलेगा’ या ‘क्या जंगली आदमी है’- कहकर हम भले ही जंगलराज की खिल्ली उड़ाएं, मगर जंगल की प्रकृति के कायदे से चलने वाली सुंदर व्यवस्था हमारे मानव समाज में देखने को नहीं मिलती। मजे की बात यह है कि बगैर किसी सरकारी नियम-बंधन, पुलिस-व्यवस्था और कोर्ट-कचहरी के लाखों सालों से यह जंगल राज अबाधित चल रहा है। भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म और शासन को ठुकराकर यदि स्वतंत्रता देखनी हो तो वह केवल जंगल में दिखाई देती है।