
भारतीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू खानदान की प्रासंगिकता के साथ-साथ, उनकी कमियां और बहुत सारी कमजोरियां रही हैं। नेहरू ने डिस्कवरी आॅफ इंडिया के भारत की जो आधारभूत संरचना खड़ी की, जिसके साथ उन्होंने भारत की विकास की यात्रा प्रारम्भ की, भले ही वह प्रगतिशीलता के खांचे में नहीं समा सका था, फिर भी वह पुरातनपंथी नहीं कहा जा सकता। वैचारिकी में वह वामपंथ से दूर होते हुए भी, दक्षिणपंथी हिंसा और नफरत को आत्मसात नहीं किए हुए था। वह अधिनायकवादी होते हुए भी निर्लज्ज जनविरोधी नहीं था। वह कॉपोर्रेट परस्त होते हुए भी, किसान-मजदूरों की बबार्दी पर जश्न मनाने वाला नहीं था। खाद-बीज, कृषि उपकरणों के कारखानों की नींव उसी ने रखी मगर उसी के काल में उदारवादी अर्थव्यवस्था की कोख से उनके उजड़ने की कहानी भी लिख दी गई।