- अदालत में अपने पुलिस वाले तक की गवाही नहीं करा सकी थी पुलिस
- वारंट जारी होने के बाद ही पुलिस पहुंचा तो सही, लेकिन गवाही हुई अधूरी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: बहुचर्चित रविंद्र भूरा हत्याकांड में पांच साल तक तो पुलिस ही अड़चन बनी रही। पुलिस की कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पांच साल तक एक भी गवाह की गवाही पुलिस नहीं करा सकी थी। सबसे हैरानी की बात तो यह कि गवाह कोई और नहीं पुलिस वाला था, उसके बाद भी गवाही नहीं करायी जा सकी। दिलचस्प तो यह है कि गवाह कोई आम नहीं बल्कि खुद पुलिस वाला है। कई बार वारंट भेजने के बावजूद पुलिस की गवाही अधूरी पड़ी रही। जब पुलिस के गवाह ही ऐसे कर रहे थे तो फिर मुकदमे का हश्र वो होना जो हो हुआ है।
पुलिस वाले ने ही करायी थी एफआईआर
16 अक्टूबर 2006 को थाना सिविल लाइन में उपनिरीक्षक रेशम सिंह ने रिपोर्ट लिखायी थी कि कचहरी परिसर में चार-पांच बदमाशों ने पुलिस अभिरक्षा में रविंद्र उर्फ भूरा पर अंधाधुंध गोलियां बरसायी। इसमें रविंद्र की मौके पर मौत हो गई। हमले में कांस्टेबिल मनोज कुमार, रविंद्र के भतीजा गौरव और एक बदमाश भी बदमाशों की गोलियों की चपेट में आ गए और मौके पर ही मारे गए। इसमें कई लोग घायल भी हुए। मामले में पुलिस ने सात लोगों को आरोपी बनाया और सभी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
ये थे आरोपी
पुलिस ने जिन आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया, उनमें अजय मलिक उर्फ जंगू, आजाद, बंटू, अजय जडेजा, चन्द्रपाल, गुलाब उर्फ फौजी शामिल थे। इसमें एक आरोपी राजेन्द्र उर्फ चुरमुड़ा मौके पर ही मारा गया था।
कुल 48 गवाह
भूरा हत्याकांड में पुलिस ने वादी दारोगा रेशम सिंह, दिनेश सहित 48 लोगों को गवाह बनाया था। हत्यारों को सजा के लिए पुलिस कितनी गंभीर थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिसंबर 2011 तक इस हत्याकांड में पैरवी कर रहे पुलिस वाले अपने पुलिस वाले तक की गवाही नहीं कर सके। ऐसे में जिन्हें आरोपी बनाया गया उनके बरी होने के आसार पहले से ही नजर आने लगे थे।
जबकि अदालत ने कई बार वादी दारोगा रेशम सिंह को तलब किया गया। रेशम पाल तभी बयान को आए जब अदालत से उनके वारंट जारी हो गए, लेकिन तब भी उनका बयान पूरा दर्ज नहीं कराया जा सका। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली को आसानी समझा जा सकता है।

