- निगम में सालों से एक ही सीट पर हैं काबिज, अधिकारियों की शह पर ही चलता है लूट का धंधा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: अगर आप नगर निगम को लेकर किसी मुगालते में हैं तो अपने दिमाग में यह गलत फहमी निकाल दें कि सरकारी विभाग होने की वजह से यहां ईमानदारी का राज होगा। जी नहीं, यहां मठाधीशों का एकछत्र राज है। मठाधीश भी ऐसे-वैसे नहीं, बल्कि इतने घाघ कि एक ही सीट पर 10-10 सालों से काबिज हैं। दुनिया दिखावे को उनका हफ्ता दस दिन को स्थानांतरण होता है। इसके बाद वह फिर ेसे न सिर्फ पुरानी सीट पर काबिज हो जाते हैं,
बल्कि पहले से ज्यादा लूट में शामिल हो जाते हैं। सालों से यह धंधा चल रहा है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि इन मठाधीशों की कुर्सी जिस अधिकारी ने भी हिलाने की कोशिश की। इन मठाधीशों ने उस कुर्सी से अधिकारी को ही उखाड़कर नगर निगम से धकेल दिया। मजबूरन अधिकारी या तो चुप्पी साधकर अपने काम से काम रखता है। या फिर वह इन मठाधीशों के अधीन हो जाता है।
प्रदेश सरकार द्वारा स्थानांतरण नीति 2023-24 के लिए शासनादेश जारी कर किया गया था। जिसमें प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव ने 7 जून को जारी शासनादेश में स्पष्ट लिखा है। कि एक ही पटल पर जमें उन सब अधिकारी एवं कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाए या पटल बदला जाए जिनकों एक ही सीट पर तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं। नगर निगम में करीब 10 वर्षों से नौ कर्मचारी एक ही पटल पर जमे हुए हैं। जिसमें इनमें से एक कर्मचारी रिश्वत लेने के आरोप में बीते माह में जेल चला गया था।

एक कर्मचारी को दूसरी जगह पर निगम में ही लिपिक के रूप में नियुक्त कर दिया गया। शेष छह-सात कर्मचारी एवं अधिकारी एक ही पटल पर जमे हुए हैं। जिसमें एक ही सीट पर आठ से दस वर्ष तक जमे रहने के चलते उनकी निगम में मजबूत सेटिंग एवं पकड़ बनी हुई हैं। शिकायतकर्ता कितने भी शिकायती पत्र अपने मामले की जांच कराकर समस्या के निस्तारण के लिए दे दे, लेकिन जब तक समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक वह एक ही पटल पर जमे अधिकारी या कर्मचारी को हटाया नहीं जायेगा।
मठाधीशों की लंबी है फौज
गृहकर विभाग में नवीन रस्तोगी भी लंबे समय से एक ही सीट पर जमे हुए हैं। जन्म मृत्यु कार्यालय में तत्कालीन नगरायुक्त मनीष बंसल ने दो दलालों को पकड़ लिया था, जिसमें दोनों दलाल चकमा देकर फरार हो गए थे। तब उन्होंने स्वीकार भी किया था कि जन्म और निगम मृत्यु प्रमाण पत्र रुपये देकर बनवाते है। ये रुपये कहां जाते हैं, यह सब जगजाहिर है। निर्माण विभाग में प्रदीप जोशी जमे हुए है।
उनका परिवर्तन नहीं हुआ। अंकुर विश्नोई केन्द्रीय कार्यालय में 15 वर्ष से तैनात हैं। एक ही सीट पर इतना लंबा कार्यकाल किसी का नहीं हो सकता। इनको भी अधिकारियों की खास मेहरवानी के चलते सीट से हटाया ही नहीं जाता है। अनीस अहमद पर कई गंभीर आरोप लगे, उनको कई अतिरिक्त चार्ज वर्तमान में दे दिये गये हैं। और स्टोर से उनको हिलाने का कोई भी अधिकारी साहस नहीं दिखा सका। इसी तरह से डूडा कार्यालय में जगत पार्चा की तैनाती पिछले 10 वर्षों से हैं। वहां से उन्हें नहीं हटाया गया। आखिर डूडा कार्यालय में क्या खास रुचि जगत पार्चा ले रहे हैं।
जब भी उनको हटाने की बात सामने आती है तो कोई न कोई अप्रोच लगाकर फिर से तबादला रुकवा लिया जाता है। सनी बादली आॅडिट विभाग में आठ वर्ष से तैनाती पा रहे हैं। इनका भी पटल परिवर्तन नहीं हुआ। एक बार जो जहां तैनात हो गया, वहीं पर उसने अपना अड्डा जमा लिया। विशाल शर्मा हाउस टैक्स में 9 वर्षों से एक ही सीट पर तैनाती पा रहे हैं। उनको हटाने की नगर निगम में अधिकारियों में हिम्मत नहीं है। क्योंकि कोई न कोई सिफारिश लेकर ये आ जाते हैं, जिसके चलते पटल परिवर्तन कभी नहीं हुआ।
अनिल चौधरी आॅडिट विभाग में दस वर्षों से एक ही सीट पर जमे हुए हैं। इसी तरह से निशांत शर्मा भी लेखा विभाग में एक ही सीट पर जमे हुए हैं। मजाल कोई इनको हटा दे। अनिकेत लेखा विभाग में दस वर्षों से तैनाती पा रहे हैं। ये सभी निगम कर्मचारी एक ही सीट पर लंबे समय तक तैनाती पाने के कारण मठाधीश बन गए हैं इनको हटाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है। यही वजह है कि नगर निगम में भ्रष्टाचार रुकने की बजाय बढ़ता जा रहा है।
डिपो में भी चलता है सेटिंग गेटिंग का खेल
लंबे समय से डिपो इंचार्ज और क्लर्क जमे हुए हैं। इनके खिलाफ भी कोई पटल परिवर्तन का आदेश नगर निगम के आला अफसर नहीं कर रहे हैं। यही नहीं, इनकी मठाधीशी के सामने अधिकारी एक तरह से देखा जाए तो नतमस्तक हो गए हैं, जिसके चलते डिपो इंचार्ज बेलगाम है। क्योंकि नगर निगम आॅफिस में ही पटल परिवर्तन नहीं हो पा रहा है तो ऐसे में डिपो में तैनाती पा रहे क्लर्क और डिपो इंचार्ज को हटाने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसमें कई क्लर्क ऐसे हैं, जिनके खिलाफ विभागीय जांच भी चल रही हैं, फिर भी उन पर खास मेहरबानी की क्या वजह हो सकती हैं?
सेटिंग-गेटिंग की आॅडियो हुई थी वायरल
भाजपा से हरिकांत अहलूवालिया के महापौर बनते ही कुछ महत्वपूर्ण पदों पर सेटिंग के चलते पटल बदलने की बात सामने आई थी। जिसमें एक कर्मचारी की आॅडियो वायरल हुई थी। जिसमें मलाईदार पद पर नियुक्ति के लिए मजबूत सेटिंग की बात कही गई, लेकिन नगर निगम के अधिकारी उस भ्रष्टाचार की बड़ी आॅडियो को दबाकर बैठ गए। न तो इन मठाधीशों का पटल परिवर्तन हुआ, और न ही उनकी सीट को हिलाया जा सका। गंगा नगर ब्रांच कार्यालय में खुलेआम रिश्वत लेने के मामले में नवल सिंह राघव वर्ष-2022 के आखिर में जेल तक चला गया था। बाकी सभी एक ही पटल पर जमे हुए हैं।

