मुख्य संवाददाता |
बागपत: दादा-पिता की विरासत को बचाने की जद्दोजहद में रालोद मुखिया चौधरी जयंत सिंह जुटे हुए हैं। इंडिया गठबंधन का हिस्सा हुए और सपा के साथ गठबंधन कर ऐलान कर दिया था। सात सीटों पर दोनों के बीच बात बनी थी, लेकिन अचानक उन्होंने पाला बदला और एनडीए के साथ चल दिए।
औपचारिक ऐलान भी कर दिया गया है। हालांकि सपा के साथ सात सीटें थी और एनडीए के साथ दो ही सीटे मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह समझौत कहें या फिर उस विरासत को बचाने की जद्दोजहद मानी जाए जो भाजपा गिराती आ रही है। चौधरी जयंत सिंह के राजनीतिक करियर की शुरुआत भाजपा के साथ गठबंधन में 2009 में सांसद बनकर हुई थी। उसके बाद दो बार चुनावी मैदान में उतरे और भाजपा ने पटकनी दे दी। उनके पिता चौधरी अजित सिंह को भी भाजपा ने ही हराने का काम किया था।
देखा जाए तो भाजपा के साथ गठबंधन में जहां चौधरी परिवार विजयी हुआ है वहीं भाजपा ही ऐसी पार्टी भी है जिसने चौधरी परिवार का विजयी रथ रोकने का काम किया है। अब उसी पार्टी के साथ आगामी लोकसभा चुनाव में जीत की आस रालोद ने संजो ली है। भले ही महज दो सीटों पर समझौता करना पड़ रहा हो, लेकिन विपक्ष का हिस्सा न होकर सरकार के साझीदार होने का निर्णय लेने का अनुमान भी लगाया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यही कहा जा रहा है कि भाजपा से हार के बाद अब उसी के साथ जाकर जीत की उम्मीद संजोई गई है। ताकि बागपत में रालोद का जो गढ़ ढह चुका था वह वापस खड़ा किया जा सके।
बात जब विरासत बचाने की हो तो राजनीति में मोहरे जहां बदल दिए जाते हैं वहीं अपनी चाल भी बदलनी पड़ जाती है। रालोद ने भी कुछ ऐसा ही किया है। बागपत लोकसभा सीट उसकी विरासत कही जाती है। किसान मसीहा एवं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि रही है। चौधरी चरण सिंह के बाद उनके पुत्र चौधरी अजित सिंह ने यहां राजनीति की कमान संभाली और यहां से सांसद चुनते रहे। हालांकि वर्ष 1998 में भाजपा के सोमपाल शास्त्री ने उनका विजयी रथ रोक दिया था और जीत हासिल की थी। उसके बाद 1999 में फिर से जनता ने चौधरी अजित सिंह को जनता ने सिरमौर बना दिया। उसके बाद वह लगातार विजयी होते गए। वर्ष 2009 में चौधरी अजित सिंह ने अपने बेटे चौधरी जयंत सिंह को भी चुनावी मैदान में उतारा और मथुरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया। उस समय रालोद का गठबंधन भाजपा से था। भाजपा ने रालोद को सात सीटें दी थी, जिनमें से पांच सीटों पर रालोद ने जीत हासिल की थी। दो सीट वह हार गई थी।
बागपत से चौधरी अजित सिंह, मथुरा से चौधरी जयंत सिंह, बिजनौर से संजय चौहान, हाथरस से सारिका बघेल, अमरोहा से देवेंद्र नागपाल चुनाव जीते थे। जबकि मुजफ्फरनगर से अनुराधा चौधरी व नगीना से मुंशीरामपाल चुनाव हार गए थे। चौधरी जयंत सिंह की सांसद के रूप में राजनीति में एंट्री हुई थी। उसके बाद वर्ष 2012 में मांट सीट पर उन्होंने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था और वहां लगातार जीत दर्ज करने वाले श्याम सुंदर शर्मा को पराजित किया था। सांसद रहने के बाद में चौधरी जयंत सिंह ने यह विधानसभा सीट छोड़ दी थी। उसके बाद वर्ष 2014 में भाजपा व रालोद की राहें अलग हो चुकी थी। क्योंकिं उस समय चौधरी अजित सिंह कांग्रेस का हिस्सा हो चुके थे और वह कांग्रेस सरकार को समर्थन देकर केंद्रीय मंत्री बने थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में चौधरी जयंत सिंह को फिर से मथुरा सीट पर उतारा गया था और बागपत सीट से चौधरी अजित सिंह चुनाव मैदान में थे। उस दौरान देशभर में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की। जिसमें पिता-पुत्र चौधरी अजित सिंह व चौधरी जयंत सिंह दोनों ही सीट हार गए।
मथुरा में बॉलीवुड अभिनेत्री हेमा मालिनी ने जयंत को हराया और बागपत में चौधरी अजित सिंह को मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डॉ. सत्यपाल सिंह ने हराया। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में चौधरी अजित सिंह ने अपनी विरासत यानी बागपत लोकसभा सीट पर अपने बेटे चौधरी जयंत सिंह को उतारा और खुद मुजफ्फरनगर सीट पर पहुंच गए। लेकिन दोनों फिर से चुनाव हार गए। बागपत में डॉ. सत्यपाल सिंह और मुजफ्फरनगर में डॉ. संजीव बालियान ने चुनाव हराया। अब चौधरी जयंत सिंह के सामने अपने परिवार की विरासत बचाने की अग्नि परीक्षा थी।
वह इंडिया गठबंधन में पहुंच चुके थे। सपा के साथ गठबंधन हो गया था और सात सीटों पर बात बनी थी। परंतु अचानक दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और राहें जुदा हो गई। चौधरी जयंत सिंह ने एनडीए का पाला चुन लिया। उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर गठबंधन का औपचारिक ऐलान भी कर दिया है।
हालांकि बागपत व बिजनौर सीट ही मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। क्योंकि मुजफ्फरनगर में भाजपा ने प्रत्याशी उतार दिया है। दो सीटों पर समझौते को लेकर चर्चाएं तो खूब है, लेकिन हर कोई यह भी कह रहा है कि चौधरी जयंत सिंह के सामने अपनी विरासत को बचाने की परीक्षा थी।
बागपत से भाजपा उन्हें लगातार हरा रही थी। यह भी कारण माना जा रहा है कि जयंत के करियर की शुरुआत भाजपा गठबंधन से हुई थी और वह विजयी हुए थे। दो बार हार के बाद वह फिर से भाजपा के साथ पहुंचकर अपनी नैय्या पार लगाने की जुगत में है। उन्हें उम्मीद होगी कि भाजपा के सहारे उनकी भी नैय्या पार हो जाएगी। इतना जरूर है कि जब भी चौधरी परिवार को बागपत में हार मिली है वह भाजपा ने ही दी है। कुछ तो यहां तक भी कह रहे हैं कि इसी गुणाभाग को लगाकर रालोद मुखिया अपनी विरासत को सहेजने के लिए भाजपा के साथ गए हैं और एक अदद जीत की आस संजाई गई है। देखना यह है कि भाजपा के साथ जाकर उन्हें जीत मिलती है या नहीं?

