
बात उन लोगों की है, जिनमें अनगिनत लोग बसते हैं। ये सभी हमारे देश के नहीं हैं। आरोन बुश्नेल नाम था उसका! अमेरिका की वायुसेना का सिपाही था। सेना में अनिवार्य भरती के नियम के कारण वह सेना में था। बुश्नेल के मन में युद्धों व हत्याओं को लेकर उलझन थी। वह अमेरिका का एक सजग युवा था जो जानता था कि देश-दुनिया में कहां, क्या हो रहा है और यह भी कि उसमें उसका अपना अमेरिका क्या भूमिका निभा रहा है। फलस्तीन पर इस्राइली आक्रमण और उसमें अपने देश अमेरिका की भूमिका ने उसे विचलित कर दिया था। बुश्नेल जानता था कि वह गजा को मटियामेट करने वालों में से एक है। उसका अपराधबोध अलग स्तर का था, इसलिए उसका जवाब भी अलग तरह से आया। 25 फरवरी 2024 की दोपहर, 25 साल के इस फौजी जवान ने यह कहते हुए आत्मदाह कर लिया -‘मैं अमरीकी वायुसेना का एक सक्रिय फौजी हूं, लेकिन अब मैं इस नरसंहार में किसी भी तरह का भागीदार बनने को तैयार नहीं हूं। हमारे शासकों ने भले इसे सामान्य मान लिया है, लेकिन मैं एक बडा कदम उठने जा रहा हूं।’ बुश्नेल के पुराने ट्वीट हैं : ‘दूसरे लोगों की तरह मैं भी खुद से पूछता हूं कि अगर मैं दास प्रथा के दौरान होता तो क्या करता? या रंगभेद के चलन के दौरान? अगर आज मेरा देश नरसंहार कर रहा है तो मैं क्या करूंगा? मैं जो करने जा रहा हूं, वही मेरा उत्तर है।’ बुश्नेल का एक फौजी साथी, जो उसी की तरह युद्ध, हत्या, अपनी सरकार के रवैये आदि के संदर्भ में अंतरात्मा की आवाज सुनता था और फौज से निकल सका था, बताता है कि बुश्नेल बहुत जिंदादिल दोस्त था, बहुत अच्छा गाता था, भावुक व ईमानदार था। हमेशा अन्याय, जबर्दस्ती आदि की खिलाफत करता था। रुंधे गले से उसने कहा : ‘ऐसा करने से पहले जिस पीड़ा से वह गुजरा होगा, उसे मैं समझ सकता हूं।’
हम बुश्नेल के जल मरने को क्या समझें? एक नासमझ का अतिरेक भरा, उन्मादी, भावुक कदम? आखिर क्या फर्क पड़ा, फलस्तीनियों को या अमेरीकी-इस्राइली सरकारों को? इनमें से किसी ने बुश्नेल के लिए सहानुभूति का एक शब्द भी तो नहीं कहा! हम ‘समझदार’ लोग ऐसा भी कहेंगे कि इससे तो कहीं अच्छा होता कि बुश्नेल जिंदा रहकर ऐसे अन्यायों का मुकाबला करता! ‘समझदारों’ के लिए न तर्कों की कमी है, न शब्दों की। बुश्नेल के लिए शब्द, तर्क आदि पर्याप्त नहीं थे। उसे तो जवाब चाहिए था जो उसे कहीं मिला नहीं। इसी अमेरिका में एक आदमी था-मुहम्मद अली या कैसियस क्ले! मुक्केबाजी के खेल में उन जैसे शलाकापुरुष कम ही आए। अनिवार्य सैनिक भर्ती का सवाल उनके सामने भी आया था। उन्होंने अपना प्रतिवाद लिखा: ‘मेरी अंतरात्मा मुझे इजाजत नहीं देती कि महाशक्तिशाली अमेरिका के लिए मैं अपने किसी भाई को, किसी अश्वेत या कीचड़ में लिपटे किसी निर्धन-भूखे को गोली मार दूं! और क्यों मार दूं? उनमें से किसी ने मुझे ‘निगर’ नहीं कहा; उनमें से किसी ने मेरी ‘लिंचिंग’ नहीं की; उनमें से किसी ने मुझ पर अपना कुत्ता नहीं छोड़ा; उनमें से किसी ने मुझसे मेरी राष्ट्रीयता नहीं छीनी; मेरी मां से रेप नहीं किया, मेरे पिता की जान नहीं ली। फिर क्यों मारूं मैं उनको? मैं कैसे गरीब लोगों की जान ले लूं? नहीं, आप मुझे जेल में डाल दो।’
वर्ष 1968 में, जब चेकोस्लोवाकिया में तब की महाशक्ति सोवियत रूस की सेना घुस आई थी और उस छोटे-से देश की स्वतंत्र चेतना को कुचलकर रख दिया था तब जॉन पलाश नाम के एक युवक ने रूसी टैंक के सामने खड़े होकर उसी तरह आत्मदाह कर लिया था जैसे अभी बुश्नेल ने किया। ऐसे दीवाने मर जाते हैं, ताकि हमारे भीतर कहीं मनुष्यता के जीने की संभावना जिंदा रहे। यह गांधी के आमरण उपवास की तरह है या उनकी गोली खाने की जिद की तरह! बुश्नेल के आत्मदाह के करीब साथ-साथ रूसी तानाशाह राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने एलेक्सी नवलनी की हत्या करवा दी थी। नवलनी ने पुतिन के पंजों में अपनी गर्दन आप ही दी थी। जैसे हम सब जीवन की तरफ दुम दबाए भागते हैं, नवलनी सर उठाए मौत की तरफ भागते रहे। वे कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे। भवन निर्माण क्षेत्र के वकील थे और उसी हैसियत से सरकारी कामों में व्याप्त भ्रष्टाचार का सवाल उठाकर सबसे पहले सामने आए। पुतिन की नीतियों के सबसे मुखर आलोचक के रूप में वे खड़े हुए। उन्होंने रूसी ‘संसद’ का चुनाव भी लड़ा और शासन-प्रशासन के विरोध-अवरोध के बावजूद भारी समर्थन जुटा लिया।
पुतिन ने भांप लिया कि यह आदमी और इसकी आवाज साधारण नहीं है। यह खतरनाक है। पुतिन जैसे एकाधिकारी मानसिकता वाले खतरे को सामने आने नहीं देते, बल्कि आगे बढ़कर उसका गला दबा देते हैं। इसलिए पहले झटके में ही पुतिन की पुलिस ने नवलनी को धर दबोचा। कई तरह के आरोपों का जाल बिछाया गया जिसमें चरमपंथी गतिविधियों में हिस्सेदारी से लेकर धोखाधड़ी तक का मामला शामिल था। जिस दिलेरी से उस गिरफ्तारी का सामना नवलनी ने किया, उससे पता चल गया कि पुतिन की आशंका कितनी सही थी।
नवलनी ने अपनी भूमिका संसदीय विपक्ष की रखी। वे जेल से भी प्रखरता, लेकिन शांति से अपना पक्ष रखते रहे। परिणाम यह हुआ कि नवलनी पुतिन के विरोध की सबसे मजबूत आवाज बनकर ही नहीं उभरे, बल्कि रूसी समाज में असहमति की आवाज के उत्प्रेरक भी बन गए। रूसी संविधान में मनमाना संशोधन कर पुतिन अपनी स्थिति मजबूत करते रहे और नवलनी ऐसे हर कदम का पदार्फाश करते रहे। फिर खबर आई कि वे जेल में बीमार हो गए हैं। नवलनी को इलाज के लिए जर्मनी भेजना पड़ा। यहां यह बात सामने आई कि नवलनी के रक्त में जहर पहुंचाया गया था।
यह मौका था जब नवलनी रूस लौटने से इंकार कर, जर्मनी में राजनीतिक शरण मांग सकते थे। नवलनी को ऐसा समझाने की कोशिश भी की गई, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। पुतिन की आंखों में आंखें डालकर बातें कहने-लड़ने को वे जर्मनी से रूस लौट आए। उन्होंने कहा: ‘मैं किसी से, किसी भी तरह डरता नहीं हूं।’
इस बार नवलनी को वैसी जेल में डाला गया जिसे हिटलर ‘कंसन्ट्रेशन कैंप’ कहता था। रूस के ध्रुवीय प्रदेश में बनी ऐसी जेलों को ‘पीनल कॉलोनी’ कहते हैं। नवलनी पर कई नए आरोप मढ़े गए और अंतत: 2021 की जनवरी में उन्हें 19 साल की सजा सुनाई गई। यह सजा और उसके पीछे के इरादों को अच्छी तरह समझ रहे नवलनी ने न हिम्मत हारी व धैर्य छोड़ा। उन पर मुकदमा चलता रहा और वे हर पेशी में आॅनलाइन हाजिर होकर अपना पक्ष रखते रहे। अचानक रूसी सरकारी तंत्र ने दुनिया को खबर दी कि हृदय के काम करना बंद कर देने के कारण 15 फरवरी 2024 को नवलनी की मौत हो गई। अन्य कारणों का व कहानी के दूसरे पन्नों का खुलासा होता रहेगा, लेकिन बुश्लेन को मानसिक बीमारी का या भटकी मानसिकता का शिकार बताने वाले नवलनी को क्या कहेंगे? हर उस आदमी को क्या कहेंगे जो अपनी शर्त पर जीवन जीना चाहता है? क्या जो सत्ता में हैं उनको ही अपने रंग-ढ़ंग से जीने का अधिकार है? क्या मनुष्य की अपनी कोई आजादी और उस आजादी की अनुल्लंघनीय गरिमा नहीं होती?


