Sunday, March 15, 2026
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काश! कावेरी को सहेजा होता

Samvad 52


PANKAJ CHATURVEDIदेश के सबसे सुंदर शहरों में से एक बैंगलुरु का जलसंकट इन दिनों चर्चा में हैं। कहा तो यह जा रहा है कि लगातार दो साल से बरसात कम हो रही है। हकीकत यह है कि स्थानीय तालाबों को सुखाने के साथ साथ कावेरी नदी के प्रति सरकार और समाज की बेपरवाही इसके मूल में है। बैंगलुरु शहर की कोई एक करोड़ चालीस लाख आबादी के लिए हर दिन 2600 एमएलडी पानी की जरूरत है, जबकि कावेरी नदी से मात्र 1460 मिल रहा है। कोई 1200 से अधिक नलकूप सूख चुके हैं। बरसात अभी कम से कम दो महीने दूर है और इसी लिए कई स्कूल- कालेज-दफ्तर बंद कर दिए गए। पानी के दुरूपयोग पर पांच हजार के जुर्माने सहित कई पाबंदियां लगा दी गई हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि कावेरी के जल बंटवारे को ले कर दक्षिण के दो बड़े राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक में जम कर सियासत तो होती है, लेकिन जब उसे सहेजने की बात आती है तो उसे गंदा अधिक करने की तत्परता ही दिखती है। कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले के पश्चिमी घाट के घने जंगलों में ब्रह्मगिरी पहाड़ी पर स्थित तल कावेरी से निकलती है। कोई आठ सौ किलोमीटर की यात्रा के दौरान कई सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं, लेकिन जब दो लाख घन मीटर से अधिक वार्षिक जल बहाव वाली कावेरी का समागम तमिलनाडु में थंजावरु जिले में बंगाल की खाड़ी में होता है तो यह एक शिथिल-सी छोटी-सी जल-धारा मात्र रह जाती है। कावेरी के पानी को लेकर दो राज्यों के बीच का विवाद संभवतया दुनिया के सबसे पुराने जल विवादों में से एक है। 17वीं सदी में टीपू सुल्तान के शासनकाल में जब तत्कालीन मैसूर राज्य ने इस पर बांध बनाया था तब मद्रास प्रेसीडेंसी ने इस पर आपत्ति की थी। इस झगड़े का एक पड़ाव सन 1916 में सर विश्वेसरैया की पहल पर बनाया गया कृष्णराज सागर यानी केआरएस बांध था, पर जब दोनों राज्यों में पानी की मांग बढ़ी तो यह बांध भी विवादों की चपेट में आ गया।

कावेरी की लपटों में ना जाने क्या-क्या झुलसा, लेकिन पानी पर सियासत करने वालों ने इस बात की सुध कभी नहीं ली कि कावेरी का मैला होता पानी अब जहर बनता जा रहा है। कुछ साल पहले बंगलुरू विश्वविद्यालय ने वन और पर्यावरण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय-एनआरडीसी की मदद से एक विस्तृत शोध किया था, जिसमें बताया गया था कि केआरएस बांध से नीचे आने वाला पानी ऊपरी धारा की तुलना में बेहद दूषित हो गया है। गौरतलब है कि केआर नगर, कौल्लेगल और श्रीरंगपट्टनम नगरों की नालियों का गंदा पानी और नंजनगौडा शहर के कारखानों व सीवर की निकासी बगैर किसी शोधन के काबिनी नदी में मिला दी जाती है। काबिनी नदी आगे चलकर नरसीपुर के पास कावेरी में मिल जाती है। कहने को कोल्लेगल में एक ट्रीटमेंट प्लांट लगा है, लेकिन इसे चलते हुए कभी किसी ने नहीं देखा।
शहरी गंदगी के बाद कावेरी को सबसे बड़ा खतरा इसके डूब क्षेत्र में हो रही अंधाधुंध खेती से है। ज्यादा फसल लेने के लालच में जमकर रासायनिक खाद व कीटनाशकों के इस्तेमाल ने कावेरी का पानी जहर कर दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बरसात के दिनों में कावेरी के पानी में हर रोज 1,051 टन सल्फेट, 21 टन फास्फेट और 34.88 टन नाइट्रेट की मात्रा मिलती है। गर्मी के दिनों में जब पानी का बहाव कम हो जाता है, तब सल्फर 79 टन, 2.41 टन फास्फेट और 3.28 टन नाइट्रेट का जहर हर रोज इस पावन कावेरी को दूषित कर रहा है। याद रहे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक नाइट्रेट के रूप में नाइट्रोजन की इतनी मात्रा वाला पानी बच्चों के लिए जानलेवा है।

कौल्लेगेल क्षेत्र में शहरी सीवर के कारण कावेरी का पानी मवेशियों के लिए भी खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यहां पानी में कैडमियम, एल्यूमिनियम, जस्ता और सीसा की मात्रा निर्धारित स्तर को पार कर जाती है। ये नदी किनारे रहने वालों के लिए आए दिन नई-नई बीमारियों की सौगात लेकर आ रहे हैं। वैसे तो अन्य नदियों की ही तरह कावेरी में भी खुद-ब-खुद शुद्धीकरण की विशेषता है, लेकिन आधुनिक जीवन-शैली के लिए आवश्यक बन गए रासायनों की बढ़ती मात्रा से नदी का यह गुण नाकाम हो गया है। कावेरी के किनारों पर रेत की बेतरतीब खुदाई, शौचकर्म और कपड़ों की धुलाई ने भी नदी का मिजाज बिगाड़ दिया है।

कावेरी के दूषित होने की चेतावनियां 1995 में केद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रपट में दर्ज थीं। उसमें कहा गया था कि कावेरी का पानी अपने उद्गम तालकावेरी से मैसूर शहर की सीमा तक सी ग्रेड का है, जबकि यह होना ए ग्रेड का चाहिए। विदित हो कि ए ग्रेड के पानी की 100 मिलीलीटर मात्रा में कॉलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा 50 होती है, जबकि सी ग्रेड में यह खतरनाक विषाणु छह हजार होता है। पानी की अम्लीयता का पैमाना कहे जाने वाले पीएच वैल्यू में काफी अंतर दर्ज किया गया था। प्रदूषण बोर्ड की उस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि केआर बाँध से होगेनेग्गल तक और बंगलुरू से ग्रेंड एनीकेट तक और उसे आगे कुंभकोणम तक पानी की क्वॉलिटी ई ग्रेड की है। सनद रहे कि इस स्तर का पानी पीने के लिए कतई नहीं होता है।

तमिलनाडु के तिरूवरूर जिले के मन्नारगुडी का सीबीएम यानी कोल बेड मीथेन क्षेत्र कावेरी की जान का दुश्मन बना है। यहां गहरी खुदाई के लिए और उसके बाद वहां से निकलने वाले कोयले को नदी के पानी से साफ किया जाता है और इस तरह दूषित जल सीधे नदी में फिर बहा दिया जाता है, तभी मन्नारगुडी के आस-पास कई किलोमीटर तक नदी का पानी काला-नीला दिखता है।

सिंचाई, सफाई और सियासत के भंवर में फंसी 770 किलोमीटर लंबी कावेरी की सबसे ज्यादा दुर्गति कर्नाटक के कुर्ग जिले में ही है। यह इलाका काफी उत्पादक है और सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि चार लाख पचहत्तर हजार टन कॉफी का कचरा सीधे नदी में जा रहा है। कुर्ग शहर की एक लाख आबादी का पूरा निस्तार बगैर सफाई के नदी में मिलता है। यह इलाका सूअर के गोश्त के व्यापार के लिए भी जाना जाता है और हजारों बूचडखाने का गंदा पानी इसमें सीधे मिलाने में किसी को कोई संकोच नहीं होता। कुछ समय पहले प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक और राज्य ज्ञान आयोग के अध्यक्ष प्रो. के कस्तूरी रंगन ने राज्य शासन को एक रपट सौंपी थी, जिसमें कावेरी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए त्वरित विशेष प्रयास करने व उसके लिए अलग से बजट की बात की थी। रपट में बताया गया था कि कावेरी के किनारे उभर आए कई पर्यटनस्थल नदियों में सीवर की गंदगी बढ़ा रहे हैं, वहीं इससे रेत का अवैध खनन इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। जब बैंगलुरु जैसे महानगर और व्यापारिक केंद्र पर जलसंकट आता है तो कावेरी की याद आती है। काश कावेरी को हर समय याद रखा जाए तो प्यास के नौबत ही नहीं आएगी।


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