Friday, March 13, 2026
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अमृतवाणी: धैर्य और सेवा

घटना सन 1936 की है। उन दिनों बापू वर्धा से सेवाग्राम चले गए थे। वहां उन्होंने आसपास के ग्रामीणों से संपर्क करना प्रारंभ कर दिया। वे रोज उन लोगों को सफाई का महत्व बताते और नियमित रूप से उस क्षेत्र में सफाई भी करते। कभी गलियों में झाड़ू लगाते तो कभी मैले-कुचैले नन्हें बच्चों को स्नान कराते। यहां तक कि बापू उनके गंदे कपड़ों को धोने में भी संकोच नहीं करते थे। ऐसा करते हुए बापू को दो-तीन महीने हो गए। लेकिन वहां के लोगों में स्वच्छता व सफाई के प्रति कोई लगाव नजर नहीं आया। वे मैले-कुचैले ही घूमते रहते। बापू के साथ आए कार्यकर्ता ये सब देख रहे थे। एक दिन एक कार्यकर्ता बापू से बोला, बापू, आपको इन लोगों की सेवा करते हुए महीनों बीत गए, पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। अपनी सफाई तो छोड़ो, ये तो बच्चों को भी साफ नहीं रखते। वे गंदा पहनते हैं, गंदा खाते हैं। इनमें कोई चेतना नजर आती नहीं दिख रही है। आखिर यह कब तक चलेगा? यदि आपने खुद उन्हें साफ कपड़े पहना दिए या अच्छा भोजन करा दिया तो ठीक, वरना उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। कार्यकर्ता की बात सुनकर बापू बोले, बस इतने में ही धैर्य खो दिया। अरे भाई, जिन ग्रामीणों की हम सदियों से उपेक्षा करते आए हैं। उनकी कुछ वर्षों तक तो नि:स्स्वार्थ सेवा करनी ही होगी। आपको धैर्य के साथ काम लेना होगा। देश धीरे-धीरे ही प्रगति के पथ पर बढ़ता है। नवनिर्माण में किसी चमत्कार की आशा नहीं करनी चाहिए। आज भले ही स्वच्छता के प्रति इनके मन में उपेक्षा का भाव हो, पर एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सफाई इनके जीवन का एक अंग बन जाएगी। कार्यकर्ता गांधीजी की बात समझ कर सहमत हो गया।
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