Sunday, May 10, 2026
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जनसंख्या : फसाना या हकीकत

Samvad 52


SUBHASH GATADEआधा ज्ञान या आधी जानकारी हमेशा ही खतरनाक साबित होती है। 2021 की जनगणना तक करने में फिसड्डी साबित हो चुकी मोदी सरकार की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ से चुनावों के ऐन बीच जारी आंकड़े शायद यही कहानी कहते हैं। इस रिपोर्ट के जरिए 1951 से 2021 के कालखंड के दौरान विभिन्न समुदायों की आबादी में हुए परिवर्तनों के आंकड़े पेश किए गए, जिसमें हिन्दुओं, जैनियों तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी मे कुल गिरावट देखने को मिली है, जबकि मुसलमानों की आबादी बढ़ी है। और इस रिपोर्ट को लेकर सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ताओं ने तथा मुख्यधारा के गोदी चैनलों ने जनसंख्या का हौवा दिखाते हुए बहस भी छेड़ने की कोशिश की थी। पीटीआई की तरफ से जारी यह आंकड़े इस प्रकार थे: वर्ष 1951 से 2015 के बीच जहां हिंदुओं की आबादी में 7.8 फीसदी की घटोत्तरी हुई वहीं मुसलमानों की आबादी 43.1 फीसदी बढ़ी। अगर हम आंकड़ों का ब्रेकअप करें तो 1950 में जहां आबादी में हिंदुओं की तादाद 84.68 फीसदी थी तो वह 2015 में 78.06 फीसदी तक पहुंची थी, जबकि मुसलमानों की आबादी जहां 1950 में कुल आबादी का 9.84 फीसदी थी तो 2015 में वह 14.09 फीसदी तक पहुंची। भारत के जैन समुदाय के बारे में भी बताया गया कि उनकी आबादी देश की कुल आबादी के 0.45 फीसदी से लेकर 0.36 फीसदी तक कम हुई है।

सबसे पहली बात यह है कि इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ से जारी इन आंकड़ों में नया कुछ नहीं है। 2011 तक जो जनगणना का सिलसिला विधिवत चला है, उसके बाद यह आंकड़े पहले से ही चर्चा में रहे हैं। उदाहरण के लिए अगर हम हाल में ही प्रकाशित किताब ‘लव जिहाद एण्ड अदर फिक्शन्स: सिम्पल फैक्टस टू काउंटर वायरल फॉल्सहुडस’ को पलटें जिसके लेखक अग्रणी पत्रकार श्रीनिवास जैन, मरियम अलवी तथा सुप्रिया शर्मा रहे हैं, तो उसमें यह आंकड़े आप को मिल जाएंगे।

कहने का अर्थ यह है कि कि ऐन चुनावों के ऐन बीच-जबकि खुद प्रधानमंत्राी मोदी मुसलमानों को लेकर जगह जगह दिए गए अपने विवादास्पद बयानों के लिए सुर्खियों में है, विपक्षी पार्टियों ने इसे लेकर चुनाव आयोग से शिकायत भी की है, तथा अदालतों की भी शरण ली है, उस समय इन पुराने आंकड़ों को जारी करना एक खास माहौल बनाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने ठीक कहा है कि जो सरकार 2021 की जनगणना तक नहीं कर सकी, उसकी एक सलाहकार समिति द्वारा ऐसे आंकड़ों को जारी करना, एक गैरजिम्मेदारी का काम है।
पॉपुलेशन फाउण्डेशन आफ इंडिया-जो विगत आधी सदी से अधिक समय से जनसंख्या के स्वास्थ्य और विकास रणनीतियों की बात करता रहा है, उसकी तरफ से यही कहा गया कि इनके आधार पर खास समुदायों के खिलाफ डर और भेदभाव की स्थिति पैदा करना निहायत गलत है। इस मसले पर रोशनी डालते हुए उसने दो अहम पहलुओं की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की: एक, प्रजनन दर / फर्टिलिटी रेट ; दो, जनगणना के आंकड़ों से साबित होता सत्य। फाउंडेशन का कहना था कि प्रजनन दर हमेशा ही शिक्षा और आय के स्तर से बेहद करीबी से जुड़ी होती है, न कि धर्म से। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य जहां शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक आर्थिक विकास सुगम है वहां पर सभी धार्मिक समूहों में कुल प्रजनन दर कम दिखती है। जनगणना के आंकड़ों को उद्धृत करते हुए उसकी तरफ से यह कहा गया कि मुसलमानों की आबादी 1981 से 1991 के दरमियान जहां 32.9 फीसदी से बढ़ी है वहीं 2001 और 2011 के दरमियान यह प्रतिशत 24.6 फीसदी रहा है। और हिंदुओं में यही आंकड़े 22.7 फीसदी से 16.8 फीसदी रहे हैं। कहने का तात्पर्य अध्ययन और सांख्यिकी के आंकड़े यही प्रमाणित करते हैं कि जनसंख्या विज्ञान धर्म से तटस्थ होता है, जबकि संकीर्णमना ताकतें उसे अपने पक्ष में करने की कोशिश में रहती हैं। तय बात है कि 2021 की जनगणना के आंकड़े सामने आते तो ऐसे शरारतीपूर्ण ढंग से हौवा बनाने की कोशिश असंभव थी।

ध्यान देने योग्य बात है कि ऐसी शरारतपूर्ण कोशिश बार बार सामने आती रहती है। याद कर सकते हैं कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो इसके पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर पदासीन थे, उन्होंने भी अपने उस कार्यकाल में जनसंख्या को लेकर इस भ्रांति को खूब हवा दी थी। एक तरफ उन्होंने जहां शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर पीड़ित मुस्लिम समुदाय का मजाक उड़ाया था कि किस तरह उन्होंने इन शिविरों को ‘बच्चा पैदा करने की फैक्टरियों’ में तब्दील किया है। उन्हीं दिनों उनके खिलाफ उन्माद पैदा करने के लिए ‘हम दो हमारे दो ; वह पांच, उनके पचीस’ जैसा भड़काऊ नारा भी खूब उछला था। दिलचस्प है कि मोदी सरकार के केंद्र में सत्तारोहण के पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा इस मसले को अलग ढंग से उठाया गया था, जिसमें इसी तरह हिंदुओं की घटती आबादी की बात करते हुए कहा गया था कि उन्हें चाहिए कि वह अधिक बच्चे पैदा करें और परिवार-नियोजन की नीतियो से तौबा करे। उन दिनों देश के एक अग्रणी अखबार (डीएनए) ने इस मसले पर तमाम विशेषज्ञों से बात की थी। उनका कहना था कि ‘भले ही मुसलमानों का वृद्धि दर हिंदुओं की तुलना में थोड़ा अधिक है, हकीकत यही है कि विगत कुछ वर्षों में उसमें गिरावट देखी जा सकती है। संघ ने इस मामले में अतिशयोक्ति का परिचय दिया है और ‘जनसंख्या असन्तुलन’ को लेकर गैरवाजिब चिन्ता प्रगट की है।
2024 के आम चुनावों के ऐन बीच प्रधानमंत्री के इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ जारी-पहले से मालूम-इन आंकड़ों के जरिए की जा रही यह गैरजिम्मेदारीपूर्ण कोशिश, याद दिला सकती है वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों के ऐन मौकों पर जनगणना के धार्मिक आंकड़ों को इसी तरह पेश करने की ताकि उसके आंशिक निष्कर्षों को सामने लाकर अल्पसंख्यकों की ‘बढ़ती आबादी’ के नाम पर बहुसंख्यकों का ध्रुवीकरण किया जा सके। विडम्बना है कि जनगणना के जाति सम्बन्धी आंकड़ों पर उस वक्त भी चुप्पी बरती गई थी जिसकी लंबे समय से मांग हो रही है।

और मीडिया जिसे ‘लोकतंत्र का प्रहरी’ कहा जाता है उसने भी-चंद अपवादों को छोड़ दें तो-एक तरह से इसी सुर में सुर मिला लिया था। हालांकि ‘राजस्थान पत्रिका’ के गुजरात संस्करण जैसे चंद अपवाद भी थे, जिन्होंने आबादी में प्रमुख धर्मों के मौजूदा प्रतिशत को बताते हुए इस बात को रेखांकित किया कि ‘मुस्लिमों की बढ़ोत्तरी दर पिछले दशक के मुकाबले घटी’ तो ‘द टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट थी ‘सेन्सस नेल्स प्रमोटर्स आफ पैरोनेइया’ अर्थात ‘जनगणना के आंकड़ों ने फर्जी आतंक पैदा करनेवालों पर नकेल डाली’।


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