Tuesday, April 28, 2026
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डोर ढीली छोड़िए, बच्चे को कुछ करने दीजिए


शिखर चंद जैन


बचपन अनमोल है और हम सब चाहते हैं कि हमारा बच्चा अपना सर्वोत्तम बचपन जिए लेकिन इसके लिए हर वक्त उसके आसपास मौजूद रहना, नाचना-कूदना, उसे हंसाना या उसकी एक-एक बात पर राजी हो जाना जरूरी नहीं है। इसके लिए उसका मानसिक और शारीरिक विकास कुदरती तौर पर होने देना जरूरी है। बंधन में रखेंगे, तो वह एक सीमित दायरे और खोल में ही सिमटा हुआ रह जाएगा।
एक जमाना था जब मां अपने घर का काम करती रहती थीं या थकहार कर दोपहर में सोई रहती थी और उनका बच्चा दुनिया जहान की शैतानियां करता रहता, इधर-उधर खेलता, कभी पड़ोसियों के घर चला जाता, कभी आंगन में पड़े बर्तनों की उठा पटक करता, तो कभी घर के सामने मिट्टी में खेलकूद कर मस्त रहता। मां नहला-धुला देती, समय पर उसकी पेट पूजा करवा देती और मस्त रहती। पापा सुबह-शाम गोदी में लेकर जरा दुलार लेते और बाकी वक्त अपने काम में लगे रहते।
यकीन मानिए न तो इन बच्चों का इम्यून सिस्टम कमजोर होता था न ये शारीरिक या बौद्धिक रूप से कमजोर होते थे। इन्हें हर महीने या बीस दिन में डाक्टरों की प्रिस्क्राइब की हुई एंटीबायोटिक भी नहीं खिलानी पड़ती थी। सर्दी जुकाम या बुखार होता तो मां काढ़ा पिला देती, चोट लगती तो हल्दी या बोरिक पाउडर लगा देती, फिर छुट्टी।
ये बच्चे अपने ही खेल ईजाद करके आपस में रेलगाड़ी, मछली जल की रानी, खो-खो, आइस-पाइस (छुप्पन-छुप्पी) आदि खेलते रहते थे। कभी बस के कंडक्टर बन जाते, तो कभी अपनी गुड़िया और गुड्उे का ब्याह रचाते।

ओवर प्रोटेक्शन बना रहा कमजोर 

लेकिन आज कल के पेरैंट अपने बच्चों के प्रति ओवर प्रोटैक्टिव हो गए हैं और उनकी एक एक गतिविधि पर तीखी नजर रखते हैं। उन्हें हर पल अपने बच्चे के बीमार पड़ने का डर लगता है। सच तो यह है कि इसी वजह से आजकल बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से नाजुक होने लगे हैं। इतनी पहरेदारी से उनका दम घुटता है। मां-बाप की अतिरिक्त उम्मीदों से उन्हें बचपन से ही स्ट्रेस और एंग्जायटी जैसी मानसिक बीमारियां जकड़ लेती हैं और आउटडोर स्पोर्ट्स में हिस्सा न लेने के कारण उनकी बाडी फिटनेस कम होने लगी है। मां-बाप बच्चे को इलेक्ट्रानिक गैजेट्स दे देते हैं, ताकि वह बाहर न निकले और घर में खेले लेकिन इससे जल्दी ही उसे चश्मा चढ़ जाता है। हर वक्त की पहरेदारी और उसकी चिंता से जाने-अनजाने में हम बच्चे का सर्वांगीण विकास होने से रोक देते हैं।

बोर होने दीजिए, सीखेगा

आखिर हमें बच्चे को हर वक्त क्यों इंटरटेन करना चाहिए? क्या दिक्कत है अगर हम कुछ देर उसे बोर होने दें या फिर अपने मनोरंजन का इंतजाम खुद ही करने दें? या उसे अकेला छोड़कर अपनी कल्पना के सागर में गोते लगाने दें? बोरियत और अकेलापन बच्चों को बहुत कुछ सिखाता है। इसी से बच्चे में कल्पना शक्ति और क्रिएटिविटी का विकास होता है। अपने अकेलेपन को दूर करने के उपाय वह खुद ढ़ूंढनेलगता है।
बचपन अनमोल है और हम सब चाहते हैं कि हमारा बच्चा अपना सर्वोत्तम बचपन जिए लेकिन इसके लिए हर वक्त उसके आसपास मौजूद रहना, नाचना-कूदना, उसे हंसाना या उसकी एक-एक बात पर राजी हो जाना जरूरी नहीं है। इसके लिए उसका मानसिक और शारीरिक विकास कुदरती तौर पर होने देना जरूरी है। बंधन में रखेंगे, तो वह एक सीमित दायरे और खोल में ही सिमटा हुआ रह जाएगा।

उसे स्पेस दें 

 मनोविज्ञानी कहते हैं कि बच्चों को हर वक्त अपने आसपास माता-पिता या बड़ों को देखकर डर लगता है। ऐसे में वह अपनी बालसुलभ गतिविधियों को सहज रूप से अंजाम नहीं दे पाता। ऐसा बच्चों के साथ ही नहीं, बड़ों के साथ भी होता है। कोई हमारे सामने आकर खड़ा हो जाए तो हम असहज हो जाते हैं और अपना काम सही ढंग से नहीं कर पाते। चाहे वह लेखन हो या फिर हिसाब-किताब आदि। बच्चों के सिर पर अगर आकर आप खड़े होंगे तो वह इसलिए डरेंगे कि अभी वह जो कुछ करेगा उसमें आप कमियां निकालेंगे।
इसलिए उन्हें अपना वक्त लेने दें और उसे उन्मुक्त होकर खेलने दें। हो सकता है कि आपका बच्चा कुछ अलग सोच रहा हो और कुछ अलग दिखाने की कोशिश कर रहा हो। इसके लिए उसका एकांत में रहना जरूरी है। बार-बार जाकर डिस्टर्ब न करें और दूर से उसकी गतिविधि या सृजन को देखें. बच्चा कुछ नया गढ़ेगा या खेलेगा तो आप खुद उसे देख कर निहाल हो जाएंगी।
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