
डॉ. अजीत कुमार
धान भारत समेत कई एशियाई देशों की मुख्य खाद्य फसल है। इतना ही नहीं दुनिया में मक्का के बाद जो फसल सबसे ज्यादा बोई और उगाई जाती है, वो धान ही है। करोड़ों किसान धान की खेती करते हैं। खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान लगभग पूरे भारत में लगाई जाती है। अगर कुछ बातों का शुरू से ही ध्यान में रखा जाए तो धान की फसल ज्यादा मुनाफा देती है। धान की खेती की शुरूआत नर्सरी से होती है, इसलिए बीजों का अच्छा होना जरूरी है। कई बार किसान महंगा बीज-खाद तो लगाते ही है, लेकिन उनको सही उपज नहीं मिल पाती है, इसलिए बुवाई से पहले बीज व खेत का उपचार कर लेना बहुत जरूरी होता है।
बीज महंगा होना जरुरी नहीं है, बल्कि विश्वसनीय और आपके क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के मुताबिक होनी चाहिए। भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के कृषि वैज्ञानिक डॉ. पी. रघुवीर राव बताते हैं, ‘देश के अलग-अलग राज्यों में धान की खेती होती है और हर जगह मौसम भी अलग होता है, हर जगह के हिसाब से धान की किस्में विकसित की जाती हैं, इसलिए किसानों को अपने प्रदेश के हिसाब से विकसित किस्मों की ही खेती करनी चाहिए।’ वो आगे बताते हैं, ‘मई की शुरुआत से किसानों को खेती की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, ताकि मानसून आते ही धान की रोपाई कर दें।’ किसानों को बीज शोधन के प्रति जागरूक होना चाहिए। बीज शोधन करके धान को कई तरह के रोगों से बचाया जा सकता है। किसानों को एक हेक्टेयर धान की रोपाई के लिए बीज शोधन की प्रक्रिया में महज 25-30 रुपये खर्च करने होते हैं।
धान की खेती भारतीय कृषि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत ने वर्ष 2021-22 में अकेले खरीफ के मौसम में 111.76 मिलियन टन का उत्पादन किया। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। पिछले एक दशक से धान की फसल के उत्पादन में निरंतर वृद्धि हुई है। भारत में धान की खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो किसी भी अन्य कृषि फसल की तुलना में कहीं अधिक है। चावल का उत्पादन पूरे देश में होता है।
हानिकारक कीट और रोकथाम
जड़ की सुंडी : जड़ को लगने वाली सुंडी की पहचान बूटों की जड़ और पत्तों को पहुंचे नुकसान से लगाई जा सकती है। यह सफेद रंग की बिना टांगों वाली होती है। यह मुख्य तौर पर पौधे की जड़ पर ही हमला करती है। इसके हमले के बाद पौधे पीले होने शुरू होने लगते है और उनका विकास रूक जाता है। इस कारण धान के पत्तों के ऊपर दानों के निशान उभर आते हैं। इसका हमला दिखने पर कार्बरिल (4जी) 10 किलो या फोरेट (10जी) 4 किलो या कार्बोफियूरॉन (3जी) 10 किलो को प्रति एकड़ में डालें।
पौधे का टिड्डा : इन कीटों का फसल के ऊपर हमला खड़े पानी वाले या वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में ज्यादा होता है। इनकी मौजूदगी का अंदाजा पौधे का भूरे रंग में बदलना या दीमक की मौजूदगी और पौधे की जड़ के नजदीक शहद की तरह बूंदों की मौजूदगी से लगता है। यदि इसका हमला दिखे तो डाइक्लोरवॉस 126 मि.ली. या कार्बरील 400 ग्राम को 250 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें या इमीडाक्लोप्रिड 40 मिली या क्विनलफॉस 25 ईसी 400 मिली या क्लोरपाइरीफॉस एक लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें।
पत्ता लपेट सुंडी : इन बीमारियों के कीटाणुओं का फसल के ऊपर उच्च नमी वाले क्षेत्रों में और खास तौर पर जिन इलाकों में धान की पैदावार लगातार की जा रही हो वहां ज्यादा देखने को मिलती है। इस कीटाणु का लार्वा पत्तों को लपेट लेता है और बूटे के तंतुओं को खा जाता है। इसके हमले के बाद पत्तों में सफेद धारियां बन जाती हैं। यदि इसके हमले के लक्षण दिखाई दे तो फसल के ऊपर कारटाईप हाइड्रोक्लोराइड 170 ग्राम या टराईजोफॉस 350 मिली या एक लीटर क्लोरपाइरीफॉस को 100 लीटर पानी में मिला के प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
राइस हिस्पा : कुछ जिलों में धान की फसल पर इस कीट के हमले के ज्यादा केस सामने आते हैं। इस कीट का लार्वा पत्तों में छेद करके पत्तों को नष्ट कर देता है। इसके हमले के बाद पत्तों पर सफेद धारियां उभर आती हैं। इसका हमला दिखाई देने पर फसल के ऊपर 120 मिली मिथाइल पैराथियान या क्विनलफॉस 25 ईसी 400 मिली या क्लोरपाइरीफॉस एक लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
तना छेदक : इस कीटाणु का लार्वा धान के पौधे की बन रही बालियों में प्रवेश करके उसको खा जाता है, जिससे बालियां धीरे धीरे सूखकर खाली हो जाती है, जो बाद में सफेद रंग में तबदील हो जाती हैं। यदि इसके हमले के लक्षण दिखाई दे तो फसल के ऊपर कार्टाइप हाइड्रोक्लोराईड 170 ग्राम या टराईजोफॉस 350 मिली या एक लीटर कलोरपाइरीफॉस को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
बीमारियां और रोकथाम
भुरड़ रोग : झुलस रोग के कारण पत्तों के ऊपर तिरछे धब्बे जो कि अंदर से सलेटी रंग और बाहर से भूरे रंग के दिखाई देते हैं। इससे फसल की बालियां गल जाती हैं और उसके दाने गिरने शुरू हो जाते हैं। जिन क्षेत्रों में नाइट्रोजन का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है। वहां इस बीमारी का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है। इसका हमला दिखने पर जिनेब 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
करनाल बंट : लाग की शुरुआत पहले बालियों के कुछ दानों पर होती है और इससे ग्रसित दाने बाद में काले रंग का चूरा बन जाते हैं। हालत ज्यादा खराब होने की सूरत में पूरे का पूरा सिट्टा प्रभावित होता है, और सारा सिट्टा खराब होकर काला चूरा बनाकर पत्ते दानों पर गिरना शुरू हो जाते है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए नाइट्रोजन की ज्यादा प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए। जब फसल पर 10 प्रतिशत बालियां निकल जायें तब टिल्ट 25 ई सी 200 मिली को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें और 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
झूठी कांगियारी: इस रोग के कारण फफूंद की तरह हर दाने के ऊपर हरे रंग की परत जम जाती है। उच्च नमी, ज्यादा वर्षा और बादलवाई हालातों में यह बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए जब बालियां बननी शुरू हो जाये उस समय 500 ग्राम कॉपर आॅक्सीक्लोराइड को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर टिल्ट 25 ई सी 200 मिली को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
तने का झुलस रोग: पत्तों की परत के ऊपर सलेटी रंग के जामुनी रंग की धारी वाले धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में यह धब्बे बड़े हो जाते हैं। इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फसल में ज्यादा दाना नहीं पड़ता। नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग नहीं करना चाहिए। खेत का साफ सुथरा रखें। यदि इसका हमला दिखे तो टैबुकोनाजोल 200 मि.ली या 200ॅे टिल्ट 25 ई सी या 200 ग्राम का 25% कार्बेनडाजिम 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें। (लेखक इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी बरेली में कृषि विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं)


