Friday, March 20, 2026
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‘आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगीं…!’

Samvad 50

41 1हिंदुस्तानियत के अलबेले पैरोकार और नाना परतों वाली निराली शख्सियत के स्वामी।’ उर्दू के मीर तकी मीर और मिर्जा गालिब के बाद के सबसे बडेÞ शायर और आलोचक फिराक गोरखपुरी (28 अगस्त, 1896-03 मार्च, 1982) की बाबत एक वाक्य में कुछ इसी तरह बताया जा सकता है। अलबत्ता, उनके आत्मविश्वास से परिपूर्ण इस आत्ममूल्यांकन को याद रखते हुए : ‘आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरो/जब ये खयाल आएगा उनको, तुमने ‘फिराक’ को देखा है’।

उनका यह आत्मविश्वास यहीं तक सीमित नहीं रहता। उनके इस एलान तक जाता है : ‘गालिब’ ओ ‘मीर’ ‘मुसहफी’/हम भी ‘फिराक’ कम नहीं’। ऐसे में क्या आश्चर्य कि कभी दार्शनिक तो कभी खालिस शायराना नजर आने वाली उनकी शख्सियत को कोई आदिविद्रोही का नाम देता है, कोई पहेली का तो कोई हमेशा धारा के विरुद्ध तैरने वाले हाजिरजवाब और तुनुकमिजाज का।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की गोला तहसील के बनवारपार गांव में उनका जन्म हुआ तो मां-बाप ने उन्हें रघुपति सहाय नाम दिया था। उनके पिता मुंशी गोरखप्रसाद ‘इबरत’ गोरखपुर के अपने वक्त के प्रसिद्ध वकील तो थे ही, शायर भी थे। इसलिए कई लोग कहते हैं कि फिराक को शायरी उनकी घुट्टी में ही पिला दी गई थी। अलबत्ता, वह परवान तब चढ़ी, जब वे उच्च शिक्षा के लिए गोरखपुर से इलाहाबाद गए और वहां के बेहतर अदबी माहौल में अपनी काव्य रुचियों को निखारा। यहां जानना दिलचस्प है कि पिता गोरख प्रसाद ने स्कूल भेजने से पहले अरबी, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत की शुरुआती शिक्षा उन्हें खुद दी थी और 1917 में ग्रेजुएट हो जाने के दो साल बाद 1919 में वे सिविल सर्विस के लिए चुन लिए गए थे।

लेकिन अगले ही साल उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के ‘गुनाह’ में डेढ़ साल तक जेल में रहे थे। 1922 में छूटे और कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव बने तो भी उस पद पर टिक नहीं पाए। अनंतर, 1930 में आगरा विश्वविद्यालय की एमए अंग्रेजी की परीक्षा में टॉप करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाना आरंभ किया तो 1959 में सेवानिवृत्ति तक पढ़ाते रहे।

इस बीच 1951-52 में लोकसभा का पहला आमचुनाव हुआ तो जानें क्या सूझी कि गोरखपुर डिस्ट्रिक्ट साउथ सीट से आचार्य जेबी कृपलानी की नवगठित किसान मजदूर प्रजा पार्टी के प्रत्याशी बन गए। कहते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी शिब्बनलाल सक्सेना (जिनसे उनकी गहरी छनती थी और जो खुद भी कांग्रेस छोड़ आचार्य कृपलानी के साथ हो गए थे) ने इसके लिए उन पर बहुत दबाव डाला था। यह भी कहते हैं कि महात्मा गांधी के चौरा-चौरीकांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के बाद से ही महात्मा और कांग्रेस के प्रति उनका मन खट्टा हो गया था। लेकिन चुनाव लड़ना उन्हें रास नहीं आया। मुख्य मुकाबला कांग्रेस के सिंहासन सिंह और तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ के बीच हुआ, जिसमें सिंहासन सिंह जीते, जबकि फिराक की जमानत जब्त हो गई। इससे वे इस हद तक निराश हुए कि कुछ ही दिनों बाद भेंट होने पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने पूछा कि ‘रघुपति सहाय साहब, कैसे हैं आप?’ तो उनका जवाब था, ‘अब ‘सहाय’ कहां? अब तो बस ‘हाय’ रह गया हूं!!’

तिस पर विडम्बना देखिये कि जो फिराक 1952 में लोकसभा जाना चाहते थे, उन्होंने 1977 में इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें दिया गया राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव एक झटके में ठुकरा दिया था। उनके व्यक्तित्व का एक और विरोधाभास यह है कि वे शायर उर्दू के थे, शिक्षक अंग्रेजी के और मानते थे कि इस देश में अंग्रेजी सिर्फ ढाई लोगों को आती है। उन्हें और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पूरी-पूरी जबकि नेहरू को आधी। वे जिससे भी नाराज होते, उसे धाराप्रवाह गालियां देने लगते थे। एक बार विश्वनाथ त्रिपाठी (जो अब वरिष्ठ आलोचक हैं) से बात कर रहे थे तो किसी प्रसंग में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को गलियाना शुरू कर दिया और त्रिपाठी के यह कहने पर भी नहीं माने कि वे उनके गुरु हैं। अंतत: त्रिपाठी को उनसे कहना पड़ा कि अब बस कीजिए, वरना मैं आपको ढेला मारकर भागूंगा और आप मुझे पकड़ नहीं पाएंगे।

उन्होंने अपने छ: दशकों लंबे साहित्यिक जीवन में कोई 40 हजार कविताएं, नज्में, गजलें, कतए, रूबाइयां और समीक्षाएं वगैरह लिखीं। जहां अपनी नई इश्किया शायरी को परवान चढ़ाते हुए लिखा कि ‘इश्क तौफीक है, गुनाह नहीं’, वहीं मजदूरों और मेहनतकशों की जिन्दगी पर भी कलम चलाई।

1969 में उन्हें मिला ज्ञानपीठ परस्कार उर्दू साहित्य के खाते में आने वाला पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार था और उसकी बहुत चर्चा हुई थी। इस कारण और कि पुरस्कार की घोषणा के बाद फिराक ने अपने एक साक्षात्कार में कह दिया था कि उर्दू गजल को हिंदुस्तान में आए अर्सा हो गया, फिर भी उसमें यहां के खेत-खलिहान, समाज-संस्कृति, गंगा-यमुना और हिमालय नहीं दिखाई पड़ते। उनका मानना था कि उनकी शायरी में करुण और शांत रसों का जैसा संगम है, उनसे पहले उर्दू कविता में बहुत कम देखा गया है। ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के साल भर पहले 1968 में भारत सरकार उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित कर चुकी थी, जबकि अगले साल 1970 में उन्हें उनकी काव्यकृति ‘गुले नगमा’ के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार और उसकी सदस्यता हासिल हुई थी। इतना ही नहीं, उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी विभूषित किया गया था।

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