Monday, April 20, 2026
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आजादी के बाद का वह पहला कुंभ

Samvad 44

इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जब भी कुंभ या महाकुंभ मेला आता है, बड़े-बुजुर्गों को 1954 के कुंभ में तीन फरवरी को मौनी अमावस्या के शाही स्नान के दौरान अचानक हुई भगदड़ से मचे हाहाकार की डरावनी यादें सताने लग जाती हैं। सताएं भी क्यों नहीं, उस हाहाकार में जरा-सी देर में बच्चों, महिलाओं व वृद्धों समेत कोई आठ सौ (कुछ स्रोतों के अनुसार एक हजार से ज्यादा) लोगों ने जानें गंवा दी थीं। यह तब था, जब आजादी के बाद का पहला कुम्भ मेला होने के कारण देशवासियों में उसे लेकर अतिरिक्त उल्लास था और उन्हें उम्मीद थी कि उसमें पारम्परिक आस्था का समुद्र तो लहरायेगा ही, गुलामी की जंजीरें टूट जाने के उल्लास के अनेक इंद्रधनुषी रंग भी बिखरेंगे। ऐसे में मौत के तांडव की बाबत भला सोच भी कौन सकता था! स्थानीय प्रशासन ने, इस अनुमान के आधार पर कि इस मेले में स्नानार्थियों की संख्या नया रेकार्ड बना सकती है, उन दिनों की साधनहीनता की स्थिति में भी उसके स्नानों को व्यवस्थित, अनुशासित व संयमित रखने के हर संभव इंतजाम किए थे। लेकिन अचानक हालात ऐसे बिगड़े कि सब धरा का धरा रह गया और जितने मुंह उतनी बातें हो गर्इं।

इनमें पहली बात अभी भी कई हल्कों में इरादतन बहुत जोर देकर कही जाती है (खासकर उन लोगों द्वारा जो पं. जवाहरलाल नेहरू को बेवजह भी आरोपित करने व कठघरे में खड़े करने में लगे रहते हैं)। यह कि इस कुंभ के साक्षी बनने की लालसा में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे ही त्रिवेणी रोड से बांध के नीचे उतरते हुए मुगल बादशाह अकबर के बनवाये ऐतिहासिक किले की ओर बढ़े (जिसके बुर्ज में कथित तौर पर उनके आतिथ्य सत्कार की व्यवस्था की गयी थी) स्नानार्थियों में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। कारण यह कि उनकी भीड़ को संभालने के लिए तैनात ज्यादातर पुलिस बल राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुडे इंतजामों में लगा दिया गया। ठीक उसी वक्त एक अखाड़े का जुलूस बांध के रास्ते मेला क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ और किसी मार्ग-दर्शन व नियंत्रण के अभाव में अव्यवस्थित हो गया। फिर तो उस जुलूस को निकट से निहारने के अभिलाषी स्नानार्थियों की भीड़ भी बेकाबू हो गई और उसमें अचानक भगदड़ मच गई। उसके दबाव में जो भी लड़खड़ाया और नीचे गिरा, उसे संभलने का अवसर नहीं मिला।

दूसरी बात यह कही जाती है कि 2-3 फरवरी के बीच की रात गंगा का जलस्तर अचानक बहुत बढ़ गया, जिससे की साधुओं के संगम के किनारे स्थित आश्रमों में पानी भरने लगा। सुरक्षित जगह कब्जाने की हड़बड़ी में उनके बीच मारपीट होने लगी तो घबराहट फैली और लोग भागने लगे। तीसरी बात : एक हाथी अचानक भड़ककर भगदड़ का कारण बन गया तो रेतीले मैदान ने भी कुछ कम कहर नहीं बरपाया। इस मैदान में, जो महाकुंभ क्षेत्र का चालीस प्रतिशत था, जगह-जगह रेत के दलदल थे। उन पर लोहे की प्लेटें आदि बिछाकर रास्ते बनाए गए थे और दलदलों को प्रतिबंधित किया गया था। लेकिन जान संकट में आई तो स्नानार्थी दल-दलों की ओर भी भागे और उनमें फंस व धंसकर मौत के शिकार हुए। गौरतलब है कि उन दिनों कुंभ क्षेत्र और स्नान घाटों की संख्या दोनों बहुत कम थे।

लेकिन प्रयागराज निवासी और उक्त भगदड़ के प्रत्यक्षदर्शी रहे वरिष्ठ पत्रकार नरेश मिश्र इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। पिछले दिनों उन्होंने बीबीसी को एक बातचीत में बताया था कि शाही स्नान के बीच लगभग साढ़े आठ बजे संगम चौराहे पर शहर की तरफ से आती स्नानार्थियों की भीड़ इकट्ठी हो गई। इधर से स्नान के लिए आगे बढ़ने को व्याकुल यह भीड़ और उधर से स्नान कर लौटने वालों की, जबकि बीच में संगम के नीचे की ओर से (जो सड़क पातालशाही हनुमान मंदिर की ओर जाती है, वहां से) दशनामी संन्यासियों का पेशवाई जुलूस निकल रहा था।

मिश्र के मुताबिक पुलिस ने दो अखाड़ों को रोककर या उनके बीच समय का अंतराल रखकर आने-जाने वाली भीड़ को रास्ता दे दिया होता, तो कुछ नहीं होता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जुलूस निकलता रहा और संगम चौराहे पर व्याकुल भीड़ धीरज खोती रही। एक पेशवाई जुलूस से दूसरे जुलूस के बीच जैसे ही कुछ मिनटों का अवकाश मिला, भीड़ खुद ही वहां से निकलने की कोशिश करने लगी। ऊपर वाले लोग नीचे भागे और नीचे वाले ऊपर की ओर तो पुलिस उन्हें नियंत्रित नहीं कर पाई। इसके बाद पैंतालीस मिनट तक महाकाल का तांडव चलता रहा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इसे लेकर नेहरू पर बरसने से बाज नहीं आए थे। अपनी कौशांबी की सभा में गलतबयानी करते हुए उन्होंने कहा था : एक बार (यानी 1954 में) पंडित नेहरू जब कुंभ में आए तो अव्यवस्था के कारण भगदड़ मच गई थी, हजारों लोग मारे गए थे। सच यह है कि भगदड़ के वक्त केवल राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अकबर के किले के बुर्ज पर बैठकर दशनामी संन्यासियों का जुलूस देख रहे थे। दूसरी ओर यह दावा करने वाले प्रत्यक्षदर्शी भी हैं कि पहले अफवाह उड़ाई गई कि नेहरू का हेलीकॉप्टर आ रहा है। फिर लोग उन्हें देखने की लालसा से खाली स्थान की ओर भागे तो अव्यवस्था फैली। जो भी हो, भगदड़ मची तो महिलाओं, खासकर गर्भवतियों, धात्रियों, बच्चों व वृद्धों की शामत आ गई। भीड़ ने उनके जिन्दा रहते तो उन्हें कुचला ही, शवों में बदल जाने पर भी कुचलती रही। अधिकृत सूत्रों के अनुसार कुल आठ सौ स्नानार्थी मारे गये, जबकि अनधिकृत सूत्रों ने यह संख्या एक हजार और घायलों की संख्या दो हजार बताई।

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