जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस वक्त देखने को मिला, जब करीब दो दशक बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक साथ एक मंच पर दिखाई देने जा रहे हैं। ‘मराठी अस्मिता’ को केंद्र में रखकर शनिवार सुबह मुंबई के वरली स्थित एनएससीआई डोम में आयोजित ‘विजय सभा’ में दोनों नेताओं की उपस्थिति को राजनीतिक गलियारों में गहरी नजरों से देखा जा रहा है। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) द्वारा संयुक्त रैली के दौरान भाईयों, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने गले मिलकर एक दूसरे को बधाई दी। महाराष्ट्र सरकार ने हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लागू करने के लिए दो सरकारी प्रस्तावों को रद्द कर दिया है।
एकता का कारण या चुनावी रणनीति?
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा लागू किए गए त्रिभाषा फॉर्मूले के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन को राज और उद्धव ठाकरे ने एकजुट होकर आवाज दी। सरकार को यह प्रस्ताव स्थगित करना पड़ा, जिसे ‘मराठी अस्मिता की जीत’ बताकर ‘विजय सभा’ का आयोजन किया गया है। सभा की खास बात यह रही कि इसमें किसी भी राजनीतिक पार्टी का झंडा नहीं दिखा, और यह पूरी तरह मराठी भाषा, संस्कृति और स्वाभिमान को समर्पित रही।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ भाषाई मुद्दा नहीं मान रहे। उनका मानना है कि यह मंच साझा करना मुंबई, ठाणे और पुणे महानगरपालिका चुनावों से पहले एक राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है।
संजय राउत का बयान
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने इसे “त्यौहार जैसा क्षण” बताया। उन्होंने कहा, “यह हमारा पुराना सपना था कि ठाकरे परिवार के दोनों नेता एक साथ आएं। अब जब वे मराठी मानुष के मुद्दे पर एकजुट हैं, यह महाराष्ट्र को नई दिशा देगा।”
क्या यह साथ स्थायी होगा?
इतिहास गवाह है कि 2014 और 2017 में भी राज और उद्धव के बीच एकता की कोशिशें हुई थीं, लेकिन नेतृत्व और संवादहीनता के मुद्दों पर बात आगे नहीं बढ़ सकी। राज ठाकरे ने पहले कई बार उद्धव ठाकरे पर संवाद न करने का आरोप लगाया था। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं — शिवसेना विभाजित हो चुकी है, और महाराष्ट्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक जटिल हो गई है।
राजनीतिक संकेत और विपक्ष की प्रतिक्रिया
सत्तारूढ़ दल के नेता इस एकजुटता को “चुनावी गठजोड़ की भूमिका” करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि ‘मराठी अस्मिता’ की आड़ में यह एक राजनीतिक मंचन है, ताकि क्षेत्रीय भावनाओं को भुनाया जा सके।
नज़रें अब आगे पर
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ठाकरे बंधुओं की यह नजदीकी केवल मंच तक सीमित रहेगी या महाराष्ट्र की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव लाएगी। क्या यह अवसर पुराने मतभेदों को पाटने का रास्ता बनेगा या फिर एक बार फिर विफल प्रयासों की सूची में जुड़ जाएगा — इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा।
#WATCH | Mumbai: Brothers, Uddhav Thackeray and Raj Thackeray share a hug as Shiv Sena (UBT) and Maharashtra Navnirman Sena (MNS) are holding a joint rally as the Maharashtra government scrapped two GRs to introduce Hindi as the third language.
— ANI (@ANI) July 5, 2025
(Source: Shiv Sena-UBT) pic.twitter.com/nSRrZV2cHT

