Tuesday, April 21, 2026
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नर्मदा बांध विरोध के चालीस साल

नर्मदा घाटी की तीन पीढ़ियों ने सामाजिक न्यापय और पर्यावरण संरक्षण की एक लौ को बड़ी शिद्दत से जलाए रखा है। करीब 40 बरस में मशाल बन चुके नर्मदा बचाओ आंदोलन का सफर छोटा नहीं है। सरदार सरोवर बाँध की मुखालिफत से शुरू हुई इस लड़ाई के पहले पर्यावरण शब्द नया था, हालांकि इसे लेकर मूलशी बांध विरोध, चिपको आंदोलन, सेव सायलेंट वेली और मिट्टी बचाओ अभियान जैसे आंदोलन अपनी छाप छोड़ चुके थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर से प्रभावित होने वाले निमाड-मालवा के आदिवासी-किसानों के पुनर्वास और वित्तीय मामलों के साथ प्रभावितों की रोजी-रोटी, उपजाऊ खेती और जंगलों के विनाश का मामला भी उठाया था। आंदोलन की सक्रियता के कारण विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय नजरिए से भी देखा-परखा जाने लगा।

आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग हुए और उन्हों ने विस्था,पन के अलावा अन्यल मामलों को भी उठाया। यह सिलसिला अभी भी जारी है। सरदार सरोवर के संघर्ष से प्रेरणा लेकर नर्मदा घाटी के ही बरगी, भीमगढ़, इंदिरा सागर, औंकारेश्व र, महेश्वेर, अपर वेदा, लोअर गोई, मान, जोबट आदि बांधों के प्रभावित अपने अधिकारों के लिए खड़े होते गए और नर्मदा बचाओ आंदोलन का हिस्सा बने। ऐसे संघर्ष देश के अन्यध हिस्सोंन में भी दिखाई दिए। यह एक आंदोलन के जनांदोलन बनने का उदाहरण है।

प्रभावितों की लड़ाई केवल नागरिकों के हकों की उपेक्षा करने वाली सरकारों के विरोध तक सीमित नहीं थी। सरदार सरोवर परियोजना के लिए 45 करोड़ डॉलर का कर्ज देने पर विश्वेबैंक को भी नर्मदा घाटी में विनाश का जिम्मेदार ठहराया गया और अंतत: उसे पीछे हटना पड़ा। पर्यावरण और पुनर्वास संबंधी चिंताओं के कारण विश्विबैंक द्वारा सरदार सरोवर परियोजना की आर्थिक मदद रोकना एक बड़ी अंतर्राष्ट्री य घटना और आंदोलन की जीत थी। तब तक कोई ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिला था जिसमें विश्वबैंक ने कभी किसी परियोजना से अपना हाथ खींचा हो।

जो चिंताएं भारत की बांध परियोजना में देखी गईं, वे ही दुनिया की अन्य? बांध परियोजनाओं में भी थीं। इसलिए आंदोलन ने सम-विचारी समूहों के साथ मिलकर विश्वीबैंक को बाध्यै किया कि वह अपनी मौजूदा कर्ज नीति में बदलाव करे, ताकि दुनिया में कहीं भी सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय विनाश को रोका जा सके। विश्वमबैंक को इसके लिए राजी होना पड़ा और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन आॅफ नेचर (आईयूसीएन) के साथ मिलकर बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों की समीक्षा हेतु विश्वा बाँध आयोग का गठन करना पड़ा। इसमें आंदोलन की ओर से मेधा पाटकर को आयुक्तो के रुप में शामिल किया गया। दक्षिण अफ्रीका के जल-संसाधन मंत्री कादर अस्मोल की अध्योक्षता वाले विश्वई बाँध आयोग की रिपोर्ट के बाद विश्वअबैंक को अपनी कर्ज नीति में बदलाव करना पड़ा और उसने कई सालों तक बाँध परियोजनाओं को कर्ज देना बंद रखा।

आंदोलन ने ऐसी सरकारें देखी हैं जिन्हों ने प्रभावितों के जीवन, रोजी-रोटी और अधिकारों की लड़ाई को खारिज किया था। कुछ सरकारों ने आंदोलनकारियों के खिलाफ दमनचक्र भी चलाया, लेकिन जिन सरकारों ने उपेक्षा नहीं की, वे भी प्रभावितों को उनके अधिकार देने में अनिच्छुलक ही रहीं। प्रभावित किसानों को अपने ही राज्यष में जमीन के बदले जमीन देने की बंधनकारी नीति के बावजूद मध्यहप्रदेश की सरकारों ने जमीन देना कभी स्वी?कार नहीं किया। मध्यदप्रदेश में उद्योगपतियों को आसानी से जमीन, पानी और बिजली उपलब्धे करवाने वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र देती थी कि विस्थोपितों के लिए जमीन उपलब्धन नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन करीब 20 हजार परिवारों को जमीन दिलवाने में सफल रहा। इनमें बड़ी संख्या भूमिहीन परिवारों की है। यह छोटी उपलब्धि नहीं है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन अपने चार दशकों के सफर में सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, सही जल-प्रबंधन, आदिवासी-किसानों-महिलाओं के सशक्तिकरण और मानवाधिकारों की लड़ाई का एक जीवंत प्रतीक बना है। दुनिया में कम लोग हैं जो सरकारी दमनचक्र और उपेक्षा के बावजूद टूटे नहीं और संघर्ष की जलती मशाल अपनी अगली पीढियों को सौंपते रहे।

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