
सड़कें जीवन को जोड़ने के लिए बनाई जाती हैं, उसे समाप्त करने के लिए नहीं। लेकिन भारत में आज हालात कुछ और ही कहानी कहते हैं। खासकर राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं ने इन जीवनदायी रास्तों को मानो ‘मौत के गलियारे’ में बदल दिया है। यह चिंताजनक स्थिति केवल चालकों की लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि यह हमारी अव्यवस्थित योजना, कमजोर कानून-प्रवर्तन और प्रशासनिक जवाबदेही की कमी का सम्मिलित दुष्परिणाम है। हाल ही में न्यायपालिका द्वारा जताई गई चिंता और दिए गए निर्देश इस संकट की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं, लेकिन जब तक व्यवस्था की गहराई में मौजूद खामियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक ये प्रयास केवल अस्थायी राहत ही बनकर रह जाएंगे।
भारत में सड़क नेटवर्क का तेजी से विस्तार, विशेषकर राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का निर्माण, विकास और प्रगति का प्रतीक माना जाता है। बेहतर कनेक्टिविटी, कम यात्रा समय और व्यापारिक सुगमता ने अर्थव्यवस्था को गति दी है। लेकिन इस विकास की एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल सड़कों में राष्ट्रीय राजमार्गों की हिस्सेदारी बहुत कम है, फिर भी सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं पर होता है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि समस्या केवल यातायात की संख्या नहीं, बल्कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता, डिजाइन और प्रबंधन से जुड़ी है। राजमार्गों पर दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण ट्रैफिक नियमों का पालन न करना है। तेज गति यानी ओवरस्पीडिंग आज भी सबसे बड़ी वजह बनी हुई है। जिन सड़कों को तेज और सुगम यात्रा के लिए बनाया जाता है, वहीं गति नियंत्रण के पर्याप्त साधन नहीं होते। इसके साथ ही लापरवाह ड्राइविंग, जैसे लेन अनुशासन की कमी, अचानक ओवरटेक करना और सुरक्षा नियमों की अनदेखी दुर्घटनाओं के खतरे को और बढ़ा देती है। जब नियमों का पालन सख्ती से नहीं होता, तो लोग उन्हें हल्के में लेने लगते हैं और यही लापरवाही जानलेवा साबित होती है।
एक बड़ी समस्या है राजमार्गों के किनारे अवैध पार्किंग और अतिक्रमण। अक्सर ट्रक और बसें सड़क के किनारे या कई बार मुख्य मार्ग पर ही खड़ी कर दी जाती हैं, खासकर रात के समय। तेज रफ्तार से चल रहे वाहनों के लिए यह अचानक सामने आने वाली बाधा घातक साबित होती है। इसके अलावा, सड़क किनारे ढाबे, दुकानें और अस्थायी बाजार भी अतिक्रमण कर लेते हैं, जिससे पैदल लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है और यातायात बाधित होता है। ये सभी स्थितियां मिलकर सड़कों को असुरक्षित और अनिश्चित बना देती हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमियां भी दुर्घटनाओं को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। कई जगहों पर सड़कें ठीक तरह से डिजाइन नहीं की गई होतीं, संकेतक (साइन बोर्ड) पर्याप्त नहीं होते, रोशनी की कमी रहती है और जरूरी जगहों पर सुरक्षा बैरियर नहीं लगाए जाते। कई बार राजमार्ग घनी आबादी वाले क्षेत्रों से गुजरते हैं, लेकिन वहां पैदल पारपथ, सर्विस लेन या गति नियंत्रित करने के उपाय नहीं होते। इससे यह स्पष्ट होता है कि सड़क निर्माण में सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती, बल्कि केवल गति और विस्तार पर जोर दिया जाता है।
जवाबदेही की कमी भी इस समस्या को और गंभीर बनाती है। सड़क प्रबंधन में कई एजेंसियां शामिल होती हैं- राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, राज्य सरकारें, ट्रैफिक पुलिस और स्थानीय प्रशासन। लेकिन इनके बीच समन्वय की कमी के कारण काम सही ढंग से नहीं हो पाता। जब कोई दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है और अक्सर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। इस बिखरी हुई व्यवस्था के कारण लापरवाही बनी रहती है और सुधार की गति धीमी पड़ जाती है। न्यायपालिका ने इस स्थिति को सुधारने के लिए कई निर्देश दिए हैं, जैसे अतिक्रमण हटाना, पार्किंग को नियंत्रित करना, आधुनिक निगरानी प्रणाली लगाना और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना। ये कदम निश्चित रूप से जरूरी हैं, लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इन्हें कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है। हमारे देश में अक्सर अच्छे नियम बनाए जाते हैं, लेकिन उनका पालन सही ढंग से नहीं हो पाता। इसलिए असली चुनौती नीतियाँ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारना है।
तकनीक भी सड़क सुरक्षा को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, स्पीड कैमरा, नंबर प्लेट पहचान प्रणाली और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसे उपाय नियमों के पालन को सुनिश्चित कर सकते हैं। डेटा के आधार पर दुर्घटना-प्रवण क्षेत्रों की पहचान कर वहां विशेष कदम उठाए जा सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी, जब उसके साथ मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही भी जुड़ी हो। सड़क सुरक्षा में आम लोगों की भूमिका भी बेहद अहम है। अक्सर इसे केवल सरकार की जिम्मेदारी माना जाता है, लेकिन यह हर नागरिक का कर्तव्य भी है। वाहन चलाते समय सीट बेल्ट लगाना, मोबाइल फोन का उपयोग न करना, लेन का पालन करना और गति सीमा का सम्मान करना जैसे छोटे-छोटे कदम भी कई जिंदगियां बचा सकते हैं।
सड़क दुर्घटनाओं की आर्थिक और सामाजिक कीमत भी बहुत बड़ी होती है। एक दुर्घटना केवल एक व्यक्ति की जान नहीं लेती, बल्कि पूरे परिवार को संकट में डाल देती है। कई बार परिवार का कमाने वाला सदस्य खो जाता है, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का नुकसान होता है। इस दृष्टि से सड़क सुरक्षा केवल एक तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि एक मानवीय समस्या है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि हम सड़क निर्माण और प्रबंधन के अपने दृष्टिकोण को बदलें। हर स्तर पर सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, चाहे वह योजना बनाना हो, निर्माण करना हो या संचालन करना। अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाना, नियमित सुरक्षा जांच करना और जोखिम कम करने वाले उपायों को लागू करना बेहद जरूरी है। साथ ही नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए सख्त दंड और पारदर्शी जवाबदेही व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।
प्रश्न यह नहीं है कि भारत विश्वस्तरीय सड़कें बना सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह उन्हें अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित बना सकता है। सड़कें अवसर, प्रगति और जुड़ाव का प्रतीक होनी चाहिए, न कि भय और मृत्यु का। वास्तव में राजमार्गों पर बढ़तीं दुर्घटनाएं हमारे विकास मॉडल की कमजोरियों को उजागर करती हैं। नीतियां और न्यायिक निर्देश दिशा दिखाते हैं, लेकिन उनकी सफलता हमारे सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है। अब समय है कि सड़कें मौत के गलियारे नहीं, बल्कि सुरक्षित और सुगम यात्रा के मार्ग बनें। तभी हम सच्चे अर्थों में विकास को सार्थक बना पाएंगे।

