नैतिकता गाय तरह होती है, जब तक वह दूध देती है उसे पालते हैं। जैसे ही उसने दूध देना बंद किया कि उसे सड़कों पर आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है। आपने जितना उसका फायदा उठाना था, उठा लिया। अब सड़कें उसका बोझ उठाए। लोगों की दी हुई बासी रोटियाँ खाती फिरे। जैसे आवारा कुत्ते पलते हैं, वह भी पल ही जाएगी। इस मोबाइल युग में नैतिकता की जितनी फजीहत हो रही है, वह किसी काल में नहीं हुई। कितने ही कड़े कानून बने लेकिन कोई भी नैतिकता की इज्जत नहीं बचा पाया। कोई न कोई इसकी इज्जत लूटता ही रहता है। थोड़ा सर्च करेंगे तो हर पल नैतिकता की इज्जत लूटने के कई मामले सामने आ जाएंगे। अब यह सब न्यू नार्मल हो गया है। यदि इन मामलों पर ध्यान देने लगें तो खाना-पीना और उठना-बैठना हराम हो जाए।
नैतिकता के रखवाले ही इसकी फजीहत करने में अव्वल हैं। इनके सामने बेचारी नैतिकता थर-थर कांपती है। जब रखवाले कहते हैं कि आओ हम तुम्हारी रक्षा करेंगे तो वह डर के मारे पीछे हटती जाती है। रक्षक ही भक्षक का मुखौटा लगा कर बड़ी आसानी से नैतिकता को दबोच लेता है। अब तो दुष्कर्मियों को सम्मानित किया जाने लगा है तो बिचारी नैतिकता की बिसात ही क्या है! यदि नैतिकता को जीवित रहना है तो उसे खुद को भक्षक को सौंपना ही होगा। ऐसा कौन होगा जो जीवित नहीं रहना चाहता है। नारी से दुष्कर्म कर इतिहास का बदला लेने की नैतिकता बहुत पुरानी है।
यह युगीन विडंबना ही है कि चरित्रवान को चरित्रहीन से चरित्र का प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। रीढ़ को केंचुए से रीढ़ का प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। इसके बावजूद हर कोई नैतिकता को लात मारता जाता है जैसे कि वह सोतीहुईकुतिया हो। जो अनैतिक होता है वह दूसरों की नैतिकता पर अधिक शंका करता रहता है। जैसे चोरों को सभी चोर नजर आते हैं। उसी तरह जो अनैतिक होता है, उसे खुद के सिवा दूसरे सभी अनैतिक नजर आते हैं। लगता है कि नैतिकता कड़वी दवाई हो गई है जिसे वह खुद तो पीना नहीं चाहता, लेकिन चाहता है दूसरा उसे प्रेम से पीए। वह दूसरों में तो नैतिकता चाहता है लेकिन खुद अनैतिक बना रहना चाहता है। जो काम खुद करना नहीं चाहता वह दूसरों से करवाना चाहता है। उसकी नैतिकता का यही तकाजा होता है।
नकली नैतिकता असली नैतिकता को भी मात दे देती है। खोटे सिक्के असली सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं। आजकल आदमी गुणवत्ता का नहीं, चमकीलेपन का गुलाम है। रैपर देखा जाता है, भीतर क्या है; यह देखा नहीं जाता। जब माल असली न हो तो असली होने का भ्रम पैदा किया जाता है। असली नकली से ज्यादा बिकता है। नकली नैतिकता लाभदायक होती है और असली नैतिकता हानिकारक। इसलिए जो चलता है, कद्र उसी की होती है। नकली नैतिकता की पूरी गारंटी होती है। असली नैतिकता की कोई गारंटी नहीं होती। असली नैतिकता नकली नैतिकता से हार जाती है। हमेशा ही हारती रही है।

