Friday, March 27, 2026
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कहां जा रहे गुमशुदा लोग?

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हाल ही में दिल्ली में 807 लोगों के लापता होने की खबर छपी। इनमें 137 बच्चे और 63 फीसदी महिलाएं तथा लड़कियां शामिल हैं। यह कुल लापता लोगों का बड़ा हिस्सा है। बताया गया कि एक जनवरी से 27 जनवरी तक हर दिन औसतन 27 लोग गायब हुए। इन 807 मामलों में से केवल 235 लोगों का ही अभी तक पता लग सका है। वहीं 538 लोग अब भी लापता हैं, जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। इसके बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। वहीं लापता लोगों के परिवार भी पुलिस से सहयोग नहीं मिल पाने की शिकायत कर रहे हैं। दिल्ली की इन घटनाओं ने एक बार फिर लापता लोगों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसा नहीं है कि केवल दिल्ली से ही लोग लापता हुए हैं। भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल लापता लोगों के मामले सामने आते हैं।

हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूरी दुनिया में हर साल 80 लाख लोग लापता होते हैं, जिनमें से कुछ ही मिल पाते हैं। अधिकतर के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती। कुछ साल पहले मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी दुनिया भर में गायब होने वाले लोगों पर एक रिपोर्ट जारी करते हुए गहरी चिंता जताई थी। उसका कहना था कि दुनिया में अधिकतर लोगों को जबरन उठा लिया जाता है और उन्हें युद्ध सहित कई अनैतिक कामों में धकेल दिया जाता है। संगठन का कहना है कि सीरिया में साल 2011 से लेकर अब तक लगभग 82,000 लोगों को जबरन गायब कर दिया गया है। इनमें से अधिकांश लोग सशस्त्र विपक्षी समूहों और खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले सशस्त्र समूह द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद लापता हो गए हैं। वहीं श्रीलंका में 1980 से लेकर अब तक करीब 60,000 से अधिक लोग गायब हो गए हैं।

अगर इतिहास की बात करें तो अर्जेंटीना में बीसवीं शताब्दी में सामूहिक रूप से लोगों के जबरन गायब किए जाने का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण अंतिम तानाशाही थी। 1976-1983 के बीच दक्षिण अमेरिकी देश में सैन्य शासन के दौरान सुरक्षा बलों ने लगभग 30,000 लोगों का अपहरण किया, जिनमें से कई का अभी भी कोई सुराग नहीं लगा है। इस दौरान व्यापक और व्यवस्थित रूप से मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ, जिसमें बड़े पैमाने पर यातनाएं और गैर-न्यायिक हत्याएं शामिल थीं। इनमें कुख्यात मौत की उड़ानें भी शामिल थीं, जिनमें पीड़ितों को सैन्य विमानों या हेलीकॉप्टरों से गिराकर मार डाला गया था। दुनिया भर में कई संगठन लंबे समय से गायब होने वाले लोगों और उनके परिवारों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि अधिकतर मामलों में ज्यादा कुछ सफलता नहीं मिल पाई है। इतना जरूर है कि कुछ मामलों में जिम्मेदारों को दोषी ठहराने के लिए अभियान चलाया गया। इसके बाद कुछ दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने में सफलता मिली।

असल में जबरन गुम किए जाने के शिकार वे लोग होते हैं, जो सचमुच गायब हो जाते हैं। वे तब लापता हो जाते हैं, जब उन्हें सड़क या उनके घरों से उठा लिया जाता है। अधिकतर मामलों में इन गुमशुदगी से इनकार किया जाता है या यह बताने से मना कर दिया जाता है कि वे कहां हैं। कभी-कभी ये गुमशुदगी सशस्त्र गैर-सरकारी तत्वों जैसे सशस्त्र विपक्षी समूहों द्वारा की जाती है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह एक अपराध है। इन लोगों को अक्सर रिहा नहीं किया जाता और उनका क्या हुआ, यह भी अनिश्चित रहता है। बताया जाता है कि इन लापता लोगों को गलत कामों में धकेल दिया जाता है। लड़कियों को वेश्यावृत्ति में भेज दिया जाता है। बच्चों को चाइल्ड ट्रैफिकिंग में फंसा दिया जाता है। इन लापता लोगों को अक्सर यातनाएं दी जाती हैं। इनमें से कई मारे जाते हैं या फिर मारे जाने के भय में जीते हैं। वे जानते हैं कि उनके परिवार को पता नहीं है कि वे कहां हैं और उनकी मदद की संभावना बहुत कम है।

भले ही वे मौत से बच जाएं और रिहा हो जाएं, लेकिन शारीरिक और मानसिक घाव उनके साथ रह जाते हैं।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि जबरन गुमशुदगी एक वैश्विक मुद्दा है। दुनिया के कई देशों में ऐसे लोगों का इस्तेमाल अक्सर समाज में आतंक फैलाने की रणनीति के रूप में किया जाता है। इससे उत्पन्न असुरक्षा और भय की भावना केवल गुमशुदगी के करीबी रिश्तेदारों तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि समुदायों और पूरे समाज को प्रभावित करती है। कभी सैन्य तानाशाहों द्वारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाने वाली ये गुमशुदगियां अब दुनिया के हर क्षेत्र में और विभिन्न परिस्थितियों में घटित होती हैं। ये आमतौर पर आंतरिक संघर्षों में विशेष रूप से राजनीतिक विरोधियों को दबाने की कोशिश कर रही सरकारों या सशस्त्र विपक्षी समूहों द्वारा की जाती हैं। लापता लोगों के परिवार और मित्र मानसिक पीड़ा से जूझते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि उनका बेटा या बेटी, मां या पिता जीवित हैं या नहीं। उन्हें यह भी नहीं पता होता कि उन्हें कहां रखा गया है या उनके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है।

लापता लोगों की खोज पूरे परिवार के लिए खतरा बन सकती है। यह न जानना कि उनका प्रियजन कभी वापस लौटेगा या नहीं, अक्सर रिश्तेदारों को अनिश्चितता की स्थिति में छोड़ देता है। रिपोर्ट कहती हैं कि वैश्विक स्तर पर जबरन गुम किए जाने के शिकार लोगों में से अधिकांश पुरुष होते हैं। हालांकि गुम होने के बाद क्या हुआ, इसका पता लगाने के लिए संघर्ष का नेतृत्व अक्सर महिलाएं ही करती हैं। इस दौरान वे खुद को धमकियों, उत्पीड़न और हिंसा के जोखिम में डालती हैं। इसके अलावा लापता व्यक्ति अक्सर परिवार का मुख्य कमाने वाला होता है। वही एकमात्र व्यक्ति होता है, जो फसल उगा सकता है, नौकरी कर सकता है या फिर पारिवारिक व्यवसाय चला सकता है। कुछ राष्ट्रीय कानूनों के कारण स्थिति और भी खराब हो जाती है, क्योंकि मृत्यु प्रमाण-पत्र के बिना पेंशन या अन्य सहायता प्राप्त करना संभव नहीं होता।
गायब होने वाले लोगों पर दुनिया भर के संगठन अभियान चला रहे हैं।

उनकी मांग है कि सबसे पहले निष्पक्ष जांच करें। पर्याप्त सबूत मौजूद होने पर आपराधिक जिम्मेदारी के संदिग्धों पर सामान्य नागरिक अदालतों के समक्ष निष्पक्ष सुनवाई में मुकदमा चलाएं। जबरन गायब होने को राष्ट्रीय कानून के तहत अपराध घोषित किया जाए। इसकी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उचित दंडों से दंडनीय बनाया जाए। ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय नियमों को लागू करें और पीड़ितों को तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराएं। यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों और अपने प्रियजनों को खोने वाले लोगों को मुआवजा मिले। इसमें क्षतिपूर्ति, पुनर्वास, पुनर्स्थापन और यह गारंटी शामिल हो कि ऐसा दोबारा नहीं होगा। किसी भी प्रकार के क्षमादान कानून या दंड से मुक्ति दिलाने वाले किसी भी अन्य उपाय जैसे कि परिसीमा अधिनियम आदि को निरस्त करें। हर हाल में उनके मानवाधिकारों की रक्षा करें और उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की जाए।

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