Friday, March 27, 2026
- Advertisement -

गिरते रुपये के नुकसान अधिक

18 6

बीस मार्च को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर 93.24 पर पहुंच गया, जो बाद में सुधरकर 93.12 के स्तर पर आ गया। (इस लेख के प्रेस में छपने जाने की पूर्व संध्या पर रुपया 94.03 पैसे पर था) इस गिरावट का कारण कच्चे तेल का बढ़ता आयात बिल और विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना है। इस महीने की शुरुआत में रुपया 92 के स्तर पर था। 1947 में एक डॉलर की कीमत 4 रुपये थी, जो 2022 में घटकर 80 रुपये हो गई और अब यह कमजोर होकर 93 रुपये के स्तर पर आ गया है। केवल 3 वर्षों में रुपया डॉलर के मुकाबले 13 रुपये कमजोर हुआ है।

अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ रही हैं। खाड़ी देशों में ईरान के हमलों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। चूंकि भारत अपनी कुल आवश्यकता का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वर्तमान परिदृश्य में भारत के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं। कच्चे तेल का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। इसलिए, तेल की कीमतें बढ़ने से डॉलर की मांग में उल्लेखनीय इजाफा हुआ और विदेशी मुद्रा भंडार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है.

22 मार्च 2026 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 709.76 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की वजह से डॉलर अधिक खर्च हो रहा है, साथ ही रिजर्व बैंक रुपये को स्थिर रखने के लिए डॉलर की लगातार बिक्री कर रहा है, क्योंकि वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। इन कारणों से 13 मार्च 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 7.052 अरब डॉलर की तेज गिरावट दर्ज की गई थी। उससे पहले, 6 मार्च 2026 को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में 11.68 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट हुई थी। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के मध्य में, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 725 अरब डॉलर से अधिक के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। वैश्विक अनिश्चितता और डर के कारण, मार्च तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लगभग 8 अरब डॉलर, यानी करीब 83,000 करोड़ रुपये, भारतीय शेयर बाजार से निकाल लिए हैं। रुपये के कमजोर होने के कारण, विदेशी निवेशक अपने पैसे सुरक्षित रखने के लिए भारत जैसे उभरते बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं। इस बिकवाली से रुपये कमजोर हो रहा है।

स्ट्रेट आफ होर्मुज वह समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से दुनिया का 20% और भारत का लगभग आधा तेल गुजरता है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस रूट पर आपूर्ति में बाधा का खतरा बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक इस समुद्री मार्ग की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये की गिरावट को रोकने का प्रयास करता है।

रुपये की कमजोरी के कई दुष्परिणाम हैं। इसकी कमजोर होने से भारत में आयात महंगे हो जाएंगे, जैसे क्रूड आयल और इलेक्ट्रॉनिक आइटम, जिनमें मोबाइल और लैपटॉप भी शामिल हैं। आयात महंगा होने से देश के चालू खाता घाटे में इजाफा होगा। जिन कंपनियों ने विदेश से कर्ज लिया है, उन्हें चुकाने के लिए ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ेगी। इससे विदेश में पढ़ाई का खर्च भी बढ़ेगा, और यह भारत की आर्थिक विकास दर को प्रभावित कर सकता है। लगातार बढ़ती कच्चे तेल की कीमत महंगाई को बढ़ाएंगी और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएंगी। इससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों में कटौती करना भी मुश्किल हो जाएगा, जिससे विकास दर में कमी आयेगी, कर्ज दर में इजाफा होगा, आर्थिक गतिविधियों में कमी आयेगी और महंगाई में वृद्धि होगी.

वैसे,रुपए की कमजोरी के कुछ लाभ भी हैं, जैसे कि रुपये की कमजोरी से निर्यातकों को फायदा होता है। आईटी, फार्माऔर कपड़ा उद्योग की कंपनियों को अपने उत्पाद या सेवाओं के बदले डॉलर में भुगतान मिलता है। जब वे इन डॉलर को रुपये में बदलते हैं, तो उन्हें अधिक रुपये मिलते हैं। भारत विदेशी पर्यटकों के लिए सस्ता हो जाता है, जिससे स्थानीय पर्यटन उद्योग को लाभ हो सकता है। विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा घर भेजा जाने वाला पैसा उनके परिवारों को अधिक रुपये मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें 110-115 डॉलर से ऊपर रहती हैं और विदेशी निवेशक बिकवाली जारी रखते हैं, तब तक रुपये कमजोर रहेगा। यदि वैश्विक स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो रुपये 94 के स्तर को भी पार कर सकता है। लेख छपने जाने तक रुपया 94 पार कर चुका है।

किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य मुख्य रूप से उसके अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत को अधिक सामान, जैसे कच्चा तेल, मंगवाना हो, तो उसे अधिक डॉलर की आवश्यकता होगी। इस मांग के बढ़ने पर डॉलर की कीमत बढ़ेगी और वह महंगा हो जाएगा, जिससे रुपया कमजोर हो जाएगा। इसके अलावा, मुद्रा की कीमत का निर्धारण देश की महंगाई दर, ब्याज दरें और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी करता है। जब महंगाई कम रहेगी, तो आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा और अर्थव्यवस्था स्थिर रहने पर विदेशी निवेशक भारत में निवेश करेंगे, जिससे डॉलर की आमद बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा। आसान शब्दों में, दुनिया में जिस मुद्रा की मांग अधिक और आपूर्ति कम होगी, उसकी कीमत भी उतनी ही अधिक होगी।

निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि रुपये के कमजोर होने से नुकसान अधिक है और फायदे कम हैं. वर्तमान में रसोई गैस संकट और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि के कारण देश में महंगाई का खतरा बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता और महंगाई बढ़ने से विकास की गति धीमी होगी। आर्थिक स्थिरता प्रभावित होगी, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आएगी, कच्चे तेल के आयात में कठिनाइयां बढ़ेंगी, विदेशी निवेशक निवेश से हिचकिचाएंगे और रुपये की कीमत गिरती रहेगी। रुपया कहां जाकर रुकेगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर मध्य पूर्व की जंग लंबी चली तो रुपया और गिर सकता है। यह देश के आर्थिक हालात के लिए सही नहीं होगा।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

उल्लूओं की दुनिया को जानिए

ललित नारायण उपाध्याय उल्लू के नाम से तो आप बचपन...

रुपया पैसा फल फूल गया है

यकीन मानिए, रुपया-पैसा फल फूल गया है। इसके चलते...

पूरा संसार एक रंग मंच हम उसके कलाकार

वास्त्व में रंगमंच जीवंत कला को समझने-सम्मानित करने का...

Sonia Gandhi: सोनिया गांधी का स्वास्थ्य सुधरा, डॉक्टरों ने बताया जल्द मिलेगी छुट्टी

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी...

Noida Airport: नोएडा में कल से शुरू होगी नई उड़ान, आज सीएम योगी और कल पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को...
spot_imgspot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here