Sunday, April 19, 2026
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मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक ध्वनि प्रदूषण

राजेंद्र चतुर्वेदी

सन1943 में ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का ध्यान पहली बार इस तरफ गया कि तीव्र ध्वनि जानलेवा हो सकती है। हुआ यूं कि कंकार्ड जैट विमान लंदन हवाई अड्डे पर उतरने के लिए पार्लियामेंट हाउस के ऊपर से निकला जिसके फलस्वरूप उसकी खिड़कियों का कांच चटख कर जमीन पर बिखर गया। सेंटपाल चर्च की खिड़कियों का कांच भी उसी दिन टूट कर बिखर गया।

पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि कंकार्ड जैट उसके ऊपर से भी निकला था। विशेषज्ञों ने दोनों स्थानों की खिड़कियों का कांच टूटने का कारण जैट की तीव्र ध्वनि को माना। बाद में अमेरिका के केन्योन की प्राचीन गुफाओं में पड़ी दरारों का कारण भी सुपरसोनिक जैट विमानों की तीव्र ध्वनि मानी गई।

हम एकदम शान्ति की परिकल्पना नहीं कर सकते क्योंकि ध्वनि आवश्यक है। ब्रह्मांड में व्याप्त कौन सा तत्व ऐसा है जो आवाज न करता हो लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि 60 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि मनुष्य के लिए हानिकारक होती है। 70 से 80 डेसिबल ध्वनि के बीच लगातार रहने वाला व्यक्ति बहरेपन का शिकार हो जाता है। यदि कोई गर्भवती महिला लगभग चार महीने तक 120 डेसिबल ध्वनि के बीच रहे तो उसका शिशु अपने साथ बहरेपन का अभिशाप लेकर पैदा होगा।

श्रवण दोष के अलावा वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष भी निकाले हैं कि तीव्र ध्वनि व्यक्ति की लगभग सभी प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक क्रियाएं बाधित करती है। आॅस्ट्रेलियन डॉक्टर डी. लेहमान के अनुसार 40 डेसिबल ध्वनि से एक सोया हुआ व्यक्ति जाग जाता है। 90 डेसिबल ध्वनि के बीच काम करने वाले व्यक्ति की न केवल स्मरणशक्ति प्रभावित होती है बल्कि उसकी कार्य कुशलता पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।

90 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि व्यक्ति को मानसिक रूप से अपंग बनाने के साथ ही साथ उसे चक्कर आना, सिरदर्द, बदन दर्द, मांसपेशियों में लेक्टिक अम्ल का जमाव और ऐंठन आदि रोगों का रोगी बना देती है। ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति की कुंठा तथा निराशा में भी बढ़ोत्तरी होती है। इतना ही नहीं, 155 डेसिबल ध्वनि व्यक्ति की चमड़ी को जला सकती है और 180 डेसिबल ध्वनि से व्यक्ति की मौत हो जाती है।

अनुसंधान के दौरान आॅस्ट्रेलिया के डॉ. ग्रिफिक, डॉ. डी. लेहमान और डॉ. रूपर्ट टेलर ने यह देखा कि एक चूहा 120 डेसिबल ध्वनि के बीच अपना दम तोड़ बैठा तथा 180 डेसिबल ध्वनि ने एक बंदर की जान ले ली। इन डॉक्टरों ने हृदय रोग के जन्म और बढ़ोत्तरी में भी ध्वनि प्रदूषण का योगदान प्रतिपादित किया है।

कोई संदेह नहीं कि ध्वनि प्रदूषण घातक है, इसके बाद भी यह बढ़ रहा है। अपने देश में हुई खोजों ने बहुत ही चौंकाने वाले निष्कर्ष निकाले हैं। दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, कानपुर आदि व्यस्त महानगरों में ध्वनि प्रदूषण प्रत्येक 9 वर्षों में लगभग दो गुना हो जाता है। इस समय दिल्ली की घनी आबादी वाले लगभग 65 प्रतिशत क्षेत्रा में 90 से 105 डेसिबल तक ध्वनि होती है। इतनी ही तीव्र ध्वनि की चपेट में कानपुर का 85 प्रतिशत हिस्सा है।

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का तो लगभग 91 प्रतिशत भाग 100 से 120 डेसिबल ध्वनि के बीच रहता है। इसी से मिलती जुलती स्थिति कलकत्ता की है लेकिन प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कहा जा सकता है कि मुंबई, कलकत्ता और दिल्ली की तुलना में चेन्नई की स्थिति काफी ठीक है। चेन्नई का सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्सा 80 से 100 डेसिबल ध्वनि के बीच रहता है।

ध्वनि प्रदूषण की भयावहता और भारत में उसकी स्थिति के संक्षिप्त अध्ययन के बाद यह जानना जरूरी है कि शोरगुल क्या बला है? वैज्ञानिकों के मुताबिक जो ध्वनि अपनी तीव्रता के कारण व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं को बाधित करने लगती है, वहीं ध्वनि शोर कहलाती है। ध्वनि को लार्म बैरोमीटर से मापा जाता है और इसे मापने की इकाई डेसिबल कहलाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार टेÑन, ट्रक, मोटर का हार्न और डिस्को संगीत 115 डेसिबल ध्वनि उत्पन्न करते हैं। सामान्य बातचीत और हल्के टैÑफिक से 60 डेसीबल ध्वनि उत्पन्न होती है। चलती हुई इंजीनियरिंग वर्कशाप से 90 से 100 डेसिबल ध्वनि तथा कारखानों से 110 डेसिबल ध्वनि उत्पन्न होती है। हैलीकाप्टर और हवाई जहाजों के इंजन 140 डेसिबल तक ध्वनि उत्पन्न करते हैं।

अतएव वैज्ञानिकों का यह अनुमान गलत नहीं है कि चालू सदी में शहरी आबादी के चालीस प्रतिशत लोग न केवल बहरेपन के शिकार होंगे बल्कि मानसिक अस्वस्थता तथा हृदय रोगों से भी परेशान होंगे। इस कारण अगर हमें जानलेवा ध्वनि प्रदूषण से बचना है तो जल्दी से जल्दी उसके प्रति जानकारी, सावधानी और जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाना होगा। आखिर इस बात का क्या औचित्य है कि एक तरफ हम कारखानों, तरह-तरह के यंत्रों और यातायात से विकास के सोपानों की ओर दौड़ लगाते रहें, दूसरी तरफ उन्हीं से उत्पन्न ध्वनि जानलेवा बनकर हमें तिलतिल कर मारने के लिए वातावरण तैयार करती रहे। एक आदमी ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए निजी स्तर पर जो प्रयत्न कर सकता है, वह इस प्रकार है।

वाहन चलाते समय हार्न तभी बजाएं जब वह बहुत जरूरी हो

’ शादी -विवाह, पर्व त्यौहारों व अन्य उत्सवों में ध्वनि -विस्तारक यंत्रों के प्रयोग से बचें। यदि बहुत जरूरी हों तो उन्हें धीमी आवाज में चलाएं।

रेडियो, टी. वी. आदि धीमी आवाज में चलाएं।

’ अनावश्यक बातचीत से स्वयं बचें और इसके लिए दूसरों को भी प्रेरित करें।

’ सामान्य बातचीत के दौरान जोर से न बोलें। यदि जोर से बोलने की आदत हो तो उसमें बदलाव लाने की कोशिश करें।

’ उत्सवों आदि के दौरान आतिशबाजी, बैंड आदि से बचें।

’ पाश्चात्य ढंग के संगीत समारोहों आदि के आयोजन या उनमें शिरकत करने से यथासंभव बचें।

’ शोरगुल वाले स्थान पर ज्यादा देर न रुकें।

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