आसन्न उर्जा संकट ने अंतत; बड़ा कमाल किया। सरकार बहादुर ने सोने की खरीददारी को बंद करने और वर्क फ्रॉम होम का निर्देश दे दिया। अब तो घरघुसरा बने रहने भलाई है। कहने वाले कह रहे कि अंतत: कापुरुष और हैनपैक हसबेंड ही बचेंगे। घर में रहो और वहीं से काम करो। शुरू शुरू में वर्क फ्रॉम होम का निर्देश पा कार्मिकों के बीच बड़ा कंफ्यूजन रहा। कुछेक को तो उनकी घरवालियों ने तुरंत समझा दिया कि इसका मतलब है, वर्क फॉर होम। बातों ही बातों में यह सूचना उचित कानों तक पहुंचा दी गई कि कामवाली बाई अवकाश पर है, चलो उठो, लगो काम पर, झाड़ू लगाओ, पोंछा फिराओ। अंतराष्ट्रीय आपदा की इस सनसनीखेज घड़ी में घरबार के कामों में हाथ बंटाओ।
एक सरकारी महकमे में मझोले अधिकारी खन्ना साहबजी जरा ज्यादा समझदार निकले। वे जल्द जान गए कि उनकी मैडमजी उन्हें एंवई बना रही हैं। नानाप्रकार की किटी पार्टियों में आते-जाते वह बड़ी ‘विटी’ टाइप की हो ली हैं। उन्होंने ठान लिया कि वे दैहिक रूप से घर में मौजूद रहते हुए मन और आत्मा को दफ्तर के विविध कामों में निष्ठापूर्वक झोंक देंगे। असल राष्ट्रभक्ति वही जो मनोयोग से घटित होती दिखाई दे।
वह एक कामकाजी दिन था। वे सही समय पर डाइनिंग टेबल पर जा बैठे। साहबजी ने कुर्सी के पृष्ठभाग पर झट से साफ-सुथरा तौलिया टांग लिया। उसे घुमाने की कोशिश की लेकिन असफल रहे। काठ की घरेलू कुर्सियां शायद कभी रिवॉलव होती भी नहीं। आफिस से उड़ा कर लायी गयी स्प्रिंग को ऐंठने से बजने वाली कॉलबैल सामने मेज पर सजा दी। इसके बाद उन्होंने वॉल क्लॉक को निहारा , फिर सही लैपटॉप आॅन किया , बटन पुश कर घंटी बजाई और कहा-अरे ननकू भाग के एक ‘कटिंग’ तो पकड़ ला।
बात ननकू से विशिष्ट अनौपचारिक किन्तु साहबी लहजे में कही गयी थी, जिसमें आदेश की गमक थी और अनुरोध की ऐरोमेटिक मनुहार का तड़का भी। अलबत्ता बात निकलने के बावजूद बहुत दूर तक गयी पर वहां तक पहुंच न पायी, जिसे लक्षित कर उसे उड़ाया गया था। बात मुंह से निकली जरूर पर गंतव्य तक पहुंचती तो कैसे क्योंकि घर से काम की नीति के तहत ननकूजी वहां से लगभग पौने पांच किलोमीटर दूर घरेलू स्टूल पर इस तरह मुस्तैद बैठा था।
अबे ननकू,बड़ी देर कर दी। साहबजी की तल्ख आवाज घर में गूंजी तो मैडमजी ने कहा-यहां कोई ननकू नहीं, खुद किचन में जाओ और दो कप कॉफी बना लाओ। और हां, एक कप कॉफी मुझे बैडरूम में पकड़ा देना। यहां ज्यादा हल्लागुल्ला न मचाओ यह मेरा आराम का समय है। अपनी सरकारी हनक घर में न दिखाओ। दफ़्तरी माहौल के गहन जानकार जिन्हें लोग सयाने कहते हैं, यूं ही ही नहीं कह गये कि नौकरी के तीन काम-नक्शा, मीटिंग और सलाम। कोई बताए कि घर से काम करना भी कोई काम हुआ भला! समुचित मौका, सही दस्तूर और अनुकूल वातावरण के अभाव में भरसक चाहने के बावजूद कभी कोई काम ढंग से हो भी नहीं पाता।

