- शहर में खस्ताहाल इमारतों से लोगों की जान जोखिम में, कई मकान खंडहर में तब्दील
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: दो दशक पहले बने मकान खंडहर में तब्दील हो सकते हैं। यह यकीन नहीं होता, लेकिन यह सच है। लिंटर क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। मकान निर्माणों के पीछे जो कमिश्नखोरी हुई है, यह क्षतिग्रस्त बिल्डिंग इसकी बानगी भर हैं। तब इसके दोषियों से इसकी वसूली नहीं हुई, बल्कि मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
क्योंकि लिप्त तो अधिकारी ही रहे होंगे। कभी सुना है कि लिंटर 20 वर्ष में क्षतिग्रस्त हो सकता हैं। अब इसमें रह रहे लोगों की जान जोखिम में हैं, फिर भी जर्जर बिल्डिंग में रह रहे हैं। उनकी मजबूरी यह है कि मेरठ विकास प्राधिकरण उन्हें इसके बदले में मकान नहीं दे रहा हैं, जिसके चलते जोखिम भरा जीवन ये लोग जी रहे हैं।

बड़ा सवाल यह है कि मेरठ विकास प्राधिकरण ने 20 वर्ष पहले जो मकान बनाकर आवंटित किये थे वह खंडहर कैसे हो गए? क्या इनके लिंटर की मियाद सिर्फ 20 वर्ष थी?
इसमें भी निर्माण को लेकर घटिया सामग्री का प्रयोग हुआ। महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरठ विकास प्राधिकरण ने इन खंडहर मकानों में किसी के भी रहने पर रोक लगा रखी है, लेकिन फिर भी लोग इन जर्जर भवन में रहकर जान जोखिम में डाल रहे हैं।

दरअसल, हम बात कर रहे हैं पांडव नगर में बने मकानों की। यहां पर दो दशक पहले मेरठ विकास प्राधिकरण ने करीब 50 मकान बनाए थे, जिनका आवंटन लोगों को किया गया। लोगों ने चुकता पैसा जमा कर इन मकानों में रहना शुरू कर दिया, लेकिन खराब मेटेरियल निर्माण में लगाया गया, जिसके चलते 20 वर्ष में ही बिल्डिंग जर्जर हो गई। क्या 20 वर्ष ही लिंटर की मियाद थी?
यह बड़ा सवाल है। इसको लेकर मेरठ विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने भी आंखें मूंद ली हैं। जो जिम्मेदार ठेकेदार और इंजीनियर उस समय रहे होंगे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। ठेकेदार और इंजीनियरों की वेतन से इसकी वसूली की जानी चाहिए थी, मगर कुछ नहीं हुआ। अब मेरठ विकास प्राधिकरण ने जर्जर बिल्डिंग में रह रहे लोगों को खाली करने के नोटिस जारी कर दिए हैं।
प्राधिकरण अधिकारियों ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए मकान खाली कराने की बात कही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो आवंटी हैं उनको अलग से मकान नहीं दिया गया। आवंटी यही मांग मेरठ विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से कर रहे हैं, लेकिन अधिकारी उनको मकान देने के लिए तैयार नहीं है। जब बिल्डिंग जर्जर हैं। बीस वर्ष के लिए तो आवंटियों ने मकान खरीदे नहीं थे।
इसी बीच उन्हें उल्टे मकान खाली करने के नोटिस थमा दिये गए। नोटिस मिलने के बाद लोग परेशान हैं। मीडिया से भी छुप रहे हैं। फोटो खींचवाने से बच रहे हैं। कह रहे है कि फिर से एमडीए के लोग मकान खाली कराने के लिए आ जाएंगे, लेकिन दूसरा मकान उन्हें उपलब्ध नहीं करा रहे हैं। ऐसे में सड़क पर सामान तो रखा नहीं जा सकता।
…और भी बिल्डिंग है जर्जर
शहर में और भी जर्जर बिल्डिंग है, जो बड़े हादसे का सबब कभी भी बन सकती है। पीएल शर्मा रोड पर हीरा लाल बिल्डिंग भी जर्जर है। इस बिल्डिंग में सरकारी आॅफिस भी चलाया जा रहा है और कुछ लोग यहां पर रह भी रहे हैं। पूरी बिल्डिंग जर्जर है, मगर लापरवाही की हद तो देखिये कि कोई भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है।
अक्सर लिंटर का सीमेंट टूट कर जमीन पर गिरता रहता है, लेकिन बिल्डिंग खाली क्यों नहीं कराई जा रही है? इसका जवाब अधिकारियों के पास भी नहीं है। हालांकि पहले भी जर्जर बिल्डिंग का मुद्दा उठ चुका है, लेकिन हीरा लाल बिल्डिंग को खाली नहीं कराएगा।

