Monday, May 4, 2026
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बड़ा सवाल: ब्लैक फंगस का इलाज आयुष्मान में क्यों नहीं ?

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: ब्लैक फंगस का इलाज आयुष्मान से क्यों नहीं किया जा रहा हैं? आयुष्मान से पांच लाख तक का इलाज अस्पतालों में कराया जाता है, लेकिन वर्तमान में शहर के प्राइवेट अस्पताल ब्लैक फंगस के मरीज को स्पष्ट कर रहे हैं कि आयुष्मान से उनका इलाज नहीं किया जाएगा। इस तरह से गरीब लोग परेशान है। उन्हें प्राइवेट अस्पतालों में आयुष्मान से इलाज नहीं मिल पा रहा है।

वेस्ट यूपी में ब्लैक फंगस के सर्वाधिक मरीज सामने आ रहे हैं। विभिन्न अस्पतालों में ब्लैक फंगस के मरीज इलाज भी करा रहे हैं। 14 मरीज आनंद हॉस्पिटल में भर्ती है, जहां पर उनका आॅपरेशन भी किया गया है, लेकिन इनमें से कई ऐसे मरीज है, जिनके पास आयुष्मान का कार्ड है, लेकिन उनका इलाज आयुष्मान से करने से मना कर दिया है।

ऐसी स्थिति में लोगों को नकद धनराशि ही हॉस्टिपल में जमा करनी पड़ी। इस तरफ भी प्रशासन को ध्यान देना चाहिए कि ब्लैक फंगस से पीड़ित लोगों को आयुष्मान से इलाज मुहैय्या कराया जाए। आनंद हॉस्पिटल के अलावा न्यूट्रीमा में भी ब्लैक फंगस के मरीजों का इलाज चल रहा है, वहां भी आयुष्मान कार्ड पर इलाज नहीं किया जा रहा है।


ब्लैक फंगस ने अब देहात की तरफ किया रुख

मुसाहिद हुसैन |

मोदीपुरम: कोरोना वैश्विक महामारी के प्रकोप का असर शहरी क्षेत्र के साथ-साथ अब देहात क्षेत्र में भी बढ़ने लगा है। ऐसे में ब्लैक फंगस की घातक बीमारी भी देहात में फैलनी शुरू हो गई है। अब धीरे-धीरे यह बीमारी का असर देहात में देखने को मिल रहा है। ऐसे में इस भयंकर बीमारी के लिए जागरूक रहना बेहद जरूरी होगा।

इसलिए चिकित्सकों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। खुद दौराला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डा. आशुतोष का कहना है कि इस बीमारी की रोकथाम के लिए भी हमें बेहद जागरूकता दिखानी होगी। इसलिए शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों तो जागरूकता बरत रहे हैं। साथ ही साथ अब देहात क्षेत्र के लोगों को भी इसके प्रति जागरूकता बरतनी होगी। खासकर देहात क्षेत्र के लोग इस बीमारी के लिए नियमित रूप से बचाव करे।

ब्लैक फंगस से बचाव के तरीके

  1. लोग मास्क को कई दिन तक धोते नहीं है उल्टा सैनिटाइजर से साफ करके काम चलाते है। ऐसा न करें। कपड़े के मास्क बाहर से आने पर तुरंत मास्क साबुन से धोएं, धूप में सुखाएं और प्रेस करें। सर्जिकल मास्क एक दिन से ज्यादा इस्तेमाल न करें।
  2. मास्क को महंगा होने की वजह से लंबे समय तक उपयोग करना पड़े तो साबुन के पानी में प्रतिदिन कई बार डुबोकर धो लें, रगड़े नहीं। बेहतर हो कि नया इस्तेमाल करें।
  3. अधिकांश सब्जियां खासकर प्याज छीलते समय दिखने वाली काली फंगस हाथों से होकर आंखों या मुंह मे चली जाती है। बचाव करें। साफ पानी, फिटकरी के पानी या सिरके से धोएं फिर इस्तेमाल करें।
  4. फ्रिज के दरवाजों और अंदर काली फंगस जमा हो जाती है। खासकर रबर पर तो उसे तत्काल ब्रश साबुन से साफ करें और बाद में साबुन से हाथ भी धो लें।
  5. जब तक बहुत आवश्यक न हो, आॅक्सीजन लेवल सामान्य है तो अन्य दवाओं के साथ स्टेरॉयड न लें। विशेष तौर पर यह शुगर वाले मरीजों के लिए अधिक खतरनाक है।
  6. यदि मरीज को आॅक्सीजन लगी है तो नया मास्क और वह भी रोज साफ करके इस्तेमाल करें। साथ ही आॅक्सीजन सिलेंडर या स्टेराइल वाटर में डालें और रोज बदलें।
  7. बारिश के मौसम में मरीज को या घर पर ठीक होकर आ जाएं तब भी किसी भी नम जगह बिस्तर या नम कमरे में नहीं रहना है। अस्पताल की तरह रोज बिस्तर की चादर और तकिए के कवर बदलना है और बाथरूम को नियमित साफ रखना है। रूमाल गमछा तोलिया रोज धोना है।
  8. आप इन सब बातों का ध्यान रखें और दूसरों को भी बताएं तो इस घातक बीमारी से बचाव संभव है। क्योंकि इसका उपचार अभी बहुत दुर्लभ और महंगा है इसलिए सावधानी ही उपचार है।

शुगर के मरीज ही ब्लैक फंगस के हो रहे शिकार
मोदीपुरम: ब्लैक फंगस के बढ़ते प्रकोप की बात करें तो देश में अब तक इस बीमारी के सात हजार से ज्यादा केस सामने आ चुके है। 200 से ज्यादा मरीज अपनी जान इस बीमारी से गवा चुके हैं। ब्लैक फंगस के बढ़ते केस के बाद देश के कई राज्यों में इसे महामारी घोषित किया जा चुका है। डा. दिव्यांशु सेंगर का कहना है कि दिलचस्प बात यह है कि भारत मे कोरोना की पिछले साल आयी लहर में ब्लैक फंगस के मरीज बहुत कम थे, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण की पहली लहर में देश में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में ब्लैक फंगस का एक मामला ही सामने आया था। उस वक्त 20 फीसदी आबादी संक्रमित हुई थी। इस बार करीब 40 फीसदी आबादी चपेट में आई है। एकाएक ब्लैक फंगस के मामलों में आश्चर्यजनक उछाल आया है। अमेरिका, यूरोप, ब्राजील या अन्य जगहों पर कोविड रोगियों में ब्लैक फंगस संक्रमण के बहुत कम मामले है। फिर भारत में अचानक उछाल क्यों है। वह भी दूसरी लहर के दौरान यह सवाल बहुत बड़ा है। जिसका जवाब खोजना जरूरी है। आॅल इंडिया फूड एंड ड्रग लाइसेंस होल्डर फाउंडेशन ने सवाल उठाया है कि कहीं इस फंगस के अचानक फैलाव की पीछे एक बड़ा कारण दूषित आॅक्सीजन या इसमें इस्तेमाल होने वाला पानी तो नहीं है। वे सवाल उठा रहे हैं कि पिछले दिनों जब आॅक्सीजन की किल्लत के समय जब उद्योगों के लिए आॅक्सीजन बनाने वालों ने मेडिकल आॅक्सीजन बनाया तो नियमों पर अमल हुआ या नहीं और उसकी पड़ताल हुई या नहीं। अशुद्ध आॅक्सीजन को इसलिए भी दोषी बताया जा रहा है क्योंकि यह देखने मे आया है कि अशुद्ध पानी का उपयोग करके जो लोग योगिक जलनेती (नाक से पानी अंदर लेकर सफाई) का अभ्यास करते थे उनमें भी पहले ब्लैक फंगस की बीमारी देखी जाती रही है। अभी यह भी देखने में आया है कि जो मरीज कई दिनों तक आॅक्सीजन पर रहते हैं, उनके मुंह की सफाई ठीक से नहीं हो पाती है। ओरल हाइजीन का ध्यान नही रखा जाता, उनके मुंह और नाक में लगातार आॅक्सीजन जाने से सफेद पपड़ी जम जाती है। डा. सेंगर का कहना है कि ऐसे में लगातार ‘ूमिडीफाइड आॅक्सीजन उनके अंदर जाने से मुंह में ब्लैक फंगस बनने का खतरा रहता है। दरअसल ब्लैक फंगस हवा में है, यह सर्वव्यापी है यह नमी वाली जगह, मिट्टी, सीलन भरे कमरों आदि में पाया जाता है.जब फल सड़ जाते हैं या ब्रेड पर फफूंदी हो जाती है, तो हम अपनी रसोई में इसका अनुभव करते हैं। स्वस्थ लोगों को फिक्र की जरूरत नहीं, लेकिन जिनकी इम्युनिटी कमजोर है उन्हें ब्लैक फंगस का खतरा अधिक बताया जा रहा है कोरोना की मृत्यु दर बहुत कम है लेकिन ब्लैक फंगस यानी म्यूकरमायकोसिस में मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक होती है। अभी घर पर हम सिर्फ इतनी ही सावधानी रख सकते है, कि कोविड के मरीजों को छुट्टी मिलने के बाद भी उनके शुगर लेवल पर नजर रखी जाए। क्योकि अधिकतर डायबेटिक लोग ही इसके शिकार हो रहे हैं।


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