Monday, April 20, 2026
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पक्षी भी यात्राा की पूरी तैयारी करते हैं

BALWANI


प्रति वर्ष ज्यों ही मौसम परिवर्तन होने लगता है, त्यों ही विभिन्न प्रजाति के पक्षियों के बीच यह तय होने लगता है कि वर्तमान स्थान पर रहना चाहिए अथवा नहीं। अनुकूल स्थान पर बच्चा जनने, भोजन की सुविधापूर्वक प्राप्ति आदि ऐसे कारण हैं जो लाखों पक्षियों को इस प्रकार से सोचने पर विवश कर देते हैं।

पक्षियों के बीच व्याप्त ऐसी धारणा के कारण ही प्रारंभ हो जाता है उनका सामूहिक पलायन। इस दौरान वे प्राय: 3 से 6 माह तक के लिए अपने मूल स्थान से गमन कर जाते हैं। पक्षियों द्वारा इस प्रकार से स्थान परिवर्तन को ही पक्षी प्रवाह कहा जाता है।

पक्षियों का सामूहिक पलायन मुख्यत: दो रूपों में होता है आंशिक पलायन और पूर्ण पलायन। प्रथम पलायन के अंतर्गत कैफीन, काली चिड़िया, यूरोपियन कोयल आदि प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं जो अपने जन्म स्थान को तो छोड़ देते हैं किन्तु वहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उसके इर्द-गिर्द ही शीतकाल में निवास करते हैं।

उल्लेखनीय बात यह है कि इस तरह के प्रवास में मुख्य रूप से युवा तथा मादा पक्षी ही बड़े पैमाने पर भाग लेते हैं।
आनुवंशिक गुणों के कारण पक्षियों में यह बात पूर्व से ही निर्धारित रहती हैं कि कब प्रवास यात्राा प्रारंभ हो जाए, यात्राा की दूरी तथा दिशा क्या होगी और क्र म में कहां एवं कितना पड़ाव होना चाहिए।

जिस प्रकार की तैयारी के साथ मनुष्य लंबी यात्रा पर निकलता है, ठीक उसी प्रकार की तैयारी प्रवास-क्र म के दौरान पक्षी जगत के बीच भी देखी जाती है। इन तैयारियों के अंतर्गत भोजन, मौसम, उड़ने की ऊंचाई तथा मार्ग आदि का निर्धारण प्रमुख होता है।

वे यात्रा पर निकलने के दो-तीन सप्ताह पूर्व से ही अपने शरीर के विभिन्न-भागों-गला, आंत एवं त्वचा में वसा को आवश्यकतानुसार जमा कर लेते हैं जो उड़ने के क्र म में ऊर्जा एवं भोजन प्रदान करने का कार्य करता है।

अध्ययनों द्वारा पता चलता है कि पक्षी प्रस्थान करने के लिए ऐसे मौसम को अनुकूल मानते हैं जिनसे उन्हें स्पष्ट दिखाई देने के साथ-साथ हवा का रूख भी उनकी पलायन दिशा की ओर तथा मौसम का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो ताकि उड़ान के समय उनको अधिक पानी की आवश्यकता न पड़े।

अधिकतम ऊंचाई पर उड़ान भरने का अभी तक का रिकार्ड विभिन्न प्रजाति के समुद्री पक्षियों का नाम दर्ज है जो 6000 मीटर तक के ऊंचाई एक सामूहिक रूप में क्रूज मिसाल की भांति आकृति बनाकर उड़ते हुए देखे गए हैं।

जिस प्रकार विभिन्न किस्म के हवाई जहाजों की गति सीमा निर्धारित होती है, उसी प्रकार पलायन-यात्रा के दौरान विभिन्न प्रजाति के पक्षियों की भी उड़ान-गति तथा दूरी निर्धारित है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार बतख तथा गाने वाली चिडि?ा आदि की उड़ान गति प्रति घंटा 30 से 80 किलोमीटर के बीच होती हैं।

रेड-नॉट पक्षी उत्तरी-दक्षिणी समुद्र तट से नार्वे तक की लगभग 1800 किमी की दूरी दो दिन में पूरी करते हैं। टर्न-स्टोन नामक पक्षी तीन दिन में आर्कटिक प्रदेश से लेकर हवाई द्वीप तक की करीब 4500 किमी की दूरी तय करते हैं जबकि आकर्टिकटर्न उत्तरी अक्षांश से लेकर अंटार्टिका क्षेत्र के बीच यात्रा के दौरान 10,000 किमी तथा अपने पूरे जीवन काल के दौरान वे लगभग 100,000, किमी की दूरी तय करते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा पक्षियों की उड़ान-गति शांत हवा में निर्धारित की जाती है।

पक्षियों के इस वार्षिक प्रवास-क्र म के दौरान सबसे रोचक बात यह होती है कि वे अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करते हैं तो उनके दिमाग में मार्ग का पूरा-पूरा मानचित्र हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पक्षी वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया।

सारिका तथा मैना प्रजाति के कुछ पक्षियों, जो हालैंड से फ्रांस जाने के लिए उड़ानें भर रहे थे, को वैज्ञानिकों ने पकडकर स्विट्जरलैंड भेज दिया। कुछ दिन बाद जब उनको मुक्त किया तो उनमें से वयस्क पक्षी तो वापस अपनी मंजिल पर पहुंच गए जबकि युवा पक्षी स्विट्जरलैंड के ही इर्द-गिर्द भटक गए।

सर्वप्रथम जर्मनी के हेलिगौलैंड में ही 19 वीं सदी में पक्षी वैज्ञानिक हेनरिक गेटके ने एक पक्षी वैद्यशाला की स्थापना की। पुन: विभिन्न देशों के पलायित पक्षियों की पहचान के लिए डेनमार्क के वैज्ञानिक माटेसेन ने नाम एवं पता लिखी एल्यूमीनियम की मुद्रिका परिदों के पैरों में पहनाने की प्रथा शुरू की।


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