Monday, March 23, 2026
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आपदा बन चुकी है बेरोजगारी

Samvad 24


Napander Abhishake Narap 1आज सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश बेरोजगारी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। इस बार छात्र और सरकार आमने-सामने नजर आ रहे हैं। बेरोजगारी भयावह समस्या बनते जा रही है। वर्तमान सरकार आये दिन सभी सरकारी नौकरियों में पदों की संख्या कम करती जा रही है। अगर कोई बहाली भी आती है तो उसकी परीक्षा होने और अंतिम रूप से चयन की प्रक्रिया में 3-4 वर्षों से अधिक लग जा रहे हैं। पूर्व से निकाले गए नोटिफिकेशन में एनटीपीसी ने अपने नियम बीच मे ही बदल दिए हैं। इसके पहले जारी परिणाम के नियमों में भी अनुदेशों से हट के नियम बदले गए, जिसके बाद जगह-जगह छात्रों का व्यापक विरोध देखने को मिला है। छात्रों के व्यापक रोष को देखते हुए सरकार ने एक समिति बनाई है, जिसके द्वारा समाधान करने का प्रयास होगा।

सीएमआइइ (सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकानामी) की 31 दिसंबर तक के आंकड़ों के आधार पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी का राष्ट्रीय दर नवंबर में 7.1 प्रतिशत था, जो बढ़ कर दिसंबर में 7.91 हो गया है। जहां तक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की बेरोजगारी का सवाल है, दिसंबर में दोनों क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई है। पूरे साल की तुलना करें तो बिहार में दिसंबर में सर्वाधिक बेरोजगारी दर दर्ज की गई है। बिहार में एक प्रतिशत से अधिक बेरोजगारी बढ़ी है। नवंबर में राज्य में बेरोजगारी दर 14. 8 प्रतिशत थी। दिसम्बर में यह 16 प्रतिशत हो गई। देश के छह राज्यों में बेरोजगारी दर इस समय दो अंकों में है। बिहार का चौथा स्थान है। बेरोजगारी के मामले में हरियाणा शीर्ष पर है। दिसंबर में इस राज्य में बेरोजगारी 34.1 प्रतिशत पर पहुंच गई। 27.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ राजस्थान दूसरे नंबर पर है। 17.3 प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ झारखंड तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और बिहार के अलावा त्रिपुरा और जम्मू-कश्मीर की बेरोजगारी दर दो अंकों में है। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में बेरोजगारों की फौज इकट्ठा हो रही है। भारत में जो हालात हैं, उसमें बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है।

देश में शिक्षा की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, कौशल की कमी, प्रदर्शन संबंधी मुद्दे और बढ़ती आबादी सहित कई कारक भारत में इस समस्या को बढ़ाने में अपना योगदान देते हैं। इस कारण से भारत के जीडीपी पर भी असर साफ दिख रहा है। बेरोजगारी की वजह से गंभीर सामाजिक-आर्थिक परिणाम होते हैं। इससे न केवल एक व्यक्ति बल्कि पूरा समाज प्रभावित होता है। बेरोजगारी समाज में विभिन्न समस्याओं का मूल कारण है। बेरोजगारी को दूर करने के लिए हालांकि सरकार ने कुछ हद तक कदम भी उठाए हैं, लेकिन उठाए गए उपाय पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। सरकार योजनाओं के माध्यम से निजी नौकरियों में वृद्धि करना चाहती है, लेकिन कोरोना के बाद निजी क्षेत्र खुद ही घुटन महसूस कर रहा है। उच्च डिग्री प्राप्त किए हुए छात्र सरकारी नौकरी के इंतजार में हैं, लेकिन सरकार नोटिफिकेशन निकालने के लिए तैयार नहीं है। अगर नोटिफिकेशन निकल भी गया तो परीक्षा समय पर नहीं हो पाती है। इसका उदाहरण हमारे सामने है-एनटीपीसी द्वारा 2019 में निकाले गए नोटिफिकेशन के बाद भी अब तक पूर्ण नहीं हो पाया है। हद तो ये है कि बिहार में बीएसएससी द्वारा 2014 में निकाले गए नोटिफिकेशन की भर्ती अब तक पूर्ण नहीं हो पाई है।

एनटीपीसी की वैकेंसी पर प्रतियोगी छात्र प्रिंस ने बतलाया कि 2019 में आई इस नोटिफिकेशन में कहा गया था कि पहले फेज के परीक्षा में 20 गुना अधिक रिजल्ट घोषित होगा लेकिन जब रिजल्ट आया तो एक ही अभ्यर्थी का 5-5 पदों के लिए हो गया और किसी का 75 मार्क्स लाकर भी सीबीटी 2 देने के लिए चयन नहीं हुआ। देश के हजारों छात्र इस निर्णय से बहुत गुस्से में है। वर्तमान मोदी सरकार और रेलवे बोर्ड को फिर से रिजल्ट देना होगा नहीं तो देश के युवा बहुत बड़ी क्रांति लाने वाले हैं। एक प्रतियोगी छात्र आदर्श ने कहा कि रेलवे ग्रुप डी की जो 2019 में ही बहाली आई थी। अब 3 वर्ष बाद बोर्ड का निर्णय आया है कि इसमें भी दूसरे फेज की परीक्षा होगी। 3 वर्षों में परीक्षा नहीं हुई और अब इस निर्णय से लग रहा है विलम्ब होते जाएगा । रोहित कहते हैं कि ऐसा लग रहा है कि सरकार युवाओं को रोजगार देना ही नहीं चाहती है। बस युवाओं को बरगलाया जा रहा है। ये देश के युवाओं के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है। अगर अभी से सरकार ने व्यवस्था को नहीं सुधारा तो छात्र एक बड़े आंदोलन पर जा सकते है क्योंकि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
सरकार को बेरोजगारी के समाधान करने के लिए दूरगामी उपाय करनी होगी। इसके लिए सरकार को चाहिए कि सरकारी नोटिफिकेशन में अनियमितता को खत्म करे और संबंधित बोर्ड एक कैलेंडर जारी कर के समय पर परीक्षा आयोजित करे। इसके लावा परीक्षाओं में हो रही धांधली को भी रोकना होगा। इसके लिए पारदर्शिता अपनाया जरूरी है। छात्रों को भी समझना चाहिए कि सिर्फ सरकारी नौकरी को ही रोजगार न मानें और निजी नौकरी और स्वरोजगार को भी अपनाएं। इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने पर ध्यानाकर्षण करना होगा । तात्कालिक उपाय के रूप में लोगों को निजी व्यवसायो में लगने के प्रशिक्षण की व्यवस्था करके उन्हें धन उपलब्ध कराना होगा। ताकि नौकरियों की तलाश कम हो सके और लोग स्वरोजगार अपना कर भरण पोषण कर सकें। बैंक से ऋण लेने में लोगों को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका समाधान त्वरित जरूरी है।

गांवो में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए कुटीर उद्योग-धंधों को बढ़ावा देना होगा । इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा समय पर कच्चा माल उपलब्ध कराना होगा। सरकार को उचित मूल्य पर तैयार माल खरीदने की गांरटी देनी होगी। यह काम सहकारी संस्थाओं के द्वारा आसानी से कराया जा सकता है। बेरोजगारी दूर करने के दीर्घगामी उपाय के रूप में हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना पड़ेगा । नई शिक्षा नीति में होने वाले परिवर्तन से कुछ समाधान हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव दूरगामी ही होगा त्वरित नहीं। सरकार को चाहिए कि ठोस कदम उठाए और छात्रों के रोष को कम किया जाए। इसके किए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसके अलावा नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए।


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