Friday, May 22, 2026
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बरानी की खेती में उवर्रक से समुचित लाभ

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भारतीय कृषि का 70 प्रतिशत भाग वर्षा आधारित अर्थात बारानी खेती के अंतर्गत आता है। जिसका उत्पादन औसत उत्पादन के आंकड़ों को नीचे गिराता रहता है। किसी भी जिन्स का उत्पादन दो टन/हेक्टर की सीमा प्रयासों के बावजूद भी नहीं छू पाया है जो एक गंभीर समस्या थी और वर्तमान भी इससे अछूता नहीं रह पा रहा है। ‘एक तो दुबरे और दो-दो अषाढ़’ वाली कहावत चरितार्थ होती है, जब एक ना एक प्राकृतिक आपदा उभर कर आती है कभी कम वर्षा तो कभी वर्षा का अतिरेक। आपदा और खेती का चोली दामन का साथ होता है। एक दशक से कुछ अधिक ही देखने में आ रहा है, परंतु कुछ भी सकारात्मक करने में हमारा श्रम और हमारा विज्ञान दोनों घुटने टेकने पर मजबूर हो रहे हैं।

सिंचित कृषि में तो उर्वरक का उपयोग अधिकांश कृषक करते हंै परंतु असिंचित खेती में तो खेत की तैयारी से लेकर बुआई पोषक तत्व प्रबंध तथा रखरखाव सभी में कोताही आम बात है आज आधुनिक खेती में प्राय: सभी फसलों से वांच्छित उत्पादन प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का उपयोग आवश्यक होता जा रहा है, परंतु इन फसलों पर उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग करने के कारण लक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं हो पा रहा है और मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर हो रहा है। एक तरफ तो उर्वरकों की मांग का केवल 70 प्रतिशत ही पूर्ति हो पा रही है तो दूसरी ओर उसका स्थापन यथाविधि ना होने से उसका समुचित लाभ भी आपेक्षित है।

कृषक की आर्थिक स्थिति आज भी ऐसी नहीं है कि उर्वरक, सिफारिश की गई मात्रा का बोझ सरलता से उठा सके इस स्थिति से निपटने के लिये खड़ी फसल पर पर्णीय (पत्तों) पर छिड़काव एकमात्र रास्ता है। जिससे कम खर्च में अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सकता है इसके द्वारा पौधों की आवश्यकता के अनुरूप नत्रजन, पोटाश तथा सूक्ष्म तत्व जैसे जस्ता, गंधक, लोहा इत्यादि का छिड़काव करके फसलों की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है और उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है। इस विधि से उर्वरक की कम मात्रा से फसलों की भूख मिटाई जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि मृदा में पर्याप्त मात्रा में हवा, पानी, जीवांश पदार्थ तथा अन्य उपयोगी जीवाणुओं की सक्रियता से ही बुआई के समय दिया गया उर्वरक का समुचित लाभ लिया जा सकता है। इनमें से किसी एक का असंतुलन पौधों द्वारा उर्वरक के अवशोषण में बाधक बन सकता है। ऐसी स्थिति में पत्तों में घोल बनाकर दिया गया उर्वरक, सूक्ष्म तत्वों का पूरा-पूरा लाभ पौधों में मिल सकता है तथा खुराक पूरी होने से उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है।

बारानी खेती में ऐसी ही स्थितियां सतत निर्मित होती हंै, परिणामस्वरूप मिट्टी से पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है और उत्पादन प्रभावित करता है यही कारण है कि पर्णीय छिड़काव का महत्व बारानी फसलों के लिये अधिक सार्थक होता है। पर्णीय छिड़काव के ‘एक पंत दो काज’ जैसा भी उपयोगी माना जा सकता है यदि उसके साथ कीटनाशक/फफूंदनाशी दवाओं को भी मिलाकर छिड़का जाए इससे समय, श्रम और खर्च सभी में कमी करके उत्पादन लागत भी कम किया जा सकता है।


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