Wednesday, May 25, 2022
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सस्ती डिग्री की चाह ले जाती है भारतीय छात्रों को विदेश

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रूस- यूक्रेन जंग की विभीषिका के नकारात्मक असर सामने आने लगे हैं। इस महाविनाश के तात्कालिक असर से ही दुनिया कराहने लगी है। तात्कालिक असर की सबसे भयानक तस्वीर भारत से जुड़ी है। देश से हजारों की संख्या में मेडिकल की पढ़ाई करने यूक्रेन गए छात्र वापस हो गए हैं। उनका भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है। जब वे जा रहे होंगे तो डॉक्टर बनने के सपने की खुशी उनके चेहरे पर दिख रही होगी लेकिन आज उनकी मायूसी और दर्द की डिग्री का अंदाज लगाना मुश्किल है।

जान बचाकर भारत लौट आए इन छात्रों के भविष्य को संवारने की राह भारत सरकार तलाश रही है लेकिन इन सबके बीच देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधन को लेकर दो तरीके का विमर्श खड़ा होता दिख रहा है। इन छात्रों की परेशानी और बेबसी के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या और संसाधन बढ़ाने की मांग तेज हुई है। हर साल भारत में मेडिकल कोर्सों में शामिल होने के लिए करीब 15 लाख छात्र प्रवेश परीक्षा देते हैं जबकि सरकारी और निजी मिलाकर कुछ सीटें करीब 85 हजार हैं। ऐसे में प्रतिस्पर्धा का स्तर बहुत ऊंचा होता है।

सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीमित सीटों के चलते नामांकन बड़ी चुनौती होती है तो देश के निजी शिक्षण संस्थानों में फीस अधिक होने के कारण आम परिवार के बच्चे अपने सपने को पूरा करने के लिए पलायन पर विवश होते हैं। निजी शिक्षण संस्थान में एमबीबीएस पाठ्यक्र म पूरा करने में करीब एक करोड़ का खर्चा आता है जबकि यही डिग्री विदेश में 30 लाख में मिल जाती है।

विमर्श का दूसरा पहलू एक बड़े कारोबार के फलने-फूलने की आशंका को जन्म देता है। माना जाता है कि तगड़ी प्रतिस्पर्धा से परहेज करने वाले वे बच्चे जो संपन्न परिवारों से आते हैं, वे धन के बूते विदेश के इन देशों से डिग्री आसानी से हासिल कर लेते हैं। इस प्रक्रि या में इस पूरे तंत्र को चलाने वाले लोग इनके मददगार बनते हैं। बहरहाल विपत्ति की इस घड़ी में यूक्र ेन से वापस आए मेडिकल के छात्रों के सपनों को पूरा करने की चुनौती सबसे बड़ी है।

भारत से विदेश पढ़ने के लिए जाने वाले 60 प्रतिशत बच्चे चीन, रूस और यूक्रेन जाते हैं। 30 प्रतिशत बच्चे अकेले पढ़ाई करने के लिए चीन जाते हैं। हर साल औसतन 20-25 हजार बच्चे मेडिकल की पढ़ाई करने विदेश जाते हैं। किफायत के साथ-साथ भारत में विकल्पों की कमी भी कई बच्चों के लिए विदेश जाकर पढ़ने का कारण बनती है। हर साल करीब 7 से 8 लाख बच्चे मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए होने वाली पात्रता परीक्षा नीट पास करते हैं।

देश में मेडिकल कॉलेजों में सीटों की कुल उपलब्धता से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में बच्चे नीट क्वालिफाई करने के बाद भी यहां किसी कॉलेज में प्रवेश नहीं ले पाते हैं। ऐसे में विदेश के सस्ते विकल्प उन्हें आकर्षित करते हैं। एक कारण यह भी है कि विदेश के इन मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाना भारत के कॉलेजों की तुलना में आसान और कम प्रतिस्पर्धी भी होता है। नीट में कम अंक पाने वाले बच्चे भी वहां प्रवेश पाने में सफल हो जाते हैं।

आमतौर पर विदेश में पढ़ाई की बात आते ही हमारे मन में विचार आता है कि मेडिकल की पढ़ाई का खर्च भारत में पढ़ने के मुकाबले निश्चित तौर पर ज्यादा ही होगा हालांकि ऐसा नहीं है। एमबीबीएस की पढ़ाई की बात की जाए तो कई देश हैं जहां से पढ़ना अपने देश के मुकाबले बहुत सस्ता पड़ जाता है।

भारत में मेडिकल कॉलेज में मैनेजमेंट कोटा से पढ़ाई का खर्च कुल साढ़े 4 साल में 30 से 70 लाख रूपए आता है। हॉस्टल, मेस, डेवलपमेंट चार्ज और परीक्षा शुल्क जैसे अन्य खर्चों को जोडकर यह और भी ऊपर चला जाता है। वहीं चीन, रूस, यूक्रेन और किर्गिस्तान जैसे देशों में 20 से 35 लाख रूपए में पढ़ाई हो जाती है। रहना-खाना और साल में एक बार घर आने-जाने का खर्च मिलाकर भी 50 लाख से कम ही खर्च होता है।

चीन, यूक्रेन जैसे देशों के कई कॉलेजों की पढ़ाई की गुणवत्ता कम पाई गई है। इसे देखते हुए भारत सरकार ने यहां आने के बाद उनके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट अनिवार्य किया है। यह भी इन छात्रों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। भारत में स्क्रीनिंग टेस्ट पास करने के बाद ही डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस का लाइसेंस मिलता है। परीक्षा जून और दिसंबर में आयोजित की जाती है। कुछ कंसल्टेंट फर्म हैं जो इन बच्चों को टेस्ट की तैयारी में मदद करते हैं। अक्सर विदेश से पढकर आने वाले ये बच्चे तैयारी के लिए दिल्ली और बेंगलुरू जैसे शहरों में ठहरते हैं।

2014 के पहले देश में औसतन 6 मेडिकल संस्थान प्रतिवर्ष खुलते थे। 2014 के बाद जो सक्रि यता इस क्षेत्र में आई, उससे यह औसत 29 प्रतिवर्ष पहुंच गया है। इसे और बढ़ाना होगा। स्वतंत्रता के बाद यह सामान्य अपेक्षा थी कि वैश्विक स्तर पर आबादी की तुलना में डॉक्टरों की उपलब्धता की दिशा में भारत भी आगे बढ़ेगा हालांकि ऐसा हुआ नहीं। जनसं?या की तुलना में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बहुत धीमी गति से बढ़ी। इसी कारण से हर साल विदेश जाने वाले बच्चे बढ़ते गए।

यूक्रेन  सहित कई देशों में मेडिकल की पढ़ाई सस्ती है। वहां प्रवेश परीक्षा भी नहीं होती। वर्षों पहले ऐसे मामले भी देखे गए थे कि 12वीं में बायोलॉजी नहीं पढ़ने वाले छात्र भी कई देशों में जाकर मेडिकल में दाखिला ले लेते थे। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने इस पर रोक लगा दी है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के नियमों के अनुसार विज्ञान के छात्र ही मेडिकल की पढ़ाई करने विदेश जाते हैं। वहां से आकर उन्हें स्क्रीनिंग टेस्ट पास करना होता है। तभी यहां प्रैक्टिस का लाइसेंस मिलता है।

सस्ती पढ़ाई वाले देशों ने बच्चों को ज्यादा लुभाया है। इन देशों से पढकर आने वाले छात्रों को भारत में टेस्ट पास करना पड़ता है जिसमें सफलता की दर बहुत कम है। ऐसे में विदेश से मेडिकल की पढ़ाई के बाद भी बहुत से बच्चे बस मन मसोस कर ही रह जाते हैं। इनमें से कई को अन्य व्यवसाय में जाना पड़ता है जिससे उनकी पढ़ाई और प्रशिक्षण का कोई उपयोग नहीं हो पाता है।

रूस-यूक्रेन संकट के बीच मेडिकल की पढ़ाई को लेकर केंद्र सरकार भी सक्रिय हुई है। इस बात के इंतजाम किए जा रहे हैं कि बच्चों को देश में ही पढ़ाई का अवसर मिले। यह एक सराहनीय पहल है। इससे पैसे के बदले डिग्री के खेल से जुड़े विदेशी कॉलेजों से भारतीय छात्र बचे रह पाएंगे।

मौजूदा संकट को देखते हुए त्वरित समाधान की खोज और अनुपालन के साथ ही मेडिकल शिक्षा में सुधार और विस्तार की जरूरत है। योजनाओं के समयबद्ध क्रि यान्वयन पर भी जोर देना होगा। इसके लिए राज्यों को केंद्र के साथ मिलकर देश हित में प्रयास करना होगा। सरकार ने कदम बढ़ाया है। वहां से आने वाले छात्रों को इंटरर्नशिप पूरी करने की अनुमति भी मिल चुकी है।

नरेन्द्र देवांगन


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