Saturday, April 25, 2026
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सामयिक: बजट से अपेक्षाएं और चुनौतियां

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अतवीर सिंह

कोविड-19 महामारी से पूरी दुनिया पिछले एक साल से जूझ रही है। इस महामारी ने लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक सेहत पर भी गहरा प्रभाव डाला है। हाल ही में नेशनल स्टटिस्टिकलआॅफिस द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में देश की जीडीपी में लगभग 7.7 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। मांग पक्ष की यदि बात करें तो निजी खपत/उपभोग में 9.5 प्रतिशत, प्रति व्यक्ति निजी खपत में 10.4 प्रतिशत एवं पूंजी निर्माण में 14.5 प्रतिशत  गिरावट का अनुमान है। इसके अलावा आयात-निर्यात में भी लगातार गिरावट के संकेत हैं। केवल सरकारी उपभोग में धनात्मक वृद्धि दर्ज हुई है। मैन्युफैक्चरिंग में 9.3  प्रतिशत के साथ-साथ निर्माण में 12.6 प्रतिशत, व्यापार एवं होटल में 21.4 प्रतिशत का संकुचन हुआ है। उपर्युक्त क्षेत्रों में, रोजगार की उच्च गहनता के कारण संकुचन से बेरोजगारी बढ़ी है। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2020-21 की प्रथम छमाही (अप्रैल-सितम्बर) में जहां केंद्र सरकार की कुल प्राप्तियों में 33 प्रतिशत की कमी आई वहीं अनेक अर्थशास्त्रियों द्वारा कुल सार्वजनिक व्यय में भारी वृद्धि के सुझाव के बावजूद कुल सार्वजनिक व्यय में लगभग 0.6 प्रतिशत की कमी हुई।

अर्थव्यवस्था को गति देने और वर्तमान संकट से अर्थव्यवस्था को बाहर लाने के लिए सरकार को बजट के माध्यम से सीधे गरीब उपभोक्ता वर्ग की आय को बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को बजट के माध्यम से लोगों के हाथ में सीधे कैश पहुंचाने की व्यवस्था करने की आवश्यकता  है। इसके लिए सरकार सभी लंबित कर-वापसियों का भुगतान, राज्य सरकारों के जीएसटी के बकाये का शीघ्र भुगतान और सभी कंपनियों के बकाया बिलों का भुगतान कर अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह को बढ़ा सकती है।

कोरोना के कारण जिन्होंने अपना रोजगार खोया है, बजट से उन लोगों की उम्मीदें भी बढ़ती जा रही हैं। अत: आगामी  बजट में देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने पर फोकस किया जाना चाहिए। कोविड-19 महामारी के कारण सेवा क्षेत्र (विशेष कर हॉस्पिटैलिटी सेक्टर) के साथ-साथ एमएसएमई क्षेत्र भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ था। मांग में आई कमी को देखते हुए आगामी बजट में खपत को प्रभावित करने वाले करों में कमी करनी चाहिए, जिससे मांग को प्रोत्साहन मिल सके। भारतीय अर्थव्यवस्था के मिजाज को समझे बिना केवल चार घंटे के नोटिस पर अचानक लिए गए तालाबंदी के निर्णय की सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ी थी, जिस कारण उन्हें अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा।  इससे पहले से ही बदहाली के शिकार कृषि क्षेत्र पर इनकी निर्भरता का अतिरिक्त भार आ पड़ा। इसलिए आगामी बजट में कृषि क्षेत्र, विशेषकर कृषि श्रमिकों के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। किसान सम्मान राशि को बढ़ाकर दो हजार प्रति माह कर देना चाहिए एवं केवल योग्य लाभार्थी तक ही इसकी पहुंच सुनिश्चित होनी चाहिए। इसके साथ ही असंगठित क्षेत्र में भी रोजगार के नये अवसर सृजित करने हेतु सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए बजट के माध्यम से सुसंगत प्रावधान करने आवश्यक हैं, जिससे वहां पर्याप्त ऋण प्रवाह सुनिश्चित हो सके। ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं-जैसे संपर्क मार्गों का निर्माण, ईवेन सिंचाई की सुविधाओं, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल एवं अस्पतालों के निर्माण आदि पर बड़ा निवेश करने की महती आवश्यकता है। इससे निजी खपत में वृद्धि होगी और मांग को बढ़ावा मिलेगा, जिसके परिणामस्वरूप आय और रोजगार पर सकारात्मक असर होगा।

कोरोना महामारी से सबक लेते हुए सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में कम से कम ढाई-तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त व्यय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जिससे कि भविष्य में कोविड-19 की संभावित दूसरी लहर का मुकाबला आसानी से किया जा सके। मालूम हो कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान इस क्षेत्र में जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत धन खर्च किया है। सरकार द्वारा महामारी को शिक्षा पर बड़े निवेश के अवसर के रूप में देखना चाहिए। रियल एस्टेट नौकरियां देने का एक प्रमुख क्षेत्र है। साथ ही जीडीपी में भी इसका बड़ा योगदान है, इसलिए इस क्षेत्र में निवेश की बाधाओं को दूर करने पर भी बजट में प्रावधान जरूरी है। आर्थिक नुकसान की भरपाई करने के लिए इस बजट में निवेश पर आधारित राहत और लचीलापन देखने को मिलना चाहिए।

मौजूदा समय में सरकार के वित्तीय संसाधनों पर बहुत ज्यादा दबाव है। इसलिए इनकम टैक्स स्लैब या रेट में  बड़े पैमाने पर बदलाव की अपेक्षा करना बेकार है। अर्थव्यवस्था में मांग की कमी को देखते हुए सरकार को बजट में ऐसा कोई नया कर नहीं लगाया जाना चाहिए जो मांग को  प्रभावित करे। राजस्व जुटाने के लिए सरकार कर विवाद के मामलों को हमेशा के लिए निपटाने का ईमानदारी से प्रयास करे।

एक अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 तक 9.5 लाख करोड़ रुपये का कर विवादों में फंसा था। इसमें शामिल 4.05 लाख करोड़ रुपये निगम कर और 3.97 लाख करोड़ रुपये आयकर का था। इसके अलावा 1.54 लाख करोड़ रुपये के वस्तु एवं सेवा कर भी विवाद में रहे हैं। कोविड-19 टीकाकरण के लिए सालाना पचास लाख रुपये से अधिक कमाने वालों पर उपकर लगाया जा सकता है लेकिन ऐसे उपकर को केवल एक साल के लिए ही रखा जाना चाहिए। इसके अलावा सरकार को वेल्थ टैक्स एवं एस्टेट ड्यूटी को भी पर्याप्त राजस्व जुटाने के लिये उपयोग करना चाहिए। इससे न केवल सरकार को राजस्व की प्राप्ति होगी बल्कि धन और आय के वितरण में व्याप्त असमानताओं को भी कम करने में मदद मिलेगी।वित्त मंत्री कुछ बचत योजनाएं या टैक्स फ्री बॉन्ड जारी करने की घोषणा कर सकती हैं, जिससे सरकार को खर्च के लिए वित्तीय संसाधन मिलेंगे।

चालू वित्त वर्ष के दौरान केंद्र और राज्यों का कुल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 12 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। इसमें केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 7.4 प्रतिशत तक हो सकता है। बजट में ऐसी उम्मीद है कि वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटे को कम करते हुए 5.2 प्रतिशत पर लाया जा सकता है। इस बजट के माध्यम से सरकार द्वारा उचित राजकोषीय प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर निजी निवेशकों के लिए उचित वातावरण उपलब्ध कराने पर जोर देना चाहिए।

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