Wednesday, May 27, 2026
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गांधी का देश तटस्थ!

 

Samvad


Kishan Partap Singhदुनिया को ‘वार एंड पीस’ (युद्ध और शांति) जैसा बेमिसाल उपन्यास दे गए रूस के महान साहित्यकार लियो टॉल्सटॉय, जिन्हें भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आध्यात्मिक गुरु भी कहा जाता है, अपने देश को ही नहीं, सारी दुनिया को अपने पड़ोसी से झगड़ने व हिंसा का सहारा लेने से मना कर गए हैं। उनका संदेश है: किसी और को पीड़ा देने से अच्छा है खुद पीड़ित हो जाओ और बिना किसी प्रतिरोध के हिंसा का सामना करो। लेकिन विडम्बना देखिए कि दुनिया तो दुनिया, खुद उनके देश ने ही उनकी अनसुनी करके पड़ोसी यूक्रेन पर धावा बोल दिया और एटमी धमकी देकर विश्व शांति को खतरे में डाल दिया। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि अकबकाई हुई दुनिया न सिर्फ ‘वार ऐंड पीस’ बल्कि अनेक अन्य चिंतकों व सर्जकों के युद्ध व शांति संबन्धी चिंतनों व सर्जनाओं का पुनरावलोकन कर उनमें उजाले की ऐसी किरणें तलाशे, जिनकी बिना पर इस विभीषिका के अंधेरों के पार जाया जा सके।

यों यह पुरावलोकन स्वाभाविक न हो तो भी जरूरी है क्योंकि पिछले दो तीन दशकों में सर्वथा एकध्रुवीय बना दी गई हमारी दुनिया में जो शक्तियां विश्वशांति का अलम लिए फिरती थीं, रूस-यूक्रेन भिड़ंत के बाद उन्होंने यह साबित करने में कतई देर नहीं लगाई है कि अभी भी उनके वे स्वार्थ ही उनकी पहली प्राथमिकता है, जो शांति से नहीं बल्कि युद्धों व टकरावों से ही सधते हैं। वे टॉल्सटॉय के इन शब्दों में भी अपना विश्वास असंदिग्ध नहीं रख पा रहीं कि एक इंसान का दूसरे के लिए सबसे बड़ा उपहार शान्ति है। फिर वे यही क्यों समझने लगीं कि टॉल्सटॉय ने क्यों रूसी सेना में भर्ती होकर 1855 के क्रीमियाई युद्ध में भाग लेने के अगले ही वर्ष सेना छोड़ दी थी, युद्धों की निरर्थकता प्रमाणित करने वाले उक्त उपन्यास की रचना में प्रवृत्त हो गए और मन की शांति तलाशने लगे थे? फिर क्यों उन्होंने उसके लिए अपनी धन-संपत्ति त्याग दी थी।

टॉल्सटॉय के आध्यात्मिक शिष्य गांधी के देश की बात करें तो उसने महाभारतकाल से अब तक अनेक विध्वसंक युद्ध लड़े या उनमें भाग लेने को अभिशप्त रहा है। लेकिन उसके कई न्यूज चैनल व अखबार रूस-यूक्रेन युद्ध की खबरें कुछ इस अंदाज में प्रसारित-प्रचारित कर रहे हैं जैसे वह कोई त्रासदी नहीं बल्कि उत्सव हो। इन चैनलों व अखबारों ने 1990 के खाड़ी युद्ध के वक्त भी ऐसा ही किया था और हाल के अफगानिस्तान युद्ध के वक्त भी। फिलहाल, वे कतई नहीं समझना चाहते कि टॉल्सटॉय के देश की तरह गांधी के इस देश में भी युद्ध और शांति संबन्धी कुछ कम चिंतन नहीं हुए हैं।

इसे यों समझ सकते हैं कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने यह घोषणा करते हुए भी कि शांति नहीं तब तक जब तक/सुख-भाग न सबका सम हो।/नहीं किसी को बहुत अधिक हो।/नहीं किसी को कम हो।/स्वत्व माँगने से न मिले/संघात पाप हो जाएं।/बोलो धर्मराज शोषित वे/जियें या कि मिट जाएं?/न्यायोचित अधिकार मांगने/से न मिले तो लड़ के/तेजस्वी छीनते समर को/जीत या कि खुद मर के।/किसने कहा पाप है समुचित/स्वत्व-प्राप्तिहित लड़ना?/उठा न्याय का खड्ग समर में/अभय मारना-मरना? अपनी ओर से यही व्यवस्था दी कि युद्ध को वे दिव्य कहते हैं जिन्होंने/युद्ध की ज्वाला कभी जानी नहीं है। अलबत्ता, युद्ध छेड़ या जबरन थोप दिए जाने की स्थिति में वे कायरता प्रदर्शित करने अथवा तटस्थता बरतने की हिमायत कतई नहीं करते। इसके उलट उन्होंने इन दोनों को ही अपराध बताया और लिखा है: समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।

लेकिन जैसे टॉलस्टॉय का देश आज उनके संदेश की अवज्ञा कर यूक्रेन पर कहर बरपा रहा है, दिनकर का देश उनके द्वारा तटस्थता को अपराध बताये जाने के बावजूद उसे गले लगाए हुए है। जैसे इस युद्ध के बारे में बात करते हुए दुनिया की दूसरी शक्तियों के स्वार्थ उनके गले में अटक जा रहे हैं, गांधी के देश के लिए भी दुनिया में जहां कहीं भी किसी देश को गुलामी में जकड़ा गया हो या उसकी आजादी पर हमला किया जा रहा हो, उसके संघर्ष को हर तरह के समर्थन व सहयोग की अपनी पुरानी प्रतिबद्धता से न्याय करना मुश्किल हो रहा है। उसे लगता है कि संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस की निंदा के प्रस्ताव पर चीन व संयुक्त अरब अमीरात के साथ तटस्थ रहने भर से उसकी यह प्रतिबद्धता पूरी हो जाएगी। कहां तो रूस और यूक्रेन दोनों से दोस्ती के मद्देनजर समझा जाता था कि वह उन दोनों के विश्वासपात्र पंच की भूमिका निभायेगा और कहां दोनों को खुश रखने के चक्कर में उसका हाल आईपीएल की उन चीयरलीडरों जैसा हो गया है, जो किसी भी टीम के चौके-छक्कों पर फौरन नाच उठने को मजबूर होती हैं। और तो और, उसे यूक्रेन में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी के काम में ही हलकान होकर रह जाना पड़ रहा है।

निर्गुट आंदोलन के संस्थापक इस देश ने दरअसल, पिछले दशकों में दुनिया की गुटीय राजनीति के पाजामे में अपने पैर फंसाकर खुद को इस तरह उलझा लिया है कि दबे हुए स्वर में सबका मुह निहारकर कोई बात कहता भी है तो ऐसे रणनीतिक व कूटनीतिक शब्दों की चाशनी में लपेटकर और कर्मकांड के तौर पर कि उसमें कोई नैतिक आभा नहीं रह जाती।

गांधी के देश का हाल ऐसा बेहाल है तो क्या आश्चर्य कि समूची दुनिया में भय की सभ्यता का ही विकास होता दिखता है, जिसमें एक कवि के अनुसार चांद भी किसी पुरानी दीवार के प्लास्टर की तरह झड़ने को अभिशप्त है। सवाल है कि इस सभ्यता को बर्तोल्त ब्रेख्त की यह बात क्योंकर समझायी जाए: युद्ध जो आ रहा है/पहला युद्ध नहीं है।…पिछला युद्ध/जब खत्म हुआ/तब कुछ विजेता बने/और कुछ विजित/विजितों के बीच/आम आदमी भूखों मरा/विजेताओं के बीच भी/मरा वह भूखा ही।….

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कह गए हैं कि आज के मनुष्य ने मछलियों की तरह जल में तैरना और पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना भले सीख लिया है, मनुष्य की तरह धरती पर चलना उसे अभी सीखना है। मनुष्य की तरह धरती पर चलना न सीख पाने के ही कारण उसकी बार-बार की जाने वाली शांति की कवायदें भी युद्ध की कवायदों में बदल जाती हैं। शांति-शांति की रट लगाते हुए वह जो भी राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय व्यवस्था बनाता है, वही कुछ समय बाद उसके खिलाफ काम करने और युद्ध को खेल या खेल को युद्ध बनाने लग जाती और उसके औजारों को हथियारों में बदलने और उनका उद्योग चलाने लग जाती हैं।
यह स्थिति कैसे बदले? बेहतर दुनिया के सारे पैरोकारों को इस पर मिलकर विचार करना होगा।

कृष्ण प्रताप सिंह


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