
विश्व आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास और विनाश के बीच की रेखा अत्यंत पतली हो चली है। धरती का तापमान बढ़ रहा है, समुद्र का स्तर ऊंचा हो रहा है, और ऋतुएं अपने संतुलन से डगमगा रही हैं। ऐसे समय में जब मानवता ‘शांति और विकास के लिए विश्व विज्ञान दिवस’ मना रही है, वहीं ब्राजील के बेलें नगर में 197 देशों के प्रतिनिधि ‘कॉप-30’ सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की चुनौती पर चिंतन और समाधान की खोज में जुटे हैं। यह सम्मेलन दरअसल 1992 के संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज की उसी श्रृंखला की 30वीं कड़ी है, जहाँ हर वर्ष विश्व समुदाय पृथ्वी के तापमान को सीमित करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और हरित ऊर्जा के विस्तार पर मंथन करता है।
कॉप-30 की इस वैश्विक बैठक का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि अब तक के सभी सम्मेलनों के बावजूद पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने हाल ही में चेतावनी दी है कि हम ‘जलवायु आपातकाल’ के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। वर्ष 2023 और 2024 इतिहास के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं, और यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2025 तक औसत वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की उस सीमा को पार कर सकता है, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘अपरिवर्तनीय खतरे की रेखा’ कहा है। इस सीमा के पार पहुँचने का अर्थ होगा, हिमनदों का तीव्र पिघलना, समुद्र तटीय शहरों का डूबना, जैव विविधता का ह्रास और मानव अस्तित्व के लिए भयावह संकट का आ जाना।
यह सर्वविदित तथ्य है कि औद्योगिक क्रांति से लेकर आज तक पृथ्वी पर तापमान वृद्धि का सबसे बड़ा कारण विकसित देशों का अति-उत्पादन और असीम उपभोग रहा है। कार्बन उत्सर्जन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा उन्हीं देशों का है, जिन्होंने विकास की दौड़ में पर्यावरण की परवाह किए बिना संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया। इसके विपरीत विकासशील और गरीब देश आज जलवायु संकट की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं, जबकि उन्होंने इस संकट को पैदा करने में न्यूनतम भूमिका निभाई है। यही कारण है कि कॉप-30 में ‘जलवायु न्याय’ का स्वर पहले से अधिक मुखर है। अब वक्त आ गया है कि समस्त विश्व, विशेष रूप से विकसित राष्ट्र, अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकारें और जलवायु अनुकूलन व नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण के लिए पर्याप्त वित्तीय सहयोग प्रदान करें।
जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संसाधनों की रही है। हाल में प्रकाशित रिपोर्ट में राकेश मोहन और जनक राज ने बताया है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वर्ष 2030 तक लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त जलवायु वित्त की आवश्यकता होगी। यह राशि सुनने में बहुत बड़ी लग सकती है, परंतु जब इसे वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में देखा जाए तो यह मात्र 0.6 प्रतिशत बैठती है। अर्थात यदि विकसित देश अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाएं तो यह लक्ष्य न केवल संभव बल्कि व्यावहारिक भी है। रिपोर्ट के अनुसार अजेंटीना, ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, भारत, मेक्सिको, रूस, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किये जैसे नौ प्रमुख उभरते देशों को 2022 से 2030 के बीच बिजली, परिवहन, सड़क, इस्पात और सीमेंट जैसे चार प्रमुख क्षेत्रों में 2.2 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। इन क्षेत्रों का जलवायु परिवर्तन में सबसे अधिक योगदान है। अत: इनका डीकार्बोनाइजेशन प्राथमिकता पर होना चाहिए। भारत के संदर्भ में यह अनुमान लगाया गया है कि देश को 2030 तक लगभग 470 बिलियन डॉलर (प्रति वर्ष लगभग 55 बिलियन डॉलर) की जलवायु वित्त की जरूरत होगी। यह उसके जीडीपी का लगभग 1.3 प्रतिशत है। भारत की यह आवश्यकता चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी है, परंतु भारत ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अद्भुत प्रगति कर इस चुनौती को अवसर में बदल दिया है।
भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक देश है, परंतु उसने जिस तीव्रता से अक्षय ऊर्जा को अपनाया है, वह प्रेरणादायक है। भारत की कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता अब 500 गीगावाट से अधिक है, जिसमें से आधे से अधिक यानी लगभग 256 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त होते हैं। यह न केवल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि विश्व को स्वच्छ, सुरक्षित और स्थायी ऊर्जा की दिशा में आश्वस्त करने वाला उदाहरण भी है।
कॉप-30 से यह अपेक्षा की जा रही है कि यह सम्मेलन केवल बयानबाजी या प्रतीकात्मक सहमति तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस वैश्विक नीति निर्माण का आधार बने। पिछले कुछ वर्षों में कॉप सम्मेलनों में यह देखा गया है कि देशों के बीच ‘प्रतिबद्धता और क्रियान्वयन’ के बीच एक बड़ी खाई रह जाती है। विकसित देश अक्सर 100 बिलियन डॉलर की वार्षिक सहायता के अपने वादे को पूरा नहीं कर पाते, जिससे विकासशील देशों में आक्रोश और अविश्वास पैदा होता है। गुतारेस ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा है कि ‘यदि हम 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर वैश्विक तापमान को रोकने में सफल होना चाहते हैं, तो अब सभी राष्ट्रों को अपनी स्वार्थपरता से ऊपर उठकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।’ हालांकि, हरित ऊर्जा में परिवर्तन कोई सरल प्रक्रिया नहीं है। कोयला, तेल और गैस जैसे पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह संक्रमण आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। उदाहरणस्वरूप, इस्पात और सीमेंट उद्योगों में कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (उउर) जैसी तकनीकें अभी अत्यंत महंगी हैं। रिपोर्ट बताती है कि इन क्षेत्रों में कार्बन घटाने की औसत लागत 49 से 66 डॉलर प्रति टन उड2 है। अत: बिना पर्याप्त वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के, विकासशील देशों के लिए इस दिशा में प्रगति कठिन होगी।
कॉप-30 के संदर्भ में सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि इस बार सम्मेलन ‘जलवायु न्याय’ के विचार को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कार्यान्वयन की रूपरेखा में शामिल करे। वैश्विक वित्तीय संस्थानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों को यह समझना होगा कि हरित वित्त केवल सहायता नहीं, बल्कि निवेश है—ऐसा निवेश जो भविष्य की स्थिरता सुनिश्चित करेगा। यदि ऊर्जा संक्रमण को ‘लागत’ की बजाय ‘अवसर’ के रूप में देखा जाए, तो यह आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को एक साथ गति दे सकता है।
कॉप-30 से यही अपेक्षा है कि यह सम्मेलन केवल चचार्ओं का मंच न बने, बल्कि ‘क्रियान्वयन का संकल्प’ बने। आज आवश्यकता इस बात की है कि तमाम नेता एक साझा दृष्टि के साथ आगे बढ़ें—खासतौर पर तब, जब वैश्विक उत्सर्जन पिछले वर्ष फिर एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यदि यह सहमति नहीं बन पाई, तो पृथ्वी के भविष्य पर गहराता अंधकार रोक पाना कठिन होगा।

