Tuesday, April 21, 2026
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अपनों ने किया किनारा

  • मेडिकल में लावारिस हैं, लेकिन मिलता है अपनों सा दुलार
  • मेडिकल के लावारिस वार्ड में सालों से भर्ती मरीजों के परिजनों का पता नहीं

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: बीमारी लेकर मेडिकल में भर्ती हुए। पूर्ण स्वस्थ्य भी हो गए, लेकिन मेडिकल ही उनकी दुनिया बन गया। खाना मेडिकल उपलब्ध कराता हैं तो कुछ समाजिक संस्थाएं इनको कपड़े देती हैं। अस्पताल के बेड भी इनको आवंटित हैं। जो मेडिकल में सुविधाएं हैं, वो इनको मुहैय्या कराई जा रही हैं। वर्तमान में 13 लोग लावारिस है, जो मेडिकल में भर्ती हैं। ये कहां के रहने वाले हैं?

परिजन इनको लेने नहीं आये? लावारिस अवस्था में यहां रह रहे हैं। मेडिकल भी चाहता है कि इनको किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाए। क्योंकि ज्यादातर ये लोग ठीक हो चुके हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं दी जाती हैं। इनमें ज्यादातर मरीज ऐसे परिवारों के होते है, जिनकी माली हालत अच्छी नहीं होती, लेकिन ऐसे भी मरीज मेडिकल में पिछले कई सालों से भर्ती है जिनके परिजनों का पता नहीं है।

यह मरीज अब मेडिकल के नर्सिंग स्टाफ की निगरानी में है, जिनका पूरा ध्यान इनके द्वारा ही रखा जाता हैं। मेडिकल प्रशासन का कहना है लावारिस मरीजों की देखभाल मेडिकल का स्टाफ करता है, कई बार प्रशासन को लिखा गया है कि जो मरीज अब ठीक हो चुके है उन्हें किसी दूसरी जगह शिफ्ट करा दिया जाए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता।

  • केस-1

60 साल की तृप्ति सिन्हा मेडिकल में पांच साल पहले कुत्ते काटने के बाद इलाज के लिए भर्ती की गई थी। किसी अनजान व्यक्ति ने उन्हें मेडिकल की इमरजेंसी में भर्ती कराया था, लेकिन आज भी उनके परिजनों का कुछ पता नहीं है। तृप्ती ने बताया वह झारखंड के धनबाद जिले की रहने वाली है। उसे अपने परिजनों का नाम नहीं पता, अब यहां पर रहते हुए उसे पांच साल से ज्यादा का समय बीत चुका है। मेडिकल का नर्सिंग स्टाफ उनकी देखभाल करता हैं।

  • केस-2

आशु दीन की उम्र 65 साल है, तीन साल पहले पैर में फ्रैक्चर होने पर मेडिकल में भर्ती कराया गया था। आशु ने बताया वह रायबरेली के रहने वाले है, लेकिन परिजनों का पता नहीं। आशु कहते है वह अब इस दुनिया में अकेले हैं। मेरठ कैसे पहुंचे? यह पता नहीं, लेकिन मेडिकल का स्टाफ ही उनकी देखभाल करता हैं। अब ठीक हो चुके हैं, लेकिन कहां जाए, यहां कोई ठिकाना नहीं है। त्यौहार आदि आने पर मेडिकल का स्टाफ व अन्य साथी मरीजों के साथ ही रहते हैं।

  • केस-3

26 साल का राजीव यूपी के बलिया जिले का रहने वाला हैं। छह माह पहले बलिया से महाराष्टÑ नौकरी के लिए जाते समय बुलंदशहर में एक्सीडेंट हो गया था। वह बेहोश हो गया, उसे मेडिकल में किसने भर्ती कराया पता नहीं। तभी से वह यहां रह रहा है। पैर में अब भी जख्म है जिसका इलाज जारी है। उसके घर में अब कोई नहीं है, यहां का स्टाफ ही उसकी देखभाल कर रहा है। अपनों के नहीं होने की वजह से मेडिकल के स्टाफ को ही अपना परिवार समझता है।

  • केस-4

50 वर्षीय रमेश गाजीपुर के रहने वाले है। पिछले एक साल से मेडिकल में भर्ती है, किसी ने सीने में दर्द होने पर मेडिकल की इमरजेंसी में भर्ती कराया था वह कौन था इसकी जानकारी नहीं है। परिवार में सभी लोग है, लेकिन आज तक कोई देखने नहीं आया। अब वह ठीक हो चुके है, लेकिन कैसे अपने परिवार के पास जाए कह नहीं सकते। जब परिवार के लोग उन्हें एक बार भी देखने नहीं आए न ही कभी उनकी सुध ली तो वह उनके पास जाकर क्या करेंगे।

जितने भी लावारिस मरीज है उनकी देखभाल मेडिकल का स्टाफ करता हैं। ठीक हुए मरीजों को हम कहा भेजे, हां यदि प्रशासन इसका इंतजाम करे तो उन्हें यहां से शिफ्ट कराया जा सकता है। कई बार प्रशासन को लिखा गया है, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। -डा. ज्ञानेन्द्र टोंक, कार्यकारी, प्रधानाचार्य मेडिकल कॉलेज।

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