- सफाई मजदूरों के हितार्थ बने अधिनियम में हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध का किया गया है समर्थन
- कई साल से संयुक्त एससी-एसटी कोर्ट में नगर निगम को पक्ष बनाकर लड़ा जा रहा है केस
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: घरों से निकलने वाले कूड़े के साथ-साथ इधर-उधर बिखरे कूड़े-करकट और नालों की सफाई में अपना जीवन स्वाहा कर देने वाले सफाई मजदूरों के हिस्से में सही ढंग से सुरक्षा उपकरण भी नहीं आ पाते हैं। हाथ से मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के लिए बनाए गए एमएस अधिनियम-2013 के प्रावधानों को भी उनके सही रूप में लागू न किए जाने के कारण सफाई मजदूरों के लिए यह एक्ट वजूद के आने के बावजूद इसको साबित करने में नाकाम रहा है।
सफाई मजदूरों की समस्याओं को लेकर जमीनी स्तर की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इस अधिनियम को वास्तविक स्तर पर खराब तरीके से क्रियान्वित किया गया है। इसका परिणाम उन निर्धनों का शोषण है जो इस तरह की घिनौनी प्रथाओं से अपनी रक्षा करने में असमर्थ हैं। इसका प्राय: ठेकेदारों द्वारा शोषण किया जाता है, क्योंकि उनके पास बहुत सस्ते, अकुशल श्रमिक उपलब्ध होते हैं।
इसलिए, ठेकेदार उन्हें अत्यंत अपर्याप्त दैनिक वेतन पर अवैध रूप से नियुक्त करते हैं। मेरठ नगर निगम से लेकर नगर पालिका और नगर पंचायतों में काम करने वाले सफाई श्रमिकों को इस एक्ट के वजूद में आने के नौ साल बाद भी इसके प्रावधानों के सही प्रकार से क्रियान्वयन का इंतजार है। उत्तर प्रदेशीय सफाई मजदूर संघ के जिलाध्यक्ष शिवकुमार नाज का कहना है कि सीवर या नालों की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों को कोई भी उपकरण नहीं दिया जाता।
मैन्युअल रूप से काम कराया जाता है। बड़े नालों की सफाई के लिए आज मशीनें आ गई हैं, लेकिन छोटे नाले की सफाई का काम आज भी आदमी के जरिये कराया जाता है, जो एमएस एक्ट का उल्लंघन है। शिव कुमार नाज के अनुसार संगठन का कहना है कि आदमी से काम कराया जाए, लेकिन उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए। उनको गैस मास्क, दस्ताने, लंबे वाले बूट आदि उपलब्ध कराया जाए।

सीवर लाइन में पाइप डालने का काम आदमी के जरिये ही किया जा सकता है। यह काम मशीन नहीं कर सकती। कोई भी अधिकारी जब चाहे काम करते समय सफाईकर्मियों की दशा देख सकता है। इसके लिए उपकरण उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नगर निगम प्रशासन की है।
इस बारे में सतर्कता समिति की ओर से कई बार नगर आयुक्त को पत्र लिखा जा चुका है। 2018 से लगातार एससी-एसटी कोर्ट में इस मुद्दे को लेकर वाद चल रहा है। तीन नवंबर को भी इस बारे में नगर आयुक्त को तलब किया हुआ है। हम लगातार पत्राचार करते हैं, इस मामले की लगातार तीन संगठन मिलाकर संयुक्त संघर्ष समिति बनाकर कोर्ट में लड़ाई लड़ी जा रही है।
अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष सुभाष चावरियां का कहना है कि एमएस एक्ट-2013 अधिनियम के अनुसार, सेप्टिक टैंक, नालों, रेलवे ट्रैक को साफ करने के लिए नियोजित लोगों को सम्मिलित करने के लिए हाथ से मैला ढोने वालों की परिभाषा को विस्तार प्रदान किया गया है। जिसके अनुसार मैनुअल स्कैवेंजिंग सीवर या सेप्टिक टैंक से हाथ से मानव मल को शारीरिक रूप से हटाने की प्रथा है।
मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में नियोजन का निषेध तथा उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 के तहत, भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह अधिनियम हाथ से मैला ढोने वालों के रोजगार, बिना सुरक्षात्मक उपकरणों के सीवरों एवं सेप्टिक टैंकों की शारीरिक रूप से सफाई को प्रतिबंधित करता है। यह अस्वच्छ शौचालयों के निर्माण पर भी प्रतिबंध लगाता है।

सफाई मजदूर नेता सुभाष चावरियां के अनुसार हथठेला तक पर इस एक्ट में प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें केवल र्इंधन से चलने वाले वाहनों को ही कूड़ा ढोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। स्वच्छ शौचालयों की निगरानी एवं निर्माण प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण, छावनी बोर्ड तथा रेलवे प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र में अस्वच्छ शौचालयों के सर्वेक्षण के लिए उत्तरदायी है। जिसमें उन्हें कई स्वच्छता सामुदायिक शौचालयों का भी निर्माण भी करना होता है।
कार्यान्वयन प्राधिकारी: जिला मजिस्ट्रेट एवं स्थानीय प्राधिकारी कार्यान्वयन प्राधिकारी होते हैं। उल्लंघन करने की स्थिति में दंड अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय एवं गैर-जमानती होंगे एवं इसमें अविलंब अभियोग चलाया जाएगा। इस मामले में समस्या यह है कि व्यवहारिक रूप से यह एक्ट सही ढंग से लागू नहीं हो पाया है। इस सिलसिले में संगठन हर मंच से आवाज उठाता रहा है।
कुछ जगह जूते आदि देकर इतिश्री कर ली जाती है। इस बारे में समाज कल्याण अधिकारी (विकास) पंखुरी जैन का कहना है कि एमएस एक्ट के अंतर्गत डीएम की अध्यक्षता में एक जिला स्तरीय निगरानी समिति गठित है। जिसमें आने वाले ऐसे कुछ संदर्भों के संबंध में नगर निगम से कार्यवाही और रिपोर्ट अपेक्षित रहती है।
वहीं प्रभारी नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. हरपाल सिंह का दावा है कि एमएस एक्ट-2013 का नगर निगम में पूरी तरह पालन कराया जा रहा है। सीवर और नालों की सफाई का कार्य करने वाले सफाई श्रमिकों के लिए सुरक्षा के लिए जरूरी सभी उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं।
एमएस एक्ट- 2013 पर कर्नाटक हाईकोर्ट की व्याख्या
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 2020 में आॅल इंडिया काउंसिल आॅफ ट्रेड यूनियन्स और हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान 44 पृष्ठों में विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि‘इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता है कि हमारा संवैधानिक दर्शन किसी भी प्रकार के मैनुअल स्कैवेंजिंग की अनुमति नहीं देता है।
नागरिक का गरिमा के साथ जीने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के लिए गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का एक अभिन्न अंग है। संविधान की प्रस्तावना से पता चलता है कि संविधान किसी व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करना चाहता है। इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग सबसे अमानवीय है, और यह अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।’

