Monday, January 24, 2022
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वर्चुअल राजनीति में फंस सकती है आॅनलाइन पढ़ाई

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आने वाले समय में राजनीतिक प्रचार और सोशल मीडिया पर दबाव बनेगा नेटवर्क की दिक्कत का कारण

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: जिस तरह से चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव में वर्चुअल प्रचार पर जोर दिया है, उससे राजनीतिक दलों को भले ही परेशानी हो, लेकिन इसका सबसे अधिक नुकसान छात्रों को होगा। क्योंकि आने वाले समय में कोरोना के चलते आॅनलाइन पढ़ाई, आॅनलाइन परीक्षाएं और आॅनलाइन राजनीतिक प्रचार नेटवर्क के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा।

यूपी बोर्ड, सीबीएसई, आईसीएसई और विवि व उससे संबंधित कॉलेजों की परीक्षाएं इसी नेटवर्क पर आश्रित है। आने वाला समय छात्रों के लिए परेशानी ला सकता है।

बता दें कि देशभर मे कोरोना मामलों की बढ़ती रफ्तार की वजह से जहां एक बार फिर से तमाम पाबंदियां लागू हो गई हैं। वहीं, आगे लॉकडाउन के हालातों से भी इंकार नहीं किया जा सकता। शासन की ओर से स्कूल कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों और सभी शैक्षणिक संस्थानों में आॅनलाइन कक्षाएं संचालित करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं।

साथ ही निर्वाचन आयोग द्वारा पांच राज्यों मे विधानसभा चुनावों की तिथि की भी घोषणा भी कर दी गई। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए निर्वाचन आयोग द्वारा भी राजनीतिक दलों से वर्चुअल रैली करने पर ही जोर दिया गया है। ऐसे मे वर्चुअल रैली, पार्टी नेताओं से आॅनलाइन संवाद, बैठकों की सूचनाओं को सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्मों पर कम समय में कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आईटी सेल के कार्यकर्ताओं पर रहने से उनकी सक्रियता सभी प्लेटफार्मों पर रहेगी।

राजनीतिक दलों की आईटी सेल के कार्यकर्ताओं द्वारा पार्टी के घोषणा पत्र, विपक्षी पार्टियों के दावों की पोल खोलने उनके अधूरे वादों को याद दिलाने जैसी सूचनाओं को कम समय मे वर्चुअल कार्यक्रमों के द्वारा आम लोगों तक पहुंचाने पर भी पार्टी कार्यकर्ताओं का जोर रहेगा। जिससे इंटरनेट पर अधिक डाटा प्रयोग करने वालो की भीड़ जमा होने से भी आॅनलाइन पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। इसे लेकर नेटवर्किंग कंपनियों की डाटा स्पीड पर भी साफ असर देखने को मिलेगा जिन छात्रों की परीक्षाएं नजदीक है उन्हें परेशानी झेलनी पड़ सकती है।

राजनीतिक दलों, प्रतियोगी युवाओं, नेटवर्किंग कंपनियों ओर छात्रों के लिए यह एक मुश्किल से कम नही होगा। निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक दलों की सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ गई है। सभी राजनीतिक दल फ्लोवर्स बढ़ाने के लिए तरह-तरह से वर्चुअल प्रचार के हथकंडे अजमा रहे हैं। कोशिश सभी की आम लोगों तक वर्चुअल प्रचार के जरिए पहुंच बनाने की है।

इसके लिए सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्मों का प्रयोग किया जा रहा है। जिससे सोशल मीडिया पर इन प्लेटफार्मों का प्रयोग कर रहे लोगों तक पहुंच बन सके। ऐसे में नई मुसीबत उन सभी छात्रों की होगी जो सोशल मीडिया के उन सभी प्लेटफार्मों का उपयोग भी कर रहे हैं। जहां राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। उनके लिए मुश्किलें हो सकती है। जिनकी परीक्षाएं भी है और वो आॅनलाइन पढ़ाई भी कर रहे हैं।

उनके मोबाइल फोन में नोटिफिकेशन बढ़ेंगे फिर बार-बार नोटिफिकेशन आने से उन्हें देखने से समय भी खर्च होगा और पढ़ाई भी प्रभावित होगी। ऐसे मे प्रचार के ये नए तौर तरीके आॅनलाइन पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए मुसीबत बन सकते हैं। इससे छात्रों की ध्यान प्रक्रिया भंग होने की पूरी गुंजाइश है। ऐसे मे डाटा स्पीड की समस्या के साथ सोशल मीडिया पर अगले एक माह तक जिस तरह की वर्चुअल राजनीति परोसी जाएगी। उसे लेकर भी प्रतियोगी छात्रों को जूझना पड़ेगा।

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