
इंदीवर मिश्रा
दालों का सेहत में बहुत योगदान होता है। उसमें वे सब होता है, जो शरीर का स्वस्थ रखता है। इसलिए दालों का प्रयोग जरूरी है।
अरहर : अरहर की दाल में विटामिन ए, बी, सी पाया जाता है। यह कसैली, रूक्ष, मधुर, शीतल, पचने में हल्की, मलावरोधक, वायु-उत्पादक, शरीर के वर्ण को अच्छा बनाने वाली, कफ और रक्त-संबंधी विकारों को दूर करती है। बच्चों और युवा स्त्री-पुरूषों को अत्यंत लाभ देने वाली होती है लेकिन 40 वर्ष से ऊपर के स्त्री और पुरुष को इसका सेवन अधिक नहीं करना चाहिए। इसके सूखे पत्तों को जलाकर इनकी राख को दही में मिलाकर खुजली वाले स्थान पर लगाने से खुजली रोग दूर हो जाता है। इसके हरे ताजे कोमल पतों में हरी दूब (दूर्वा घास) को मिलाकर, पीसकर, रस निकालकर, छानकर नस्य लेने से आधा सीसी रोग में लाभकारी होता है। इसकी दाल को पीसकर, पानी मिलाकर पीने से भांग का नशा उतर जाता है। इसके हरे ताजे पत्तों को मुंह में डालकर रस लेने से मुंह अच्छा हो जाता है। पत्तियों को उबालकर कुल्ला करने से दांत का दर्द ठीक हो जाता है। इसकी जड़ को साफ करके दांतों से कुचल-कुचल कर चबाने से सांप का विष दूर हो जाता है।
उड़द : उड़द में विटामिन ए, बी, सी पाया जाता है। यह मधुर, रूचिकारक, भारी, वायुनाशक, अत्यंत पुष्टिदायक होती है। उड़द को भिगोकर, पीस कर सफेद कोढ़ पर लगाने से रोग ठीक होने लगता है। उड़द की दाल को भिगोकर, पीसकर, नमक, काली मिर्च, हींग, जीरा, लहसुन और अदरक को डालकर घी में तलकर, दही में मिलाकर खाने से बल-वीर्य और धातु को बढ़ावा मिलता है। इसकी दाल का सेवन करने से श्वास, हृदयरोग अैर निर्बलता दूर होती है तथा यह स्त्री के स्तन में अधिक दूध उत्पन्न करने वाला होती है।
मटर : पके सूखे मटर में विटामिन ए, बी मिलते हैं। ये मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं-देशी मटर और विलायती मटर। विदेशी या विलायती मटर हरापन लिए रहते हैं। कच्चे बीजों को सुखाने पर पड़ने वाली सिलवटों जैसी सिलवट इन बीजों पर भी होती है। देशी सफेद सूखा मटर सर्वश्रेष्ठ होता है। इनके हरे सूखे दानों की सब्जी भी बनती है। सफेद मटर के दानों को कुछ देर तक भिगोने के बाद आलू के साथ छोला, सूखा मटर आदि के व्यंजन बनाये जाते हैं और हरे मटर को भी भिगाने के बाद पुलाव, सब्जी आदि बनाये जाते हैं और खाने में दोनों तरह के सूखे मटर स्वादिष्ट होते हैं।
मसूर : मसूर में विटामिन ए, बी पाया जाता है। यह दो किस्मों में होते हैं काली और लाल। इन दोनों में एक ही गुण समान है। यह शीतल, मधुर, मलावरोधक होती है। यह कफ, गुल्म, वात, पित्त, रक्तपित्त और ज्वरनाशक है। वायु बढ़ाती है, कृमि उत्पन्न करती है, नेत्ररोग, यक्ष्मा और जिन्हें अर्श टपकते हैं, उनके लिए भी मसूर की दाल लाभदायक होती है और यह मूत्रकृच्छ, पथरी और हृदयरोग के लिए हितकारी होती है। मसूर को भिगोकर, पीसकर शरीर पर उबटन लगाने से शरीर सुन्दर और कांतिमय हो जाता है।
मांह काली : काली मांह में विटामिन ए थोड़ी मात्र में और बी अधिक मात्रा में होता है। यह अधिक पुष्टिकर, शीघ्र हजम होने वाली, बल-वीर्यवर्धक, पथ्य और शरीर को पोषण करने वाली होती है।
हरी मूंग : हरी मूंग में विटामिन ए, बी, सी पाया जाता है। छिलके सहित मूंग शीघ्र पचने वाली होती है। मल को बांधने वाली, कफ और पित्त को शांत करने वाली, ज्वर, नेत्ररोग और निर्बलता को दूर करने वाली होती है।
मोठ : मोठ को मोथी भी कहा जाता है इसमें विटामिन बी पाया जाता है। यह मधुर, मल को बांधने वाला, कफ, पित्त रक्तपित्त, वायुकारक, कृमिकारक, ज्वर, नेत्ररोग और यक्ष्मा को लाभ देने वाला होता है। इनका मठिया बनाया जाता है। मूंग अथवा मोठ को अंकुरित करके या इनको रात में भिगोकर, सुबह उबालकर नाश्ते में इनका उपयोग किया जाता है। मल के साथ खून गिरता हो तो इनको उबालकर प्याज के टुकड़ों के साथ मिलाकर खाने से तुरंत ठीक हो जाता है।
लोबिया : लोबिया में विटामिन ए, बी, सी पाया जाता है। स्वादिष्ट, देर से हजम होने वाली, बलकारक, वात बढ़ाने वाली, कब्जियत दूर करने वाली और स्त्री के स्तन में दूध उत्पन्न करने वाली होती है।


