
हिफाजत और हिरासत में क्या फर्क है! हिरासत में हिफाजत करना हिरासत में लेने वाली शक्ति का दायित्व होता है। व्यक्ति की हिरासती क्षति लोकतंत्र का कलंक होती है। यहां तक तो बात सीधी और सरल है। लेकिन इसे थोड़ा-बहुत हिला-डुलाकर देखना जरूरी है। सवाल यह है कि हिफाजत के नाम पर व्यक्ति कि गतिविधि की करीबी नजरदारी का इंतजाम करने की शासकीय नीयत हो सकती है क्या?
सामान्य रूप से मन में ऐसा सवाल उठना सही नहीं है। लेकिन जब परिस्थिति, राजनीतिक परिस्थिति सामान्य न हो तो ऐसा सवाल उठना ही स्वाभाविक है। खबर है कि शरद पवार की सुरक्षा के लिए बड़ा इंतजाम किया जा रहा है। शरद पवार की सुरक्षा के लिए सतर्क प्रशासन की सतर्कता और सावधानी निश्चित ही प्रशंसनीय है। ऐसा माना जा सकता है कि प्रशासन के पास कोई परम गोपनीय सतर्कता सूचना रही होगी। जाहिर है कि प्रशासन के सतर्कतामूलक चौकस सुरक्षा इंतजाम की नीयत पर संदेह या शंका करना उचित नहीं है। प्रशासन की नीयत पर संदेह इसलिए होता है कि मामला राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा है। शरद पवार न केवल राजनीतिक व्यक्ति हैं, बल्कि सरकार के विपक्ष में सक्रिय राजनीति से जुड़े बड़े और महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं।
विपक्ष मुक्त भारत के ‘संकल्प’ के साथ सत्ता में सक्रिय राजनीतिक पार्टी ने लोकतंत्र की राजनीतिक परिस्थिति को अ-सामान्य बना दिया है। न सिर्फ विपक्ष के प्रति बल्कि अ-सहमत नागरिकों के प्रति भी सरकार दुश्मनी का व्यवहार करने पर आमादा रहने लगी है। नागरिकों के एक हिस्से को दूसरे हिस्से से लड़ाने-भिड़ाने की चतुराई में लगी रही है। आंदोलनों से निपटने में तो इस चतुराई से सरकार ने कुछ अधिक ही काम लेना शुरू कर दिया है। नतीजा देश में ‘नागरिक युद्ध’ का माहौल बनने लगा है। सामान्य रूप से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है कि कोई जन-प्रतिनिधि ‘गोली मारो’ का नारा भी जुलूस में लगवा सकता है। सड़क पर निकले जुलूस में ही क्यों, भरी संसद में सत्ताधारी दल के सांसद विपक्ष के सांसदों के लिए बेरोक-टोक ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते दिखे हैं सामान्यत: जिस की कल्पना भी लोकतंत्र में नहीं की जा सकती है।
कई बार, अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े जन-प्रतिनिधि को सीधे संबोधित करते हुए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है कि किसी भी सभ्य आदमी का सिर शर्म से झुक जाए। अल्पसंख्यक समुदाय के साधारण नागरिकों के खिलाफ बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को लड़ाने-भिड़ाने के लिए उत्तेजना और उन्माद का स्थाई माहौल बनाकर वोटों के ध्रुवीकरण और ‘स्थाई बहुमत’ हासिल करने की ऐसी राजनीति शुरू की गई है कि लोकतांत्रिक राजनीति की रोशनी ही गुल होने की हालत में पहुंच गई है।
सियासत कि सियह-रात में कौन किस को आईना दिखाएगा! ‘स्थाई बहुमत’ के जुगाड़ के लिए जन-समूह में काल्पनिक वृतांत फैलाकर नागरिक समाज के ही एक हिस्से को ‘स्थाई दुश्मन’ के रूप में पेश किये जाने की आम शासकीय प्रवृत्ति विकसित कर ली गई है। यह सच है कि नागरिक समाज के विभिन्न जन-समूह में हित-भिन्नता का होना बहुत साधारण और स्वाभाविक बात है। शासक का तो मौलिक कर्तव्य होता है कि हित-भिन्नता के कारण पैदा होनेवाले अ-संतुलन को समाप्त नहीं भी तो, नियंत्रित कर पारस्परिक भरोसा और कम-से-कम कामचलाऊ संतुलन बहाल करे। लेकिन सत्ताधारी दल और उस के राजनीतिक कार्यकर्ताओं की दिलचस्पी समुदायों की हित-भिन्नताओं को पारस्परिक टकराव बढ़ाने में ही दिखती रही है।
हित-भिन्नताओं में टकराव की ही बात क्या! ऐसा लगता है कि विपक्ष के नेताओं, असहमत नागरिकों, विभिन्न क्षेत्र के व्यवसायियों आदि को ‘खामोश करने’ इलेक्ट्रॉल बांड से धन बटोरने, विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण को तहस-नहस करने, पेपरलीक के मामलों को दबाने, रोजी-रोजगार के अवसरों को समाप्त करने, रह-रहकर हर बात में हिंदू-मुसलमान, ‘हिंदुस्तान-पाकिस्तान’ के मुद्दे भड़काने को राजनीतिक आयुध बनाकर राजनीतिक कार्यकतार्ओं को हांकने के अलावा सत्ताधारी दल के नेताओं के पास कोई काम ही नहीं बचा है। एक तरफ यह सब निर्बाध चलता रहा तो दूसरी तरफ प्रभु अवतारी हो गए!
आम चुनाव के परिणाम प्रकट होने के ठीक पहले तक ‘वास्तविक’ चुनावी सर्वेक्षणों के काल्पनिक नतीजों से मुदित रहे। नेता प्रतिपक्ष सड़क से संसद तक अन्य मुद्दों के साथ-साथ ‘अग्निपथ योजना’ पर सवाल उठाते रहे हैं।
अब, जबकि नरेंद्र मोदी घटक दलों के समर्थन से ही सही तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गये हैं, देश उम्मीद करता है कि वे और उन की सरकार ‘अग्निपथ योजना’ पर फिर से विचार करने से नहीं हिचकेगी। हालांकि अपनी ?‘सांस्कृतिक जिद’ के चलते वे देश की उम्मीदों पर खरे उतरने की कोशिश करते हुए बहुत नहीं दिखे हैं। ऐसा ही मामला जातिवार जनगणना और आर्थिक सर्वेक्षण का है। कई कारणों से जातिवार जनगणना और आर्थिक सर्वेक्षण सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने की योजना बनाने और लोकतांत्रिक भागीदारी की सफलता की दृष्टि से भी अति-महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला है। इस मुद्दे को भी ‘न्याय योद्धा’ सड़क से संसद तक बहुत ही शिद्दत से लगातार उठाते रहे हैं। लेकिन सरकार लगातार इस मुद्दे पर कन्नी काटती रही है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को राहुल गांधी की आवाज में दम दिखता है।
देश के लोकतंत्र-पसंद लोगों के साथ-साथ इन समुदायों से जुड़े लोगों को राहुल गांधी की आवाज के प्रति आकर्षण और भरोसा महसूस होने लगा है। राहुल गांधी की आवाज में बदलती-बनती ‘नई कांग्रेस’ की सूचना को देश के लोगों ने महत्व दिया। ठोस नतीजा इंडिया अलायंस की चुनावी सफलता में पढ़ी जा सकती है। अल्पसंख्यक समुदाय के कई बड़े नेताओं और समुदाय के लोगों के लिए विश्वसनीय और प्रभावशाली नेताओं के होते हुए भी अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों का भरोसा ‘नई कांग्रेस’ में लौटने लगा। ध्यान रहे मल्लिकार्जुन खड़गे इस बदलती-बनती नई कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और इस के अर्थ बहुआयामी है।
असल में अब भारत की लोकतांत्रिक राजनीति को सिर्फ राजनीतिक नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। भारत के लोकतंत्र में असंगत और विचित्र स्थिति बन गई है। ऐसा लगता है कि नेताओं के राजनीतिक हित और आम जनता के नागरिक हित को लगभग एक दूसरे के विरुद्ध ‘युद्ध के मैदान’ में खड़ा कर दिया गया है। विभिन्न तरह के राजनीतिक चक्रव्यूहों और लोकतांत्रिक व्यूहों में फंसे नागरिक समाज को सावधानी से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा करना ही होगा। जी, भरोसा क्षरण के इस युग में भरोसा को बचाने की अधिकतम कोशिश भी नागरिक समाज का प्रमुख दायित्व है। नागरिक समाज के इस प्रमुख दायित्व के महत्व को राजनीतिक कार्यकर्ता समझें या न समझें, सामाजिक कार्यकर्ताओं को जरूर समझना होगा।


