Wednesday, May 25, 2022
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अंग्रेजों ने भामौरी को बना दिया था जलियांवाला बाग

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  • स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास समेटे है शहीदों का गांव भामौरी
  • भामौरी आए थे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु

जनवाणी संवाददाता |

सरधना: वैसे तो क्रांतिधरा अपनी पहचान का मोहताज नहीं है, लेकिन इसी जिले एक गांव को शहीदों का गांव भामौरी जलियांवाला बाग कांड के नाम से भी जाना जाता है। राजपूत बाहुल्य इस गांव में अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों पर इतने जुल्म ढाए की मानवता भी रो पड़ी। सन् 1942 में जब देशभर में स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल बजा हुआ था।

तभी इस गांव के कई क्रांतिकारी आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। तभी से इस गांव का नाम शहीद ग्राम भामौरी पड़ गया था। आज भी भामौरी की तंग गलियां क्रांतिकारियों की शहादत का इतिहास समेटे हुए है। शहीदों की याद में इस गांव में शहीद स्मारक भी बना हुआ है। जेल से छूटने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु भी इस गांव में शहीदों को नमन करने आ चुके हैं।

सरधना से करीब सात किमी की दूरी पर स्थित भामौरी राजपूत बाहुल्य गांव है। आठ अगस्त 1942 को जब महात्मा गांधी ने आजादी के लिए करो या मरो का नारा दिया था। पूरे देश में इस नारे पर अमल शुरू हो गया था। आंदोलन में भामौरी के लोगों की भी अहम् भूमिका रही भी। यहां के वीर क्रांतिकारी अपने घर-परिवार को छोड़कर देश को आजाद कराने में लगे हुए थे।

बात 15 अगस्त 1942 की है। जब भामौरी में मोटो की चौपाल पर क्रांतिकारियोें की मीटिंग चल रही थी। पूरी चौपाल क्रांतिकारियों से भरी हुई थी। गांव के ही रामस्वरूप शर्मा अंगे्रजो के जुल्मों की दास्तां बयां कर रहे थे। जिसकी भनक अंगे्रजी हुकमत को लग गई थी। सूचना मिलते ही अंगे्रजी फौज मौके पर पहुंच गई थी। फौज ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। उन्होंने क्रांतिकारियों को मीटिंग खत्म करने के लिए कहा, लेकिन आजादी के दीवाने कहां मानने वाले थे।

जान अथेली पर लिए क्रांतिकारियों ने छाती ठोककर फौज का विरोध कर दिया था। जिस पर फौज ने उन पर हमला बोल दिया था। हमले में भारी संख्या में क्रांतिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। मीटिंग में मौजूद देवी सिंह ने भाग रहे क्रांतिकारियों को उनका मुकाबला करने के लिए ललकारा तो वह भी अंगे्रजों पर टूट पड़े। आजादी के जुनून के साथ क्रांतिकारियों ने अंगेजों पर जवाबी हमला बोला तो फौज बौखला गई।

फौज ने उन पर सीधी गोलीबारी शुरू कर दी। एक गोली भाषण दे रहे रामस्वरूप से सीने में जा लगी और जमीन गिर गए। फायरिंग में प्रहलाद सिंह, लटूर सिंह, फतह सिंह और बोबल सिंह आजादी की राह में शहीद हो गए थे। संयोग की बात उसी समय बारिश हो गई थी। क्रांतिकारियों का लहू बारिश के पानी के साथ बहने लगा। मानो गांव में खून की नदी बह गई हो। शहीदों का खून गांव स्थित सरोवर में बह गया।

सरोवर का पानी पूरी तरह लाल हो गया। उस मुठभेड़ में पांच क्रांतिकारी शहीद हुए थे। इसके बाद भी अंगे्रजों की क्रूरता नहीं थमी। इस घटना से अंगे्रजी हुकूमत ने भामौरी को बाघी घोषित करते हुए तोप से उड़ाने का फरमान जारी कर दिया था। गांव को खत्म करने के लिए 21 अगस्त को मेरठ छावनी से तोप भेजी गई। ट्रक पर लादकर लाई जारी तोप का चालक पड़ोसी गांव महादेव का ही लियाकत अली था।

वह भी अंगे्रजों के नापाक इरादों को भांपते हुए क्रांतिकारियों के साथ हो गया। उसने भामौरी से पहले झिटकरी गांव के निकट ट्रक को दलदल में फंसा दिया। लियाकत अली की इस चालाकी के कारण भामौरी गांव खत्म होने से बच गया। इसके बाद भी करीब चार माह तक अंग्रेजी हुकूमत का आंतक ग्रामीणों को झेलना पड़ा। उस दौरान गवर्नर ने गांव पर 19 हजार रुपये का सामूहिक तंड लगाया था।

जेल से छूटने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु भी इस गांव में पहुंचे थे। शहीदों के गांव भामौरी की तंग गलियां आज भी क्रांतिकारियों के शहादत का इतिहास समेटे हुए है। शहीदों की याद में गांव में शहीद स्मारक बना दिया गया। इसके अलावा जिस सरोवर में क्रांतिकारियों का लहू बहा उसे शहीद सरोवर घोषित कर दिया गया।

तभी से इस गांव में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को बलिदान दिवस भी बनाया जाता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि नेता शहीदों को याद करने तो पहुंचते हैं, लेकिन इस गांव के विकास की सुध कोई नहीं लेता। विकास के नाम पर गांव को मिलता है तो केवल झूठा आश्वासन।

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