Sunday, July 25, 2021
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चौधरी परिवार की विरासत सहेजने की जयंत के सामने चुनौती

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बतौर रालोद मुखिया संगठन की मजबूती से लेकर चुनाव तक अग्नि परीक्षा

किसान, गरीब, मजदूर की सियासत को संभालने की बड़ी गंभीर चुनौती


अमित पंवार |

बागपत: रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह के बाद अब चौधरी परिवार की विरासत सहेजने की जिम्मेदारी जयंत चौधरी के कंधों पर आ गई है। जयंत में जहां उनके कार्यकर्ता व समर्थक चौधरी साहब का अक्स देखते हैं वहीं जयंत के सामने चुनौतियों का पहाड़ भी है।

दादा व पिता की विरासत को सहेजना भी है और पार्टी को एक मजबूत मुकाम पर पहुंचाना भी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जयंत के सामने 2022 की सबसे बड़ी परीक्षा आ रही है। जयंत को उससे पहले जहां संगठन को मजबूत करने की ओर कदम बढ़ाने है वहीं पार्टी को एक बार फिर पुराने कलेवर में खड़ा करने की अग्नि परीक्षा से भी गुजरना है।

रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद से ही जयंत चौधरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की पूरी उम्मीद लगाई गई थी। वर्चुअल रूप से हुई मीटिंग में उनकी ताजपोशी भी हो गई। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पद ताजपोशी हो गई। यानी अब चौधरी परिवार की विरासत जयंत चौधरी के कंधों पर आ गई है। किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह ने देश की राजनीति में जो एक पहचान बनाई थी और किसानों के रहनुमा बने थे।

उन्होंने अपनी विरासत 1986 में अपने बेटे चौधरी अजित सिंह को सौंप दी थी। चौधरी अजित सिंह को पहले राज्यसभा से भेजा गया। उसके बाद बागपत लोकसभा सीट उन्हें सौंपी गई। बागपत लोकसभा सीट से पहले ही चुनाव से चौधरी चरण सिंह के रूप में चौधरी अजित सिंह जनता का भारी बहुमत मिला और यह लगातार तीन पर जारी रहा।

वर्ष 1998 में जीत का सिलसिला रूक गया था और भाजपा के सोमपाल शास्त्री से हार गए थे। उसके बाद फिर रिकार्ड तोड़ वोटों से विजयी हुए और 2009 तक यह सिलसिला चला। उसके बाद 2014, 2019 में भी हार का मुंह देखना पड़ा। हालांकि इस बीच उन्होंने भी अपने बेटे जयंत चौधरी को राजनीति में एंट्री करा दी थी और एक नेता के रूप में जनता के बीच स्थापित करने में कामयाब हुए। वर्ष 2009 में मथुरा लोकसभा सीट से जयंत को संसद पहुंचाया। उसके बाद 2014 व 2019 में जयंत भी हार गए।

इतना जरूर है कि राजनीति का ककहरा जयंत अपने पिता के रहते ही सीख गए थे और अपनी एक अलग ही छवि बना ली है। उनके समर्थक भी जयंत में चौधरी साहब का अक्स देखते हैं। जयंत भी भले ही चुनाव हार गए, लेकिन किसान, गरीब, मजदूर की लड़ाई लड़ने से कभी पीछे नहीं रहे। किसान आंदोलन में सहभागिता में प्राथमिकता हो या फिर हाथरस में बेटी को न्याय दिलाने के लिए लाठी खाने का मामला हो।

जयंत चौधरी आगे ही मिले हैं। इसके अलावा किसान की जब-जब बात आई तो वह आगे ही मिले। अब राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जयंत चौधरी को नई कमान मिली है। यानी परिवार की विरासत उनके कंधों पर आ गई है। किसान, गरीब, मजदूर की सियासत जहां अब उन्हें सहेजनी है वहीं विरासत को भी सहेजना है और पार्टी को फिर उसी पुराने कलेवर में लाने की अग्नि परीक्षा से भी गुजरना है।

जयंत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उन्हें 2022 के विधानसभा चुनाव की सबसे बड़ी परीक्षा से गुजरना है। वर्तमान में रालोद के पास एक भी विधायक नहीं है और न ही सांसद है। हालांकि हाल में संपन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जरूर रालोद ने एक बार फिर अपना वर्चस्व दिखाया है और वेस्ट यूपी में जिला पंचायत सदस्यों की सीटों पर दबदबा कायम रखा।

जिला पंचायत के चुनाव से इतना जरूर साफ हो गया है कि 2022 के चुनाव में रालोद मजबूती के साथ जनता के बीच होगी। इस मजबूती को जयंत को सहेजना है। जनता के बीच फिर वही पुरानी पार्टी खड़ी करके दिखानी है। किसान, गरीब व मजदूर की आवाज को बुलंद रखना है। संगठन को भी मजबूत करने की परीक्षा से गुजरना है। चुनाव से पहले संगठन मजबूती की ओर कदम बढ़ाना होगा। अब देखना यह है कि जयंत राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुनौतियों से पार पाते हैं या नहीं?

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