
वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार मधुसूदन आनन्द का मानना है कि कहानियों से क्रांति नहीं होती। कहानियां वह जमीन तैयार करती है, जिसपर चलकर आप क्रांति तक पहुँच सकते हैं। वह यह भी मानते हैं कि कहानी में सहजता, सादगी और नैसर्गिकता जरूरी तत्व हैं। 1979 में उनकी पहली कहानी सारिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वह निरंतर लिख रहे हैं। बेशक वह कम लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानियों के मुरीद आज भी हैं। उनके चार कहानी-संग्रह-करौंदे का पेड़, साधारण जीवन, बचपन और थोड़ा-सा उजाला प्रकाशित और चर्चित हो चुके हैं। उनका पांचवां कहानी संग्रह ‘कब्रिस्तान में कोयल’ (संभावना प्रकाशन) हाल ही में आया है। संग्रह में 15 कहानियां हैं। इनमें अलग-अलग समय का यथार्थ है और उस यथार्थ का बदलते जाना भी है।