Saturday, May 9, 2026
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जल रही धरती के लिए हम सब दोषी

 

SAMVAD


dr asheesh varishtआम चुनाव की सातवें आखिरी चरण वोटिंग से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से दुखद खबर सामने आई। यहां हीट स्ट्रोक से चुनाव ड्यूटी में लगे 12 सहित 20 लोगों की मौत हो गई। वहीं 30 से अधिक लोगों का इलाज मंडलीय अस्पताल समेत अन्य चिकित्सालयों में चल रहा है।
बीते दिनों बिहार के स्कूलों में 300 छात्र अत्यधिक गर्मी से बेहोश हो गए? शिक्षक और पूर्व सांसद तक अचेत हो गए। अंतत: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सभी स्कूल बंद करने का आदेश देना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी की जनसभा को कवर करता हुआ एक टीवी पत्रकार भी बेहोश हो गया। यह दीगर है कि प्रधानमंत्री ने तुरंत अपनी टीम के लोगों को उसकी मदद करने को कहा।इसमें कोई दो राय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन और प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ और अत्यधिक दोहन के जानलेवा दुष्परिणाम अब साफ तौर पर दिखने लगे हैं। पिछले लगभग एक महीने से देश के एक दर्जन से ज्यादा प्रदेशों चिलचिलाती गर्मी से जनमानस बेहाल है। दिल्ली ही नहीं, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई जैसे महानगरों में ‘ताप प्रभाव और सूचकांक’ पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहा है। गर्मी का ऐसा प्रचंड प्रभाव है कि सडक़ों पर दौड़ रहे वाहनों के टायर पिघल रहे हैं। नतीजतन दुर्घटनाएं हो रही हैं। इस उबलती गर्मी के मानवीय दुष्प्रभाव भी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय शहरों का स्वरूप पिछले कुछ दशकों में काफी बदला है। यहां की हरियाली में दिनों-दिन कमी आ रही है। धड़ल्ले से पेड़ काटे जा रहे हैं। इमारतों की संख्या बढ़ रही है। घरों में एसी का इस्तेमाल बढ़ रहा है। पक्की सड़कों का विस्तार तेजी से हो रहा है। और यही वजह है कि तापमान भी उसी रफ़्तार में बढ़ रहा है। ऐसे में शहर को अब ‘अर्बन हीट आइलैंड’ या फिर ‘हीट आइलैंड’ कहा जाने लगा है। अगर हवा की गति कम है तो शहरों को अर्बन हीट आइलैंड बनते आसानी से देखा जा सकता है। शहरों में जितनी ज्यादा जनसंख्या होगी, हीट आइलैंड बनने की गुंजाइश उतनी ही ज़्यादा होगी। जब हम शहरों की सीमा पार करते हैं, हमें राहत महसूस होती है। शहरों में बढ़ते निर्माण कार्यों और उसके बदलते स्वरूप के चलते हवा की गति में कमी आई है।

शहरों में बढ़ते तापमान को लोग ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ कर देखते हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ़ वह ही ज़िम्मेदार नहीं है। अगर हम शहरों का अध्ययन करें तो हमें पता चलता है कि जमीन का बदलता उपयोग भी इसकी बड़ी वजह है। तारकोल की सड़क और कंक्रीट की इमारत ऊष्मा को अपने अंदर सोखती है और उसे दोपहर और रात में छोड़ती है। नए शहरों के तापमान तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले से बसे महानगरों की तुलना में ये ज़्यादा तेज़ी से गर्म हो रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन पर बनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी ने कहा है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। संस्थान की ओर से वर्ष 2018 में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर के देशों को इस पर तुरंत लगाम लगाने की ज़रूरत है। अगर ऐसा नहीं होता है तो 2030 तक धरती के कई हिस्से रहने लायक नहीं होंगे। रिपोर्ट कहती है कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस भी बढ़ता है तो इससे वंचित और कमजोर आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। उन्हें भोजन की कमी, आमदनी, महंगाई, आजीविका के साधन, स्वास्थ्य और जनसंख्या विस्थापन की समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं।

भारत उन देशों की कतार में खड़ा है जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। देश की आबादी बड़ी है और यहां आर्थिक रूप से असमानता ज्यादा है। रिपोर्ट जिस अस्थिरता की बात कर रही है, अगर वो नहीं रोकी गयी तो भारत पर इसका असर विनाशकारी हो सकता है- न केवल सामाजिक रूप से बल्कि राजनीतिक रूप से भी। अगर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का जल स्तर बढ़ता है तो देश के कई हिस्से बर्बाद हो जाएंगे। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले और आजीविका के लिए समुद्र पर निर्भर रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अभी देर नहीं हुई है। अगर तापमान को बढ़ने से रोका गया तो संभावित क्षति को कम किया जा सकता है।

रिपोर्ट में एक उपाय सुझाया गया है कि जिन देशों में कार्बन का उत्सर्जन ज़्यादा है, वो इसे कम करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करें। रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अगर लक्ष्यों को हासिल नहीं किया गया तो 2050 तक दुनिया को कार्बन का उत्सर्जन रोकना होगा। भारत ने भी यह तय नहीं किया है कि वह कार्बन उत्सर्जन को रोकने से जुड़े लक्ष्यों को कब तक हासिल करेगा। जबकि चीन ने यह लक्ष्य 2030 तय किया है। भारत अभी 2050 की रणनीति विकसित कर रहा है। देश अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में विकास करने की सोच रहा है लेकिन यह आसान नहीं होगा। बड़े स्तर पर अक्षय ऊर्जा को संग्रहित करने के लिए उपायों की जरूरत होगी, जो बहुत महंगी हो सकती है। उदाहरण के लिए बड़े पैमाने पर बैटरी की जरूरत होगी, लेकिन इनकी कीमतों में तेजी से कमी नहीं आने के कारण लक्ष्य आसान नहीं दिख रहे हैं।

भारत पर पर्यावरण के लिए घातक गैसों को रोकने का दबाव है। यहां पानी की समस्या भी बढ़ रही है, यह उसके लिए चुनौती है। देश सूखे, बाढ़, चक्रवात और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। देश के पास एक बेहतर आपदा प्रबंधन की टीम है, लेकिन इसे और मजबूत करने की ज़रूरत दिख रही है। भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी अपना लक्ष्य तय किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये लक्ष्य हासिल कैसे किए जाएंगे और इस दिशा में अगला कदम क्या होगा।

भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है परिवहन तंत्र की। वर्तमान में देश की सड़कों पर बड़ी संख्या में साइकिल और रिक्शे दौड़ रहे हैं। लेकिन जैसे ही लोगों की आमदनी बढ़ती है, वो तुरंत मोटर साइकिल और स्कूटर खरीद लेते हैं। कारों को लेकर क्रेज़ भी भारतीयों में खूब है। वित्तीय कंपनियां सस्ते कर्ज पर कार खरीद को बढ़ावा दे रही है। इस समस्या के समाधान के लिए भारत को इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना होगा। साथ ही इसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को दुरुस्त करना होगा। रेल और दूसरे उपायों से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने की ज़रूरत है, लेकिन यह सब कुछ आसान नहीं दिख रहा है। क्योंकि इसे बेहतर करने के लिए तकनीक और पैसे की कितनी जरूरत होगी, यह स्पष्ट नहीं है। सिर्फ लक्ष्य तय किए गए हैं, पर ये हासिल कैसे होंगे, इसकी योजना तैयार नहीं है। सिर्फ भारत ही नहीं दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी इन्हीं योजनाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

हमें बदलते मौसम के अनुसार अपना खाना-पीना और कपड़े पहनने का तरीका बदलने की ज़रूरत होती है। ऐसे हादसे इसलिए भी होते हैं क्योंकि हम अपनी ज़िंदगी में ज़रूरी बदलाव नहीं करते। राजस्थान में अमूमन तापमान 45 डिग्री सेल्सियस होता है लेकिन लेकिन वहां लोग सिर ढके बिना बाहर नहीं निकलते। वहां पीने का पानी हर जगह मौजूद होता है। वो पानी पीने के बाद ही घर से बाहर निकलते थे। वो लोगों को जबरन पानी पिलाते हैं। उन्होंने गर्मियों के मुताबिक अपनी जीवनशैली में ज़रूरी बदलाव भी किए हैं। बाकियों को उनसे सीखना चाहिए। अगर उत्तर भारत में आप धूल भरी आंधी के वक़्त घर से बाहर निकलते हैं तो निश्चित तौर पर ख़तरे में होंगे। इसलिए आपको सारी चीज़ें सोचने-समझने के बाद ही घर से बाहर निकलना चाहिए।


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