Wednesday, May 25, 2022
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Homeसंवादआखिर धर्म क्या है?

आखिर धर्म क्या है?

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धर्म क्या है? यह सवाल आज पैदा नहीं हुआ है। आदिकाल में जब मानव ने प्रकृति प्रदत्त उपहारों की उपासना प्रारंभ की होगी, तभी उसके दिमाग में यह सवाल कुलबुलाने लगा होगा। यह बात अलग है कि इस प्रश्न का कोई सर्वमान्य संतोषजनक उत्तर आज तक नहीं मिला है। अधिकतर लोग इस पर बहस करते हुये प्रतिदिन मिल जायेंगे कि यथार्थ में धर्म क्या होता है?

इसका उल्लेख भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर मिल जाता है, परन्तु साहित्य अवलोकन करने का समय मानव के पास नहीं है। वर्तमान समय में संपूर्ण राष्ट्र मजहब की खाई में गिरता हुआ दिखाई देता है। कहीं जातिवाद का जहर घोला जा रहा है, कहीं मजहब की आग से लोग झुलस रहे हैं। कहीं मंदिरों को अपवित्र किया जा रहा है, कहीं मस्जिदों पर झंडा लहराए जाने के समाचार सुनने में आते हैं।

ऐसी स्थिति में हर इंसान के दिल में एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि क्या धर्म की परिभाषा यही है? आज स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि धर्म परिवर्तन, लड़ाई-झगड़े, दंगा-फसाद, आदि आये दिन होते ही रहते हैं।
इन सब कारणों के साथ-साथ स्थिति में इतना बदलाव आता जा रहा है कि लोग अन्य धर्मों को नफरत की दृष्टि से देखते हुये दंगा फसाद करने में भी नहीं चूकते जबकि धर्म व्यक्ति को सामाजिक और नैतिक रूप से अनुशासित करके मानवता का मार्ग दिखाता है।

इन सब कारणों को देखने से ऐसा अनुभव होता है कि हमारे देश के मनीषी, राष्ट्रचिन्तक और विद्वान मुंह पर अंगुली रखे हुये इंसान के इस ‘द्वंद्वयुद्ध’ को मूक दर्शक बनकर देखते रहते हैं।

उन महान विभूतियों के इस कृत्य को देख कर एक ही विचार उत्पन्न होने लगता है कि इन अनुभवी लोगों का इस संसार से मोह खत्म हो गया है। अपने आप को इस संसार से विलग महसूस करने लगे हैं जो कदापि उचित प्रतीत नहीं होता।
प्रश्न यह उपस्थित होता है कि हर संप्रदाय या मजहब में सत्य को ही धर्म के रूप में परिभाषित किया है फिर वर्तमान स्थिति इसके विपरीत क्यों? जब हर इंसान इस बात को जानता है, तो इसके पालन करने में व्यवधान क्यों? क्या समय दोषी है या इंसान की बदलती मानसिकता? क्या मजहब के रखवाले या देश को तोड़ने वाले क्षणिक लोग…?

साहित्य के मनन से ज्ञात होता है कि ‘सत्य ही धर्म है’, इसलिये हमारे अग्रज जो उम्र के चौथेपन से मायूस होकर अपने आपको असहाय और लाचार मानकर समय काट रहे हैं, उन्हें इस ओर ध्यान देकर अपने नवांकुर अंशजों को राह दिखाते हुये ह्णसत्य से बढकर कोई कोई धर्म नहींह्य का पाठ पढ़ाना चाहिए जिससे भारतीय संस्कृति को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

मुन्ना ‘मोहन’


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