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सदा के लिए पृथ्वी पर कौन रहा है?

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सदा के लिए पृथ्वी पर कौन रहा है?


चंद्र प्रभा सूद

यदि मनुष्य काम-वासनाओं पर लगाम लगा सके, संयम कर सके तो उनको अपने ऊपर हावी नहीं होने दे सकता है। इस तरह करने से उसका जीवन सुनियोजित ढंग से चल सकता है।

इन पर नियंत्रण करने के लिए शास्त्र और मनीषी हम मनुष्यों को जगाने का कार्य करते रहते हैं। इन भोगों पर विजय प्राप्त करके ही मनुष्य अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार सकता है।

सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य इस संसार में आने के उपरान्त सोचता है कि वह सदा के लिए यहां रहेगा। उसकी सत्ता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता।

यदि कोई ऐसा दुस्साहस करने की चेष्टा करता है तो उसे बरबाद करने में वह अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखना चाहता।

वह अपने अन्तस में उठने वाली सभी कामनाओं को पूर्ण करके, उनका सुख भोगना चाहता है। उसके लिए किसी भी हद से गुजर जाता है।

अपने ऊपर यदि वह नियंत्रण रख सके तो बहुत से अपराध करने से बच सकता है।
राजा भ्रतृहरि इन विषय भोगों के प्रति असीम इच्छाओं के न समाप्त कर पाने को लेकर समझाते हुए कहते हैं-

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता।
तपो न तप्तं वयमेव तप्ता:घ्
कालो न यातो वयमेव याता।
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा:

अर्थात हमने भोग नहीं भोग रहे बल्कि भोग हमें भोग रहे हैं। हम तपस्या से नहीं तप रहे परन्तु दुखों के ताप से संतप्त हो गए हैं। समय व्यतीत नहीं हो रहा पर हम स्वयं ही जीवन की बाजी हारते जा रहे हैं।

हमारी तृष्णाएं किंचित भी बूढ़ी नहीं हुई हैं अपितु हम ही तृष्णा के वशीभूत होकर वृद्ध होते जा रहे हैं।

इस विषय में एक कथा आती है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छ: पुत्रों में से सबसे बड़े याति राजकाज आदि से विरक्त रहते थे। इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्याभिषेक करवा दिया। ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ।

ययाति की दो पत्नियां थीं। शर्मिष्ठा के तीन और देवयानी के दो पुत्र थे। अपनी आयु भोगने के उपरान्त भी ययाति का मन विषय भोगों में ही लगा रहता था।

वे वृद्ध नहीं होना चाहते थे। इसके उपाय स्वरूप उन्होंने अपनी वृद्धावस्था अपने पुत्रों को देकर उनका यौवन प्राप्त करना चाहा।

पुरू को छोडकर और कोई अन्य पुत्र इस पर सहमत नहीं हुआ। पुत्रों में पुरू सबसे छोटा था। पिता ने उसी को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और स्वयं एक सहस्र वर्ष तक युवा रहकर शारीरिक सुख भोगते रहे।

तदनन्तर पुरू को बुलाकर ययाति ने कहा-इतने दिनों तक सुख भोगने पर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई। तुम अपना यौवन वापिस ले लो, मैं अब वानप्रस्थी बनकर तपस्या करूंगा।

महाभारत के आदिपर्व में बताया गया है कि घोर तपस्या करने के पश्चात ययाति स्वर्ग पहुंच तो गए परन्तु स्वर्ग के राजा इंद्र के श्राप के कारण स्वर्ग से भ्रष्ट हो गए। अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटते समय इन्हें अपने दौहित्र अष्ट, शिवि आदि मिले।

इनकी कठिनाई को समझते हुए उन्होंने अपने अपने पुण्य के बल से इन्हें फिर स्वर्ग में वापिस भेज दिया। अन्तत: इन सबकी सहायता से राजा ययाति को अपने जीवन से मुक्ति मिली।

इस कथा से यही सिद्ध होता है कि विषय-भोगों में मदान्ध हुए ययाति जैसे स्वार्थी राजा को यह भी होश नहीं रहा कि जिस पुत्र की युवावस्था को वह ले रहा है, उसने तो अभी दुनिया भी नहीं देखी है। विषयभोगों और स्वार्थ में अंधा होकर मनुष्य कोई भी अनर्थ कर सकता है।

ऐष्णाएं मनुष्य को सदा ही लुभावने आकर्षण देकर नाच नचाती रहती हैं। मनुष्य भी इनके जाल में फंसकर जाने-अनजाने अपना जीवन नरक बना लेता है। यदि मनुष्य इन काम-वासनाओं पर लगाम लगा सके, संयम कर सके तो उनको अपने ऊपर हावी नहीं होने दे सकता है।

इस तरह करने से उसका जीवन सुनियोजित ढंग से चल सकता है। इन पर नियंत्रण करने के लिए शास्त्र और मनीषी हम मनुष्यों को जगाने का कार्य करते रहते हैं। इन भोगों पर विजय प्राप्त करके ही मनुष्य अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार सकता है।

भाषा संस्कृति की संवाहक होती है

हृदयनारायण दीक्षित

भाषा संस्कृति की संवाहक होती है। हिंदी में भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति है। लेकिन अंग्रेजी की ठसक है। महात्मा गांधी इस बात पर दुखी थे।

भाषा के प्रश्न पर गांधी ने लिखा था, ‘पृथ्वी पर हिन्दुस्तान ही एक ऐसा देश है जहां मां बाप अपने बच्चों को अपनी भातृभाषा के बजाय अंग्रेजी पढ़ाना लिखाना पसंद करेंगे।’ (सम्पूर्ण गांधी वाड्.मय 15/249) देश की मातृभाषा राजभाषा हिंदी है। लेकिन अंग्रेजी के सामने कमजोर मानी जाती है। अंग्रेजी को विश्वभाषा बताया जाता है।

लेकिन जापान, रूस और चीन आदि अनेक देशों में अंग्रेजी की कोई हैसियत नहीं है। भारत की संविधानसभा (14 सितम्बर 1949) ने हिंदी को राजभाषा बनाया, 15 वर्ष तक अंग्रेजी में राजकाज चलाने का परन्तु जोड़ा।

अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने समापन भाषण में कहा ,‘हमने संविधान में एक भाषा रखी है। ….अंग्रेजी के स्थान पर एक भारतीय भाषा (हिंदी) को अपनाया है।

हमारी परम्पराएं एक हैं, संस्कृति एक है।’ इसके एक दिन पूर्व पं.नेहरू ने कहा, ‘हमने अंग्रेजी इस कारण स्वीकार की, कि वह विजेता की भाषा थी, …..अंग्रेजी कितनी ही अच्छी हो किंतु इसे हम सहन नहीं कर सकते।’

इसके भी एक दिन पूर्व (12.9.1949) एनजी आयंगर ने सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखते हुए, 15 बरस तक अंग्रेजी को जारी रखने का कारण बताया, ‘हम अंग्रेजी को एकदम नहीं छोड़ सकते।

….यद्यपि सरकारी प्रयोजनों के लिए हमने हिंदी को अभिज्ञात किया फिर भी हमें यह मानना चाहिए कि आज वह सम्मुनत भाषा नहीं है।’ पं. नेहरू अंग्रेजी सहन करने को तैयार नहीं थे, राजभाषा अनुच्छेद के प्रस्तावक हिंदी को कमतर बता रहे थे। संविधान सभा में 3 दिन तक बहस हुई।

संविधान के अनु. 343 (1) में हिंदी राजभाषा बनी, किंतु अनु. 343 (2) में अंग्रेजी जारी रखने का प्राविधान हुआ। हिंदी के लिए आयोग/समिति बनाने की व्यवस्था हुई। हिंदी के विकास की जिम्मेदारी (अनु0 351) केंद्र पर डाली गई।

बेशक अंग्रेजी विजेता की भाषा थी, लेकिन 1947 के बाद हिंदी भी विजेता की भाषा थी। अंग्रेज जीते, अंग्रेजी लाए, भारतवासी स्वाधीनता संग्राम जीते, हिंदी क्यों नहीं लाए? स्वाधीनता संग्राम की भाषा मातृभाषा हिंदी थी।

लेकिन कांग्रेस अपने जन्मकाल से ही अंग्रेजी को वरीयता देती रही, गांधी जी ने कहा, ‘अंग्रेजी ने हिंदुस्तानी राजनीतिज्ञों के मन में घर कर लिया।

मैं इसे अपने देश और मनुष्यत्व के प्रति अपराध मानता हूं।’ (सम्पूर्ण गांधी वाड्.मय 29/312) गांधी जी ने बीबीसी (15 अगस्त 1947) पर कहा, ‘दुनिया वालो को बता दो, गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।’ भारतीय संस्कृति, सृजन और सम्वाद की भाषा हिंदी है।

बावजूद इसके अंग्रेजी का मोह बढ़ा’ अंग्रेजी स्कूल बढ़े, अंग्रेजी प्रभुवर्ग की भाषा बनी। भूमण्डलीकरण ने नया नवधनाढ्य समाज बनाया।

अंग्रेजी महज ज्ञापन की भाषा थी, वही विज्ञापन की भाषा में घुसी। हिंदी का अंग्रेजीकरण हुआ। टीवी सिनेमा ने नई ‘शंकर भाषा’ को गले लगाया।

हिंदी सौंदर्य और कला व्यक्त करने का माध्यम थी/है, अंग्रेजीकृत हिंदी/हिंग्लिश/ मिश्रित बोली ने उदात्त भारतीय सौन्दर्य बोध को भी ‘सेक्सी’ बनाया।

अंग्रेजी मिश्रित हिंदी शैम्पू और दादखाज की दवा बेचने का माध्यम हो सकती है, लेकिन सृजन और सम्वाद की भाषा नहीं हो सकती। बाजार नई भाषा गढ़ रहा है। मातृभाषा संकट में है। स्वभाषा के बिना संस्कृति निष्प्राण होती है, स्वसंस्कृति के अभाव में राष्ट्र अपना अंतस, प्राण, चेतन और ओज तेज खो देते हैं।

अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय भाषा बताने वाले भारतीय दरअसल आत्महीन ग्रंथि के रोगी हैं। अमेरिकी भाषा विज्ञानी ब्लूम फील्ड ने अंग्रेजी की बाबत (लैंगुएज, पृष्ठ 52) लिखा ‘यार्कशायर (इंग्लैंड) के व्यक्ति की अंग्रेजी को अमेरिकी नहीं समझ पाते।’ दूसरे भाषाविद् डॉ. रामबिलास शर्मा ने ‘भाषा और समाज’ (पृष्ठ 401) में लिखा ‘अंग्रेजी के भारतीय प्रोफेसरों को हालीवुड की फिल्म दिखाइए, पूछिए, वे कितना समझे।

अंग्रेजी बोलने के भिन्न भिन्न ढंग है। इसके विपरीत हिंदी की सुबोधता को हर किसी ने माना है। हिंदी अपनी बोलियों के क्षेत्र में तो समझी ही जाती है गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में भी उसे समझने वाले करोड़ों है। यूरोप में जर्मन और फ्रांसीसी अंग्रेजी से ज्यादा सहायक है।

जर्मनी और अस्ट्रिया की भाषा जर्मन है। स्विट्जरलैण्ड के 70 फीसदी लोगों की मातृभाषा भी जर्मन है। चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, युगोस्लाविया और पोलैण्ड के लोग जर्मन समझते हैं।

हमारी धारणा है कि संसार की आबादी में अंग्रेजी समझने वाले 25 करोड़ होंगे तो हिंदी वाले कम से कम 35 करोड़ (किताब 1960 की है)’। अंग्रेजी जानकार कम हैं तो भी वह विश्वभाषा है। हिंदी वाले ज्यादा हैं बावजूद इसके वह वास्तविक राष्ट्रभाषा भी नहीं है।

भाषा संस्कृति की संवाहक होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां पूंजी के साथ भाषा लाती है। भाषा के साथ संस्कृति आती है। संवाद की शैली बदलती है। जनसम्पर्क उद्योग बनता है।

विश्व के बौद्धिक भाषा विज्ञानी नोमचोम्सकी ने कहा, ‘करोड़ों डालर से चलने वाले जनसंपर्क उद्योग के जरिए बताया जाता है कि दरअसल जिन चीजों की जरूरत उन्हें नहीं है, वे विश्वास करें कि उनकी जरूरत उन्हें ही है।’ भाषा के विकास की प्रक्रिया सामाजिक विकास से जुड़कर चलती है।

सामाजिक विकास की प्रक्रिया में संस्कृति और आर्थिक उत्पादन के कारक प्रभाव डालते हैं। भारत की नई पीढ़ी अपने मूल स्रोत मातृभाषा, संस्कृति और दर्शन से कटी हुई है।

हिंदी के पास प्राचीन संस्कृति और परम्परा का सुदीर्घ इतिहास है। यहां अनेक भाषाएं/बोलियां उगी। भाषा के विकास के साथ वस्तुओं के रूप को नाम देने की परम्परा चली। रूप और नाम मिलकर ही परिचय बनते हैं। तुलसीदास ने यही बात हिंदी में गाई ‘रूप ज्ञान नहि नाम विहीना।’

हिंदी के पास संस्कृत और संस्कृति की अकूत विरासत है। ऋग्वेद ने भाषा के न्यूनतम घटक को ह्यअक्षरह्ण बताया। अक्षर नष्ट नहीं होता।

वाणी/भाषा ‘सहस्त्रिणी अक्षरा’ (ऋ0 1.164.41) है। वाणी में सात सुर हैं लेकिन अक्षर मूल हैं ‘अक्षरेण मिमते सप्तवाणी,’ वे अक्षर से वाणी नापते हैं। हिंदी ने संस्कृत सहित सभी भारतीय भाषाओं/बोलियों से शब्द लिये, सबको अर्थ दिये।

संविधान निर्माण के बाद 1951 में नियुक्त आफीसियल लेंगुवेज कमीशन ने अंग्रेजी के ठीक जानकारों की संख्या लगभग 0.25 प्रतिशत बतायी। 1 प्रतिशत से भी कम अंग्रेजीदां लोग प्रतिष्ठित बने। वे अंग्रेजी में सोंचते हैं, देश हिंदी में रोता है। हिंदी में हंसता है।

हिंदी फिल्में अरबों लूटती हैं, संवाद/गीत हिंदी में होते है लेकिन नाम परिचय अंग्रेजी में। लोकप्रिय निर्माता/निर्देशक/नायक, नायिकाएं अपने साक्षात्कार अंग्रेजी में देते हैं। इनसे प्रभावित युवा ‘हाय गाइज … रियली स्पीकिंग,’ बोलते हैं। मातृभाषा में ही प्रीति, प्यार राग, द्वेष, काव्य सर्जन चरम पाते है।

हिंदी दिवस आया, उत्सव हुए। भारत का भविष्य हिंदी है। हिंदी हमारी अभिव्यक्ति है, हमारे आनंद का चरम संगीत और काव्य भी। हिंदी पखवाड़े में यह बातें ध्यान में लाना जरूरी है।


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